समाज : विज्ञान के ज्ञान का असर
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ज्ञान-विज्ञान का महत्व अपनी जगह ठीक है . विज्ञान हमारी ज़रुरत पूरी कर रहा है और अब हमारी ज़रूरी जरूरत बन भी गया है. विगत सदी के सौ वर्ष मानव इतिहास में उन्नति के सुनहरे वर्ष रहे हैं. इसने समय को बदल दिया, मनुष्य को बदल दिया, उसकी सोच को भी बदल दिया. इस बदलाव का श्रेय विज्ञान को जाता है.
विज्ञान जिस अदा से हमारे करीब आया वह मनभावन थी. उसने हमारे जीवन को विस्तार दिया. हमें आधुनिक चिकित्सा विज्ञानं दिया. इसकी मदद से हमारे कष्ट दूर हुए, असमय मृत्यु से अनेक मनुष्यों की जान बचाई बचाई. शिक्षा की नयी तकनीक दी और दुनिया भर के ज्ञान-विज्ञान को सबके लिए आसान बना दिया. रस्सी से बनी खटिया को गद्देदार पलंग में बदल दिया. पैरों की ताकत से चलने वाले लोग दिमाग की शक्ति से भागने और उड़ने लगे. धीमी आवाज तेज हो गयी, दूरी नजदीकी में बदल गयी और देखते-देखते पूरी दुनिया हमारी मुट्ठी में आ गयी.
इधर दुनिया हमारी मुट्ठी में आई, उधर हम विज्ञान की मुट्ठी में चले गए. अब हमें पसीना नहीं सुहाता, ठण्ड बर्दास्त नहीं होती, बारिश के पानी में भीगने में मज़ा नहीं आता. प्रकृति के ऋतु परिवर्तन और हमारे शरीर के स्वाभाविक रुझान के तार टूट गए. प्रकृति आज भी अपना काम कर रही है लेकिन हम प्रकृति से दूरी बनाते जा रहे हैं.
हमारे देश में आदिकाल से ज्ञान उपलब्ध था, विश्व की बहुसंख्य आबादी के मुकाबले हम अधिक सभ्य थे. जब दुनिया भर के लोग आदिवासियों जैसा जीवन व्यतीत करते थे, नंगे रहते थे, कंद-मूल खाकर अपना पेट भरते थे तब हमारे पूर्वज वस्त्र धारण करते थे और अन्न उगाकर खाते थे.
शून्य का आविष्कार हमने किया. खगोल-विज्ञान के गहरे रहस्य हमारे मनीषियों के पास थे. हड़प्पा और मोहनजोदड़ो के अवशेष बताते हैं कि वास्तुकला के निर्माण में हमारे आदि-पुरुष कितने अनुपम थे. वास्तु निर्माण में हमारी वैज्ञानिकता का दुनिया लोहा मानती है. मलमल का कपड़ा हमारी उन्नत तकनीक का ज्वलंत उदाहरण है. धातु के अस्त्र-शस्त्र और काष्ठ कला के निर्माण में हमारे कारीगर अतुलनीय रहे हैं.
आधुनिक विज्ञान ने अपनी खोज को छुपाया नहीं बल्कि उसे सार्वजनिक किया ताकि विज्ञान की तकनीक का उपयोग सामाजिक परिवर्तन के लिए किया जबकि हमारे देश में अनेक ज्ञानी अपने ज्ञान और उपलब्धियों को सीने में छुपाए चिता में भस्म हो गए. अपनी खोजी हुई विधा को रहस्य बनाकर रखने की इस जिद के कारण हमारी पुरातन वैज्ञानिक उपलब्धियां जनसामान्य के काम नहीं आ सकी.
