समाज : कला संस्कृति और साहित्य
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विज्ञान ने हमारी सुविधा के लिए मशीनें बनाई, मशीनों ने धीरे-धीरे मनुष्य को ही मशीन बना दिया. अब उसके पास ललित कलाओं के लिए समय नहीं बचा. परिणामस्वरूप मनुष्य में मनुष्यता के लक्षण कमजोर पड़ते जा रहे हैं और धनोपार्जन की कामना बलवती होती जा रही है. दरअसल, कला की साधना से हमारी कल्पनाशीलता का विकास होता है. रचना हमारे लिए मनोरंजन मात्र नहीं वरन, हमें व्यवस्थित ढंग से जीने के उपाय सिखाती है.
हाथों में खेलते ऊन के गोले, उंगलियों के बीच उलझे क्रोशिया के धागे, लकड़ी के फ़्रेम में कसे कपड़े पर सुई की नोक से चुभकर निखरते रंगीन धागों के मनोरम चित्र और वे खुशियां हमसे बहुत दूर चली गई हैं. आंगन-चौबारे और घर के बाहर की दीवारों को गोबर या मिट्टी से लीपने के बाद सफ़ेद मिट्टी से की जाने वाली चित्रकारी अब गांव-देहात में ही सिमट गई, शहर में इन कलाकृतियों के दर्शन अब दुर्लभ हो गए हैं. हां, शहरों में रंगोली ने अपना असर अभी भी बनाए रखा है जो त्यौहारों में दिख जाता है. नववर्ष व दीपावली में हाथ से बनाए खूबसूरत बधाई कार्ड अब इतिहास की बात बनकर रह गए हैं क्योंकि बधाई संदेश देने के लिए मोबाइल और लेपटाप जैसे आधुनिक उपकरण हमारे पास उपलब्ध हैं जो सस्ते हैं और तीव्रगामी भी. ललित कलाएं बहुत तेजी से हमसे दूर होती जा रही हैं जिसके कारण हम सहज मानवीय भावनाओं से भी दूर होते जा रहे हैं. कला से जुड़ने का अर्थ है- स्वयं के व्यक्तित्व का विकास, ऐसा विकास जो अपने साथ-साथ दूसरों के लिए प्रेरणा भी बन सके और सहज मनोरंजन का साधन भी.
दक्षिण भारत में विवाह योग्य युवतियों को नृत्य निपुण होने पर अन्य लड़कियों की स्पर्धा में अधिक पसन्द किया जाता था, वहीं पर, बंगाल में गायन और उत्तर भारत में सिलाई-कढ़ाई को प्राथमिकता मिलती थी. पाक कला में दक्षता तो सभी परिवारों की अनिवार्य चाहत रही है. इस तरह कलाएं स्वयं ही पनपती और विकसित होती थी. बदलते परिवेश में ये बातें कमजोर पड़ गई हैं क्योंकि धन-कमाऊ पत्नी और पति अब विवाह की अनिवार्यता हो गई है. पैसे के महत्व ने अब कला को गौण कर दिया है. कला सीखने की क्या जरूरत है ? जरूरत होगी तो खरीद लेंगे, जेब में पैसा होना चाहिए.
ऐसे उदाहरण अक्सर दिखाई देते हैं कि प्रशासनिक अधिकारी, चिकित्सक, इन्जीनियर या व्यापारी साहित्य सृजन कर रहे हैं क्योंकि उन्हें उनकी अपनी अभिरुचि को विकसित करने का यथोचित अवसर नहीं मिला. वे ऐसे काम में फँस गए जिसकी ख्वाहिश उन्हें न थी किन्तु वे उस समय अपने माता-पिता की इच्छा पूरी करने के लिए प्रतिबद्ध थे. 'केरियर' बनाने के चक्कर में वे इस तरह उलझे कि उनकी मौलिक प्रतिभा घुट-घुट कर कहीं दबी रह गई और अब जगह खोज कर इधर-उधर से प्रस्फ़ुटित हो रही है. यह उस अन्धी दौड़ का परिणाम है जिसने इनसे पूछा था- 'कविता लिख रहे हो, कहानी लिख रहे हो, चित्र बना रहे हो, खेल रहे हो, योग-प्राणायाम-ध्यान कर रहे हो, पर यह तो बताओ कि अपना घर कैसे चलाओगे ?' सवाल यह उठता है कि क्या पेट भरना ही जीवन का एकमात्र उद्देश्य है ? तो आज के युग का जवाब है- 'हाँ.'
कुछ 'सिरफिरे' अपवादों को छोड़ दें तो शेष विश्व के लोगों की केवल दो समस्याएँ हैं- पेट भरने की समस्या और पेट के नीचे की आग बुझाने की समस्या। ऐसी सामाजिक सोच के साथ कला, संस्कृति और साहित्य को कैसे विकसित किया जा सकता है?
अब, ऐसा भी नहीं है कि सब कुछ हाथ से निकल गया हो. अभी भी ऐसे जागरूक साधक हैं जो इसकी ज्योति को जलाए और बचाए रखे हुए हैं. नृत्य, गायन, संगीत, लेखन, चित्रकला, नाटक, और फ़िल्मांकन के क्षेत्र में अनेक लोग मनोयोग से साधनारत हैं लेकिन लोकप्रियता के एक स्तर को प्राप्त करने के बाद उनकी ऊर्जा भटकने लगती है, प्रवीणता निखारने के स्थान पर अपनी कीमत लगवाने और बढ़वाने में केन्द्रित हो जाती है. परिणामतः कला में पारंगत होने वाला मनुष्य गणित के ऐसे सवालों में उलझ जाता है जिसके कारण उसकी तथा उसके जरिए दूसरों को ललित कला से जोड़ने की सम्भावनाएं कम होती जाती हैं. देश की इतनी बड़ी आबादी और कला संस्कृति और साहित्य की ओर कम होता रुझान देश के मानसिक स्वास्थ्य के लिए खतरे की घंटी बजने जैसा है.
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