समाज : अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता
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किसी सूचना या विचार को बोलकर, लिखकर या किसी अन्य रूप में अभिव्यक्त करने की आज़ादी अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता कहलाती है। संविधान में अनुच्छेद १९ (१) के तहत प्रदत्त मौलिक अधिकारों में अभिव्यक्ति का अधिकार हमारे देश के लोकतान्त्रिक स्वरूप को बनाए रखने का एक महत्वपूर्ण ज़रिया है। जिस देश में लोगों के मुंह चुप करा दिए जाते है, कलम थाम ली जाती हैं, वहाँ अराजकता हावी होना तय है, शासन निरंकुश हो जाता है। जनतंत्र में जनता का शासन होता है इसलिए जनता के मन की बात को समझने और समझाने के लिए अभिव्यक्ति सर्वोत्तम साधन है। लोग क्या चाहते हैं, क्या नहीं चाहते, इसे स्वतंत्र अभिव्यक्ति के माध्यम से ही ज्ञात किया जा सकता है।
अभिव्यक्ति किसी संदेश को व्यक्त करने का विस्तार है। भारत के संविधान में इसे जनता का मौलिक अधिकार घोषित किया गया है, वहीं पर इसके उपयोग पर पाबन्दियाँ लगाने के लिए भारतीय दंड संहिता में प्रावधान भी बनाए गए हैं, अर्थात स्वतन्त्रता है, लेकिन सीमित। यह पाबंदी सड़क में बने हुए उस मार्ग-अवरोधक की तरह है जो तेज गति से वाहन चलाने पर, होने वाली दुर्घटना की चेतावनी देता है और गति कम करने की बाध्यता भी उत्पन्न करता है। इसका एक मतलब यह निकलता है कि नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता सीमित है। उसकी सीमा कानून तय करता है और कानून शासन के हाथ में है इसलिए असली ताकत जनता के हाथ में नहीं वरन शासन के हाथ में है। शासन की मंशा लोकतान्त्रिक होने पर स्वतन्त्रता के पैमाने शिथिल रहते हैं लेकिन उसके गैर-लोकतान्त्रिक होने पर स्वतन्त्रता सीमित हो जाती है।
अभिव्यक्ति और स्वतन्त्रता, दोनों बरसाती नदी की तरह हैं जिन्हें सीमा में बांधना बेहद कठिन है। अभिव्यक्ति याने अपने मन की बात व्यक्त करना। मन की बात करने के सबके अलग-अलग तरीके होते है। बच्चे मैदान में खेलते समय शोर मचाते हैं, वे शोर करके अपनी खुशी व्यक्त करते हैं। छोटे बच्चे की माँ काम की अधिकता का गुस्सा अपने बच्चे को झापड़ मार कर व्यक्त करती है। पति से नाराज पत्नी किचन में बर्तन पटक कर अपना आक्रोश व्यक्त करती है या पति से बात करना बंद कर देती है। माता-पिता अपने बच्चों की गलती पर नाराज़ होते हैं या बड़बड़ा कर गुस्सा जाहिर करते है। कुछ लोग अप्रिय बात पर सामने वाले को केवल घूर देते हैं तो कुछ मार-पीट पर उतारू हो जाते हैं। इन सभी तरीकों के पीछे दूसरे को सुधारने या उसके व्यवहार को बदलने मंशा होती है।
यह सदैव विवाद का कारण रहा है कि अभिव्यक्ति का कौन सा तरीका सही है ? सकारात्मक अभिव्यक्ति सबको अच्छी लगती है लेकिन आलोचना पीड़ा देती है। आलोचना को समालोचना मानने का अभ्यास बहुत कम लोगों में होता है। खास तौर से राजनीति में जब किसी बात का विरोध होता है तो जनहित के महत्व की बात भी दलीय राजनीति से जोड़कर चतुराई के साथ ख़ारिज़ कर दी जाती है। ज़िंदा कौम विरोध करती है, उसके तरीके अख़्तियार करती है और अपनी अभिव्यक्ति को सत्ता के गलियारों में प्रविष्ट कराती है।