एक बात और है, अपने देश के सन्दर्भ में देखें तो विकसित देशों के मुकाबले हमारी गति बहुत धीमी है क्योंकि हमारी सोच किसी भी परिवर्तन को आहिस्ता-आहिस्ता अपनाती है. परिवर्तन को स्वीकारने की हिचकिचाहट हमें बार-बार रोकती है और यह संकोच हमें आगे बढ़ने के बजाय कदमताल करने के लिए मजबूर कर देता है. हम जब तक किसी नवीनता को अपनाते हैं, तब तक विज्ञान और आगे बढ़ जाता है और हम दौड़ में पिछड़ जाते हैं. हमारे शिक्षित समाज को आधुनिक तकनीक का लाभ उठाना नहीं आता. उन्नत तकनीक समाज को उन्नति की राह दिखाती है लेकिन भारतीय जनमानस को उसका सकारात्मक उपयोग कम समझ आता है, नकारात्मक अधिक. वे पुरानी परंपरा और आधुनिक खोज का ऐसा विचित्र घालमेल करते है कि उस विधा के मूल आविष्कारक को यदि पता लग जाए तो उसको अपने आविष्कार पर अफ़सोस होने लगेगा. इसकी वज़ह यह है कि वे अपनी दुनिया में खुश रहते हैं. संचार तकनीक इसका इसका जीता-जागता उदाहरण है. संचार तकनीक ने पूरे विश्व को हमारी मुट्ठी में समेट दिया है. संदेशों का आना-जाना त्वरित हो गया है. आपसी संवादों के आदान-प्रदान में इस तकनीक के कारण बहुत मदद मिली है लेकिन इसने मानवीय सरोकार को चिंताजनक स्तर तक कम कर दिया है. मानवीय संबंधों के मामले में हम अवनति की और अग्रसर हैं. दुःख की बात यह है कि जो विज्ञान मानवता के कल्याण के लिए नित नयी खोज कर रहा है, वही हमारे समाज में मनुष्यता को कमजोर कर रहा है.
विज्ञान परम ज्ञान नहीं होता, यह सतत परिवर्तनशील प्रक्रिया है. कल जो ज्ञात था, आज अतीत है; जो आज ज्ञात है, कल अतीत हो जाएगा. विज्ञान ने हर युग में मनुष्यता को बेहतर मनुष्य बनने में मदद की, उन तकनीकों का अन्वेषण किया जिनसे मनुष्य के जीवन को सुविधाजनक बनाया जा सके. दो पैरों से चलने वाला मनुष्य, बैलगाड़ी, सायकिल, मोटर सायकिल, कार और वायुयान की गति से बढ़ता हुआ राकेट पर सवार होकर उड़ने लगा.
ऊपरी तौर पर ऐसा लगता है कि मनुष्य विज्ञान के साथ-साथ आगे बढ़ रहा है लेकिन ऐसा नहीं है, विज्ञान के तेज कदमों के साथ चलना मनुष्य के वश की बात नहीं है. मनुष्य जब तक विज्ञान की तकनीक को समझने और अंगीकार करने की कोशिश करता है, तब तक विज्ञान बहुत आगे बढ़ जाता है. इन दोनों के बीच फासला लगातार बढ़ रहा है. जितना फासला बढ़ रहा है उतना ही विज्ञान मनुष्यता पर हावी होता जा रहा है, विज्ञान अब मालिक बन गया है और मनुष्य उसका गुलाम.
सबसे बड़ी खबर यह है कि हमारा मानवीय सरोकार दिन-प्रतिदिन कम होता जा रहा है. समाज विज्ञान के सन्दर्भ में हम लगातार गिरावट की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं. मोबाइल फोन जैसे गैजेट ने हमारी पीढ़ी को एकाकी बना दिया है, सब अपने-अपने में मस्त हैं. जैसे किसी को किसी से कोई सरोकार ही न हो. थोड़े-बहुत बातचीत अगर कहीं चल रही है तो वह किसी मजबूरी के चलते. अगर यही हाल रहा तो अंतिम संस्कार के लिए कन्धा देने वाले लोग नहीं मिलेंगे. वैवाहिक सम्बन्ध भसक रहे हैं. आपसी संबंधों का लिहाज़ ख़त्म हो रहा है. परिवारों में देने का भाव समाप्त हो रहा है, केवल लेने की जुगत बैठाई जा रही है. सेक्स बेपर्दा और अनियंत्रित होता जा रहा है. व्यवहार की शालीनता गायब हो रही है, 'मेरी मर्जी' का समूह गान चल रहा है.
हमारी मान्यताएं जिस रफ़्तार से टूट रही हैं, वह भयावह है. ये सारे परिवर्तन विज्ञान की उन तकनीकों की देन है जो आज घर-घर में विराजमान हैं. इन परिवर्तनों को मैं गलत नहीं कह रहा हूँ क्योंकि सही-गलत की परिभाषा बदलती रहती है लेकिन सवाल यह है कि हमारे मानवीय मूल्यों के भविष्य क्या होगा?
