स्वास्थ्य : मैं भोग रोग और योग का मिश्रण हूँ
===============================
बचपन से अब वृद्धावस्था तक खाते-पीते-जीते गुजर रहा है. पीछे मुड़ कर देखने का मन होता है कि आखिर कैसे गुजरा? ऐसा लगता है कि सब कुछ अपने-आप होता गया और मैं यहाँ तक पहुँच गया. जैसा मेरा पारिवारिक माहौल था, वैसे खाने-पीने की आदतें विकसित हुई. चूँकि हलवाई की दूकान से जुड़ा था इसलिए खाने-पीने की भरपूर सुविधा थी, पेट हर समय भरा रहता था. भरे पेट का सिलसिला जो चला तो आज तक चल रहा है इसलिए उपवास करना कभी नहीं सूझा और अधार्मिक होने के कारण व्रत आदि से भी हमेशा दूरी बनी रही. शाकाहारी परिवार था इसलिए मांस-मटन से दूर रहा लेकिन युवावस्था में अंडे से मुलाकात हुई तो वह दोस्ती अब भी चल रही है.
क्या खाने से फायदा है या खाने से नुकसान, इसे बचपन से अब तक सुनते चले आ रहा हूँ लेकिन सुनता भर हूँ, जो मन आता है या जो मिल जाता है, उसे खा लेता हूँ. उबला हुआ भोजन अरुचिकर लगता है, वहीँ पर तला हुआ भोजन या नमकीन या मिठाई देखकर खुद पर काबू पाना मेरे लिये दुष्कर है. आग्रह का कमजोर हूँ इसलिए कोई यदि प्रेम से अधिक खिलाता है तो मना नहीं कर पाता, क्या करूं?
धार्मिक और संस्कारी परिवार में जन्म हुआ इसलिए बुरी आदतों की ओर आकर्षण कम ही बना लेकिन गालियाँ देना और तम्बाखू खाना सीखा क्योंकि मेरे वरिष्ठ भी इनका उपयोग करते थे. बीड़ी-सिगरेट के धुएं की सार्वजनिक गंध जानता हूँ लेकिन व्यक्तिगत अनुभव शून्य है. सन १९६३ में गोवा में न-न करते एक गिलास बीयर पीनी पड़ी क्योंकि वह आतिथेय के सम्मान का सवाल बन गया था, बस, उसके आगे कुछ नहीं. खूब तम्बाखू खाई, सन १९६८ से १९९४ तक, छब्बीस साल, बाबा १६० से लेकर ज़र्दा तक, परिणामस्वरूप दांत ढीले हो गए और मुंह कम खुलने लगा. मेरे डाक्टर महेश कासलीवाल मुझे कहा करते थे- 'देख लेना, तुम कैंसर से मरोगे.' उनकी बात आधी सच हुई, मुझे मुंह में कैंसर हुआ, तीन बार आक्रमण हुआ लेकिन मैं कैंसर के कारण मरा नहीं, पंद्रह साल से उस शाही बीमारी से लड़-भिड़ रहा हूँ, जिंदा हूँ.
बचपन में राख से दांत मांजते थे, फिर बिटको का बन्दर छाप काला दन्त मंजन, फिर वैद्यनाथ का लाल दन्त मंजन, बबूल या नीम की मुखारी, फिर बिनाका का पेस्ट और सफ़ेद पावडर घिसा करते थे लेकिन पान और सुपारी चबाने की आदत के कारण मसूढ़े कमजोर पड़ते गये और पचास साल के अन्दर दांतों ने विद्रोह करना शुरू कर दिया. रही-सही कसर कैंसर की शल्यक्रिया में पूरी हो गई, न दांत रहे और न मसूढ़े. सब लोग मस्त चबा-चबाकर खाते है और मैं उनका मुंह देखते रहता हूँ. मेरा दिल होता है कि चना-मुर्रा खाऊँ, मूंगफली-काजू खाऊँ, खीरा-गाजर खाऊँ लेकिन अब दांतों के साथ खुद के द्वारा किये गये अत्याचार की रह-रह कर याद आती है और पछतावा होता है लेकिन अब पछतावत होत क्या, जब चिड़िया चुग गयी खेत!
