Wednesday, 30 January 2019

लिखते लिखते

सोचने के साथ लिखने का संबंध तो है लेकिन हम सोचते अधिक हैं लिखते कम हैं. शायद सोचना सरल है किन्तु लिखना कठिन है. लिखने के लिए विचार के अलावा शब्द, शिल्प और शैली भी चाहिए। अपने स्कूली दिनों में जब मैंने हजारी प्रसाद द्विवेदी द्वारा लिखित एक लेख पढ़ा था, 'नाखून क्यों बढ़ते हैं' तो उसे पढ़कर मैं विस्मित हो गया था, आखिर यह निराली बात उनके के दिमाग में कैसे आयी होगी? लेखक ने नाखूनों के बढ़ने को मनुष्य की पाशविकता से जोड़ा था. अद्भुत लेख था वह.

जो भी लिखता है, वह अनुभव और उसके निष्कर्षों को अपने शब्द देता है. लेख किसी कहानी या उपन्यास की तरह सरस नहीं होते लेकिन ज्ञानवर्धक होते है. कालांतर में जब मुझे किस्से-कहानी लिखना आ गया तो लेख लिखने का साहस भी आ गया. विगत छः वर्षों में कई लेख ब्लॉग में लिखे, उनमें से कुछ ऐसे लेखों का चयन इस कृति के लिए किया गया जिन्हें पढ़कर आपको सुखद अनुभूति होगी। ये बोझिल नहीं, जीवनोपयोगी लेख हैं. कुछ बातें आपके जीवन-प्रबंधन से जुड़ी हुई हैं, कुछ आपके स्वास्थ्य से, कुछ समाज से, मार्केटिंग से तो कुछ मनोरंजन से. ये जीवन की सच्चाई से जुड़े लेख हैं.

इन लेखों को यद्यपि मैंने लिखा है लेकिन मेरी पत्नी माधुरी जी ने इस कार्य में मेरी बहुत मदद की है, विमर्श में सहभागी रही हैं. मुझे विश्वास है कि यह लेख संग्रह आपको पसंद आएगा और आप इस कृति को  पढ़ने की सिफारिश अपने परिचितों से भी करेंगे।

बिलासपुर (छत्तीसगढ़)                                                               द्वारिका प्रसाद अग्रवाल
20 मार्च 2019                                                                                    माधुरी अग्रवाल 

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