विज्ञान ने यह कभी नहीं चाहा कि मनुष्य तकनीक का दुरुपयोग करे. विज्ञान तो मानव जाति के लिए वरदान बन कर आया लेकिन हम सब भस्मासुर बन गए हैं और खुद को भस्म करने के लिए आमादा हैं.
दुःख की बात यह है कि जो विज्ञान मानवता के कल्याण के लिए नित नयी खोज कर रहा है उसी विज्ञान के कारण हमारे समाज की मानवीयता को कमजोर हो रही है. इसमें कोई संदेह नहीं कि वह परिवर्तन को प्रोत्साहित कर रहा है लेकिन मानवीयता को सार्थक दिशा में ले जाने के लिए हमारी मदद नहीं कर रहा है.
विगत कुछ वर्षों में विज्ञान और तकनीक ने हमारे समाज को बदलने में अग्रणी भूमिका निभाई है. हमारे रहन-सहन और सोच पर इसका व्यापक असर हुआ है. यद्यपि भौगोलिक दूरियां कम हुई हैं लेकिन आपसी दूरियां बढ़ती जा रही हैं. मनुष्य आधुनिक तकनीक की पकड़ में आ चुका है. अब यह मानवीय मूल्यों को कुचलने की दुष्ट भूमिका में उतर आई है. एक मददगार के रूप में अवतरित सोच ने तानाशाह की शैली अपना ली है और वह मनुष्य को वैसा बदलने के लिए मजबूर कर रहा है, जैसा 'वह चाहता है'. अब विज्ञान मनुष्य को ऐसा मनुष्य बना रहा है जिसमें मानवता का रक्त न हो, केवल हाड़-मांस का शरीर हो. समस्या यह है कि उस बलशाली का क्या करें जो हम पर इस कदर हावी हो चुका है. उसका शरीर प्रति-पल मज़बूत हो रहा है और उसके सामने मानवता कमजोर पड़ती जा रही है.
मुझे उम्मीद है कि हम सब विज्ञान के नकारात्मक उपयोग को सकारात्मक मोड़ देने के उपाय खोजेंगे ताकि अब तक हो चुके मानवीय नुकसान की मरम्मत हो सके और भविष्य में होने वाले नुकसान को रोका जा सके.
यह तय है कि मनुष्य को कुचला जा सकता है लेकिन उसे हराया नहीं जा सकता.
विज्ञान जिस अदा से हमारे करीब आया वह मनभावन थी. उसने हमारे जीवन को विस्तार दिया. हमें आधुनिक चिकित्सा विज्ञानं दिया. इसकी मदद से हमारे कष्ट दूर हुए, असमय मृत्यु से अनेक मनुष्यों की जान बचाई बचाई. शिक्षा की नयी तकनीक दी और दुनिया भर के ज्ञान-विज्ञान को सबके लिए आसान बना दिया. रस्सी से बनी खटिया को गद्देदार पलंग में बदल दिया. पैरों की ताकत से चलने वाले लोग दिमाग की शक्ति से भागने और उड़ने लगे. धीमी आवाज तेज हो गयी, दूरी नजदीकी में बदल गयी और देखते-देखते पूरी दुनिया हमारी मुट्ठी में आ गयी.
इधर दुनिया हमारी मुट्ठी में आई, उधर हम विज्ञान की मुट्ठी में चले गए. अब हमें पसीना नहीं सुहाता, ठण्ड बर्दास्त नहीं होती, बारिश के पानी में भीगने में मज़ा नहीं आता. प्रकृति के ऋतु परिवर्तन और हमारे शरीर के स्वाभाविक रुझान के तार टूट गए. प्रकृति आज भी अपना काम कर रही है लेकिन हम प्रकृति से दूरी बनाते जा रहे हैं.
हमारे देश में आदिकाल से ज्ञान उपलब्ध था, विश्व की बहुसंख्य आबादी के मुकाबले हम अधिक सभ्य थे. जब दुनिया भर के लोग आदिवासियों जैसा जीवन व्यतीत करते थे, नंगे रहते थे, कंद-मूल खाकर अपना पेट भरते थे तब हमारे पूर्वज वस्त्र धारण करते थे और अन्न उगाकर खाते थे.