बचपन में खेल-कूद की मनाही थी, बाहर खेलने पर बहुत मार पड़ती थी इसलिए शरीर मजबूत न हुआ. कालेज में एन.सी.सी. अनिवार्य थी इसलिए बेमन से जाना पड़ता और इतना दुखी हो जाता था और सोचता था कि भले पढ़ाई छूट जाये तो छूट जाये लेकिन एन.सी.सी. से किसी प्रकार पिण्ड छूटे. घर में हिन्द पाकेट बुक में वर्णित योगासन किया करता था लेकिन वह भी अनियमित था. विवाह के पहले मैं दुबला-पतला था, विवाह के बाद शरीर भरना शुरू हुआ और पेट बढ़ने लगा. यह सब इतने विस्तार से इसलिए बता रहा हूँ कि जीवन का बेहद महत्वपूर्ण समय में मैंने अपने शरीर की देखरेख में भीषण लापरवाही की जिसकी सज़ा मैंने अपने जीवन के उत्तरार्द्ध में तबीयत से भुगती.
जीवन का मध्यकाल स्वास्थ्य की दृष्टि से सामान्य रहा. भोजन से जितना रक्त बनता था, वह मेरे पिता और बड़े भाई साहब की डांट-डपट से 'बेलेंस' हो जाता था इसलिए न मरा, न मोटाया. इन दिनों पारिवारिक विद्रूपताओं और आर्थिक संकट ने चौतरफा हमला किया. परिवार से अलग होना पड़ा. बच्चे छोटे-छोटे थे, ज़िम्मेदारी बड़ी होती जा रही थी लेकिन न शरीर कमजोर पड़ा और न मन. किसी प्रकार बच्चे बड़े हो गये, देनदारी बढ़ गयी तब ही सन २००२ में मुझ पर कैंसर का पहला आक्रमण हुआ. मैं बच गया. पचपन वर्ष की उम्र में परिस्थितियों ने ऐसी करवट बदली कि मुझे स्वयं को मज़बूत करने का निर्णय लेना पड़ा और मैंने 'जिम' की शरण ली. दो साल तक लगातार गया और अपना वजन दस किलो कम किया अर्थात १०० से घटकर ९० किलोग्राम. जिम में 'वेट लिफ्टिंग' के दौरान रीढ़ की हड्डी में ऐसा दबाव पड़ा कि पंद्रह दिनों तक बिस्तर पर चुपचाप लेटा रहा और डाक्टर की सलाह पर 'जिम' से स्थाई अवकाश ले लिया.
सन २००७ में कोयंबत्तूर के ईशा फाउंडेशन के सात दिवसीय कार्यक्रम में मैं योग का विधिवत प्रशिक्षण लिया और तब से आज तक नियमित रूप से योगासन और प्राणायाम करता हूँ, प्रतिदिन डेढ़ घंटे का समय देता हूँ. आधा घंटे तक पैदल चलने के उपाय खोजता हूँ. सत्तरवां साल चल रहा है लेकिन मेरी उम्र की सुई पचपन में ही अटकी हुई है.
मेरा योग प्राणायाम चलता रहा लेकिन शरीर के अन्दर कैंसर के कीटाणु भी अपना काम करते रहे. अपने सर्जन से बीच-बीच में मिलता रहा, उन्होंने बताया कि पांच साल बीत गए हैं, अब कैंसर के पुनरागमन की संभावना नहीं के बराबर है लेकिन २००८ में उसी गाल में पुनः कैंसर के लक्षण उभर आये. फिर से सर्जरी हुई, अबकी बार काट-छांट अधिक हुई और चेहरा कुछ ऐसा हो गया कि जो मुझे देखता है, वह अजीब नज़रों से दोबारा देखता है. एक रिक्शावाले ने मुझसे नाराज़ होकर 'टेढ़मुंहा' कहा था, सही कहा था.
सन २००९ में दूसरे गाल में कैंसर के प्रारंभिक लक्षण दिखने लगे, फिर सर्जरी हो गई. उसके बाद अभी तक बचा हुआ हूँ, आगे जो होगा, देखा जाएगा.