स्वतन्त्रता की सीमाएं अनिश्चित है। मनुष्य असीमित स्वतन्त्रता चाहता है लेकिन समाज उसे बांधकर रखना चाहता है। परंपरा से चले आ रहे अलिखित नियमों के अनुरूप उसे अनुकूलित किया जाता है ताकि मन, विचार और कृत्य से वह समाज के निर्धारित दायरे में रहे। अलग-अलग समूहों के अपने-अपने नियम होते हैं। इन समूहों में कई बार ऐसी घटनाएँ हो जाती हैं जो समूह को स्वीकार्य नहीं होती, यहीं से विरोधाभास शुरू होता है और संघर्ष आरम्भ हो जाता है। कई बार दो समूहों के मध्य विवाद की ऐसी स्थिति उत्पन्न हो जाती है जो बड़े संघर्ष का रूप ले लेती है। गहराई से देखें तो इन विवादों के पीछे स्वतन्त्रता से जुड़े हुए सूत्र होते हैं जो ऊपरी तौर से दिखाई नहीं पड़ते।
हर उम्र में स्वतन्त्रता की चाहत अपना रूप बदलती है। बचपन उछल-कूद की आज़ादी चाहता है तो यौवन अपनी मनमर्जी से काम करने की। प्रौढ़ को विस्तार की छूट चाहिए तो वृद्ध को विश्राम की। जाने-अनजाने हम सब एक-दूसरे की सीमा का अतिक्रमण करते हैं लेकिन दूसरों से उम्मीद करते है कि वे सीमा में रहें, यह बेहद चिंताजनक है। मैं यदि सीमा का अतिक्रमण करूं तो उसके लिए मेरे अपने तर्क हैं, कारण हैं लेकिन दूसरा कोई तोड़े तो हम कहेंगे- 'तुमको अपनी सीमा याद रखनी चाहिए।' हम में कितने लोग हैं जो किसी कार्य को करने के पहले संविधान के प्रावधानों या भारतीय दंड संहिता के नियमों को याद करते हैं या उन्हें याद रख सकते हैं ! आम तौर पर हमारा व्यवहार सुविचारित नहीं होता, एक 'रिफ़्लेक्स' होता है जो असावधानी से अभिव्यक्त हो जाता है, परिणाम चाहे जो हो।
ऐसा कहा जाता है कि स्वतन्त्रता उतनी होनी चाहिए जो दूसरे को कष्ट न दे, असुविधा में न डाले लेकिन किसी एक प्रतिक्रिया का सब पर एक जैसा असर नहीं होता। एक बार मैं अपने एक मित्र के घर किसी कार्य से गया था। बैठक में हम दोनों बात कर रहे थे अचानक उनका चार वर्षीय पुत्र मेरे पास आया और उसने मुझे दो झापड़ लगाए। उस अनायास झापड़ के कारण मैं असहज हो गया क्योंकि बच्चे की वैसी अभिव्यक्ति का मूल कारण मुझे समझ में नहीं आ रहा था। मैं उस बच्चे से पहली बार मिल रहा था और उस बच्चे ने भी मुझे पहली बार देखा था। उस बच्चे ने 'रिफ़्लेक्स' में वैसा किया। प्रश्न यह है कि क्या वह बच्चा है इसलिए उसे ऐसा करने की स्वतन्त्रता है ? मुझे आश्चर्य तब हुआ जब उस बालक के पिता को अपने सुपुत्र के कृत्य पर हंसी आ गई, वे गदगद हो गए, जैसे उनके पुत्र ने कोई प्रशंसनीय कार्य कर दिया हो। तो, सबकी स्वतन्त्रता के अर्थ अलग-अलग होते हैं।
स्वतन्त्रता को मर्यादित करने के पैमाने भी युग के साथ परिवर्तित होते रहते है. समाज हर दिन बदलता है, कपड़ों के फैशन की तरह. जो कल गलत था, आज सही है. जो आज सही है, कल गलत घोषित हो जाएगा. धन-संपत्ति-वैभव और स्त्री-पुरुष देह का दिखावा कभी अशोभनीय माना जाता था, आज शोभायमान हो गया है, उनके स्वतन्त्र सोच की अभिव्यक्ति करता है. बड़ों का मान-सम्मान अब अनिवार्य नहीं रह गया. जीवन से सम्बंधित निर्णय लेने में अब माता-पिता की भूमिका गौड़ होती जा रही है. इन उदाहरणों से यह समझा जा सकता है कि सामाजिक मर्यादाएं भी स्वतंत्र होकर आधुनिक होना चाहती हैं.
हमारे देश के लोकतंत्र ने लोगों को पारंपरिक अधिनायकवादी सोच से हटकर लोकतान्त्रिक सोच के लिए प्रशिक्षित किया है. जीवन के हर क्षेत्र में खुलापन उभर रहा है और खुलकर अपने विचारों को व्यक्त करने का साहस विकसित हुआ है. आम भारतीय खुलने की कोशिश में है लेकिन पुरानी मान्यताएं और कानून उनके लिए जंजीर और ताले लिए आसपास मंडरा रहा है. इन दिनों स्वतन्त्रता और मर्यादा के बीच अदृश्य संघर्ष चल रहा है जो इस बदलते समाज के लिए मनोरंजक और रोचक कहानियाँ लिख रहा है.
उम्मीद है कि स्वतन्त्रता की जीत होगी और बंधनमुक्त समाज उभर कर सामने आएगा.
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