शून्य का आविष्कार हमने किया. खगोल-विज्ञान के गहरे रहस्य हमारे मनीषियों के पास थे. हड़प्पा और मोहनजोदड़ो के अवशेष बताते हैं कि वास्तुकला के निर्माण में हमारे आदि-पुरुष कितने अनुपम थे. वास्तु निर्माण में हमारी वैज्ञानिकता का दुनिया लोहा मानती है. मलमल का कपड़ा हमारी उन्नत तकनीक का ज्वलंत उदाहरण है. धातु के अस्त्र-शस्त्र और काष्ठ कला के निर्माण में हमारे कारीगर अतुलनीय रहे हैं.
आधुनिक विज्ञान ने अपनी खोज को छुपाया नहीं बल्कि उसे सार्वजनिक किया ताकि विज्ञान की तकनीक का उपयोग सामाजिक परिवर्तन के लिए किया जबकि हमारे देश में अनेक ज्ञानी अपने ज्ञान और उपलब्धियों को सीने में छुपाए चिता में भस्म हो गए. अपनी खोजी हुई विधा को रहस्य बनाकर रखने की इस जिद के कारण हमारी पुरातन वैज्ञानिक उपलब्धियां जनसामान्य के काम नहीं आ सकी.
एक बात और है, अपने देश के सन्दर्भ में देखें तो विकसित देशों के मुकाबले हमारी गति बहुत धीमी है क्योंकि हमारी सोच किसी भी परिवर्तन को आहिस्ता-आहिस्ता अपनाती है. परिवर्तन को स्वीकारने की हिचकिचाहट हमें बार-बार रोकती है और यह संकोच हमें आगे बढ़ने के बजाय कदमताल करने के लिए मजबूर कर देता है. हम जब तक किसी नवीनता को अपनाते हैं, तब तक विज्ञान और आगे बढ़ जाता है और हम दौड़ में पिछड़ जाते हैं. हमारे शिक्षित समाज को आधुनिक तकनीक का लाभ उठाना नहीं आता. उन्नत तकनीक समाज को उन्नति की राह दिखाती है लेकिन भारतीय जनमानस को उसका सकारात्मक उपयोग कम समझ आता है, नकारात्मक अधिक. वे पुरानी परंपरा और आधुनिक खोज का ऐसा विचित्र घालमेल करते है कि उस विधा के मूल आविष्कारक को यदि पता लग जाए तो उसको अपने आविष्कार पर अफ़सोस होने लगेगा. इसकी वज़ह यह है कि वे अपनी दुनिया में खुश रहते हैं. संचार तकनीक इसका इसका जीता-जागता उदाहरण है. संचार तकनीक ने पूरे विश्व को हमारी मुट्ठी में समेट दिया है. संदेशों का आना-जाना त्वरित हो गया है. आपसी संवादों के आदान-प्रदान में इस तकनीक के कारण बहुत मदद मिली है लेकिन इसने मानवीय सरोकार को चिंताजनक स्तर तक कम कर दिया है. मानवीय संबंधों के मामले में हम अवनति की और अग्रसर हैं. दुःख की बात यह है कि जो विज्ञान मानवता के कल्याण के लिए नित नयी खोज कर रहा है, वही हमारे समाज में मनुष्यता को कमजोर कर रहा है.
विज्ञान परम ज्ञान नहीं होता, यह सतत परिवर्तनशील प्रक्रिया है. कल जो ज्ञात था, आज अतीत है; जो आज ज्ञात है, कल अतीत हो जाएगा. विज्ञान ने हर युग में मनुष्यता को बेहतर मनुष्य बनने में मदद की, उन तकनीकों का अन्वेषण किया जिनसे मनुष्य के जीवन को सुविधाजनक बनाया जा सके. दो पैरों से चलने वाला मनुष्य, बैलगाड़ी, सायकिल, मोटर सायकिल, कार और वायुयान की गति से बढ़ता हुआ राकेट पर सवार होकर उड़ने लगा.