प्रश्न यह है कि मैं अपना 'हेल्थ बुलेटिन' आपको क्यों बता रहा हूँ?
तो, आपको यह सब बताने का आशय यह है कि सर्वप्रथम हम यह समझें कि अधिकतर बीमारियों के कारण हम स्वयं हैं. कुछ बीमारियाँ अनुवांशिक भी होती हैं, वे समय आने पर उभरेंगी ही लेकिन यदि हम अपने शरीर की आंतरिक देखरेख करें तो संभावित बीमारियों से स्वयं को बचा सकते हैं. यदि अन्यान्य कारणों से हम बीमार पड़ भी जायें तो उससे बराबरी से लड़ सकते हैं.
सबसे पहले यह समझना ज़रूरी है कि हमारा शरीर 'सुपर कंप्यूटर' है, इस कंप्यूटर को मनुष्य नहीं बना सकता, केवल प्रकृति बना सकती है. इस अद्भुत शरीर में सारी क्रियाएं स्वसंचालित हैं, स्वस्थ रहना शरीर का स्वाभाविक गुण है और बीमारियाँ बाहरी संक्रमण का प्रभाव हैं.
योग से मैं संयोग से जुड़ा, हमारे पुत्र कुंतल (अब स्वामी रिजुडा) के सौजन्य से. इस उम्र में भी मुस्तैदी बनी हुई है. गर्दन और कमर का प्राचीन कष्ट विदा हो गया. दोनों घुटने सही काम कर रहे हैं. दवाविहीन जीवन जीने की कोशिश रहती है. यात्राओं का शौक है इसलिए हम पति-पत्नी अक्सर देश-विदेश घूमने निकल जाते हैं. यथासंभव कुली की सेवाएं नहीं लेता, सामान को कंधे में लाद कर आगे बढ़ जाता हूँ या सीढ़ियों पर ऊपर चढ़ जाता हूँ. मेरे मज़े हैं.
योगासन, प्राणायाम और ध्यान का आनंद 'गूंगे केरी सर्करा' है. नदी के किनारे खड़े होकर पानी को देखकर डरना और ज्ञान बताना अलग बात है और पानी में प्रवेश करके तैरने का आनंद लेना अलग बात है. किसी सुयोग्य योग मार्गदर्शक की तलाश करें, उनसे जुड़ें और योग का नियमित अभ्यास करें तो आपको जीवन में अभूतपूर्व बदलाव महसूस होगा, जितना डूबेंगे, उतना पाएंगे.
एक दिन जाना है, रोते हुए क्यों जाना? रोते हुए आये थे, हंसते-नाचते जाएंगे. आपको एक रहस्य की बात बता दूं, मैंने अपनी वसीयत में लिखा है कि मेरी मृत्यु पर कोई न रोये और मृत्यु के बाद जो भी रविवार आये, उस दिन एक पार्टी का आयोजन किया जाए और सब मिल कर मस्त नाचें और ख़ुशी मनाएं.
* * * * *
क्या खाने से फायदा है या खाने से नुकसान, इसे बचपन से अब तक सुनते चले आ रहा हूँ लेकिन सुनता भर हूँ, जो मन आता है या जो मिल जाता है, उसे खा लेता हूँ. उबला हुआ भोजन अरुचिकर लगता है, वहीँ पर तला हुआ भोजन या नमकीन या मिठाई देखकर खुद पर काबू पाना मेरे लिये दुष्कर है. आग्रह का कमजोर हूँ इसलिए कोई यदि प्रेम से अधिक खिलाता है तो मना नहीं कर पाता, क्या करूं?
धार्मिक और संस्कारी परिवार में जन्म हुआ इसलिए बुरी आदतों की ओर आकर्षण कम ही बना लेकिन गालियाँ देना और तम्बाखू खाना सीखा क्योंकि मेरे वरिष्ठ भी इनका उपयोग करते थे. बीड़ी-सिगरेट के धुएं की सार्वजनिक गंध जानता हूँ लेकिन व्यक्तिगत अनुभव शून्य है. सन १९६३ में गोवा में न-न करते एक गिलास बीयर पीनी पड़ी क्योंकि वह आतिथेय के सम्मान का सवाल बन गया था, बस, उसके आगे कुछ नहीं. खूब तम्बाखू खाई, सन १९६८ से १९९४ तक, छब्बीस साल, बाबा १६० से लेकर ज़र्दा तक, परिणामस्वरूप दांत ढीले हो गए और मुंह कम खुलने लगा. मेरे डाक्टर महेश कासलीवाल मुझे कहा करते थे- 'देख लेना, तुम कैंसर से मरोगे.' उनकी बात आधी सच हुई, मुझे मुंह में कैंसर हुआ, तीन बार आक्रमण हुआ लेकिन मैं कैंसर के कारण मरा नहीं, पंद्रह साल से उस शाही बीमारी से लड़-भिड़ रहा हूँ, जिंदा हूँ.
बचपन में राख से दांत मांजते थे, फिर बिटको का बन्दर छाप काला दन्त मंजन, फिर वैद्यनाथ का लाल दन्त मंजन, बबूल या नीम की मुखारी, फिर बिनाका का पेस्ट और सफ़ेद पावडर घिसा करते थे लेकिन पान और सुपारी चबाने की आदत के कारण मसूढ़े कमजोर पड़ते गये और पचास साल के अन्दर दांतों ने विद्रोह करना शुरू कर दिया. रही-सही कसर कैंसर की शल्यक्रिया में पूरी हो गई, न दांत रहे और न मसूढ़े. सब लोग मस्त चबा-चबाकर खाते है और मैं उनका मुंह देखते रहता हूँ. मेरा दिल होता है कि चना-मुर्रा खाऊँ, मूंगफली-काजू खाऊँ, खीरा-गाजर खाऊँ लेकिन अब दांतों के साथ खुद के द्वारा किये गये अत्याचार की रह-रह कर याद आती है और पछतावा होता है लेकिन अब पछतावत होत क्या, जब चिड़िया चुग गयी खेत!
बचपन में खेल-कूद की मनाही थी, बाहर खेलने पर बहुत मार पड़ती थी इसलिए शरीर मजबूत न हुआ. कालेज में एन.सी.सी. अनिवार्य थी इसलिए बेमन से जाना पड़ता और इतना दुखी हो जाता था और सोचता था कि भले पढ़ाई छूट जाये तो छूट जाये लेकिन एन.सी.सी. से किसी प्रकार पिण्ड छूटे. घर में हिन्द पाकेट बुक में वर्णित योगासन किया करता था लेकिन वह भी अनियमित था. विवाह के पहले मैं दुबला-पतला था, विवाह के बाद शरीर भरना शुरू हुआ और पेट बढ़ने लगा. यह सब इतने विस्तार से इसलिए बता रहा हूँ कि जीवन का बेहद महत्वपूर्ण समय में मैंने अपने शरीर की देखरेख में भीषण लापरवाही की जिसकी सज़ा मैंने अपने जीवन के उत्तरार्द्ध में तबीयत से भुगती.
जीवन का मध्यकाल स्वास्थ्य की दृष्टि से सामान्य रहा. भोजन से जितना रक्त बनता था, वह मेरे पिता और बड़े भाई साहब की डांट-डपट से 'बेलेंस' हो जाता था इसलिए न मरा, न मोटाया. इन दिनों पारिवारिक विद्रूपताओं और आर्थिक संकट ने चौतरफा हमला किया. परिवार से अलग होना पड़ा. बच्चे छोटे-छोटे थे, ज़िम्मेदारी बड़ी होती जा रही थी लेकिन न शरीर कमजोर पड़ा और न मन. किसी प्रकार बच्चे बड़े हो गये, देनदारी बढ़ गयी तब ही सन २००२ में मुझ पर कैंसर का पहला आक्रमण हुआ. मैं बच गया. पचपन वर्ष की उम्र में परिस्थितियों ने ऐसी करवट बदली कि मुझे स्वयं को मज़बूत करने का निर्णय लेना पड़ा और मैंने 'जिम' की शरण ली. दो साल तक लगातार गया और अपना वजन दस किलो कम किया अर्थात १०० से घटकर ९० किलोग्राम. जिम में 'वेट लिफ्टिंग' के दौरान रीढ़ की हड्डी में ऐसा दबाव पड़ा कि पंद्रह दिनों तक बिस्तर पर चुपचाप लेटा रहा और डाक्टर की सलाह पर 'जिम' से स्थाई अवकाश ले लिया.