ऊपरी तौर पर ऐसा लगता है कि मनुष्य विज्ञान के साथ-साथ आगे बढ़ रहा है लेकिन ऐसा नहीं है, विज्ञान के तेज कदमों के साथ चलना मनुष्य के वश की बात नहीं है. मनुष्य जब तक विज्ञान की तकनीक को समझने और अंगीकार करने की कोशिश करता है, तब तक विज्ञान बहुत आगे बढ़ जाता है. इन दोनों के बीच फासला लगातार बढ़ रहा है. जितना फासला बढ़ रहा है उतना ही विज्ञान मनुष्यता पर हावी होता जा रहा है, विज्ञान अब मालिक बन गया है और मनुष्य उसका गुलाम.
सबसे बड़ी खबर यह है कि हमारा मानवीय सरोकार दिन-प्रतिदिन कम होता जा रहा है. समाज विज्ञान के सन्दर्भ में हम लगातार गिरावट की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं. मोबाइल फोन जैसे गैजेट ने हमारी पीढ़ी को एकाकी बना दिया है, सब अपने-अपने में मस्त हैं. जैसे किसी को किसी से कोई सरोकार ही न हो. थोड़े-बहुत बातचीत अगर कहीं चल रही है तो वह किसी मजबूरी के चलते. अगर यही हाल रहा तो अंतिम संस्कार के लिए कन्धा देने वाले लोग नहीं मिलेंगे. वैवाहिक सम्बन्ध भसक रहे हैं. आपसी संबंधों का लिहाज़ ख़त्म हो रहा है. परिवारों में देने का भाव समाप्त हो रहा है, केवल लेने की जुगत बैठाई जा रही है. सेक्स बेपर्दा और अनियंत्रित होता जा रहा है. व्यवहार की शालीनता गायब हो रही है, 'मेरी मर्जी' का समूह गान चल रहा है.
रिश्ते भूले, खैरियत भूले कल अदब भूल जाएंगे,
जुनून में कत्ल करके, कत्ल का सबब भूल जाएंगे. हमारी मान्यताएं जिस रफ़्तार से टूट रही हैं, वह भयावह है. ये सारे परिवर्तन विज्ञान की उन तकनीकों की देन है जो आज घर-घर में विराजमान हैं. इन परिवर्तनों को मैं गलत नहीं कह रहा हूँ क्योंकि सही-गलत की परिभाषा बदलती रहती है लेकिन सवाल यह है कि हमारे मानवीय मूल्यों के भविष्य क्या होगा?
विज्ञान ने यह कभी नहीं चाहा कि मनुष्य तकनीक का दुरुपयोग करे. विज्ञान तो मानव जाति के लिए वरदान बन कर आया लेकिन हम सब भस्मासुर बन गए हैं और खुद को भस्म करने के लिए आमादा हैं.
विगत कुछ वर्षों में विज्ञान और तकनीक ने हमारे समाज को बदलने में अग्रणी भूमिका निभाई है. हमारे रहन-सहन और सोच पर इसका व्यापक असर हुआ है. यद्यपि भौगोलिक दूरियां कम हुई हैं लेकिन आपसी दूरियां बढ़ती जा रही हैं. मनुष्य आधुनिक तकनीक की पकड़ में आ चुका है. अब यह मानवीय मूल्यों को कुचलने की दुष्ट भूमिका में उतर आई है. एक मददगार के रूप में अवतरित सोच ने तानाशाह की शैली अपना ली है और वह मनुष्य को वैसा बदलने के लिए मजबूर कर रहा है, जैसा 'वह चाहता है'. अब विज्ञान मनुष्य को ऐसा मनुष्य बना रहा है जिसमें मानवता का रक्त न हो, केवल हाड़-मांस का शरीर हो. समस्या यह है कि उस बलशाली का क्या करें जो हम पर इस कदर हावी हो चुका है. उसका शरीर प्रति-पल मज़बूत हो रहा है और उसके सामने मानवता कमजोर पड़ती जा रही है.
मुझे उम्मीद है कि हम सब विज्ञान के नकारात्मक उपयोग को सकारात्मक मोड़ देने के उपाय खोजेंगे ताकि अब तक हो चुके मानवीय नुकसान की मरम्मत हो सके और भविष्य में होने वाले नुकसान को रोका जा सके.
यह तय है कि मनुष्य को कुचला जा सकता है लेकिन उसे हराया नहीं जा सकता.
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