सन २००७ में कोयंबत्तूर के ईशा फाउंडेशन के सात दिवसीय कार्यक्रम में मैं योग का विधिवत प्रशिक्षण लिया और तब से आज तक नियमित रूप से योगासन और प्राणायाम करता हूँ, प्रतिदिन डेढ़ घंटे का समय देता हूँ. आधा घंटे तक पैदल चलने के उपाय खोजता हूँ. सत्तरवां साल चल रहा है लेकिन मेरी उम्र की सुई पचपन में ही अटकी हुई है.
मेरा योग प्राणायाम चलता रहा लेकिन शरीर के अन्दर कैंसर के कीटाणु भी अपना काम करते रहे. अपने सर्जन से बीच-बीच में मिलता रहा, उन्होंने बताया कि पांच साल बीत गए हैं, अब कैंसर के पुनरागमन की संभावना नहीं के बराबर है लेकिन २००८ में उसी गाल में पुनः कैंसर के लक्षण उभर आये. फिर से सर्जरी हुई, अबकी बार काट-छांट अधिक हुई और चेहरा कुछ ऐसा हो गया कि जो मुझे देखता है, वह अजीब नज़रों से दोबारा देखता है. एक रिक्शावाले ने मुझसे नाराज़ होकर 'टेढ़मुंहा' कहा था, सही कहा था.
सन २००९ में दूसरे गाल में कैंसर के प्रारंभिक लक्षण दिखने लगे, फिर सर्जरी हो गई. उसके बाद अभी तक बचा हुआ हूँ, आगे जो होगा, देखा जाएगा.
प्रश्न यह है कि मैं अपना 'हेल्थ बुलेटिन' आपको क्यों बता रहा हूँ?
तो, आपको यह सब बताने का आशय यह है कि सर्वप्रथम हम यह समझें कि अधिकतर बीमारियों के कारण हम स्वयं हैं. कुछ बीमारियाँ अनुवांशिक भी होती हैं, वे समय आने पर उभरेंगी ही लेकिन यदि हम अपने शरीर की आंतरिक देखरेख करें तो संभावित बीमारियों से स्वयं को बचा सकते हैं. यदि अन्यान्य कारणों से हम बीमार पड़ भी जायें तो उससे बराबरी से लड़ सकते हैं.
सबसे पहले यह समझना ज़रूरी है कि हमारा शरीर 'सुपर कंप्यूटर' है, इस कंप्यूटर को मनुष्य नहीं बना सकता, केवल प्रकृति बना सकती है. इस अद्भुत शरीर में सारी क्रियाएं स्वसंचालित हैं, स्वस्थ रहना शरीर का स्वाभाविक गुण है और बीमारियाँ बाहरी संक्रमण का प्रभाव हैं.
योग से मैं संयोग से जुड़ा, हमारे पुत्र कुंतल (अब स्वामी रिजुडा) के सौजन्य से. इस उम्र में भी मुस्तैदी बनी हुई है. गर्दन और कमर का प्राचीन कष्ट विदा हो गया. दोनों घुटने सही काम कर रहे हैं. दवाविहीन जीवन जीने की कोशिश रहती है. यात्राओं का शौक है इसलिए हम पति-पत्नी अक्सर देश-विदेश घूमने निकल जाते हैं. यथासंभव कुली की सेवाएं नहीं लेता, सामान को कंधे में लाद कर आगे बढ़ जाता हूँ या सीढ़ियों पर ऊपर चढ़ जाता हूँ. मेरे मज़े हैं.
योगासन, प्राणायाम और ध्यान का आनंद 'गूंगे केरी सर्करा' है. नदी के किनारे खड़े होकर पानी को देखकर डरना और ज्ञान बताना अलग बात है और पानी में प्रवेश करके तैरने का आनंद लेना अलग बात है. किसी सुयोग्य योग मार्गदर्शक की तलाश करें, उनसे जुड़ें और योग का नियमित अभ्यास करें तो आपको जीवन में अभूतपूर्व बदलाव महसूस होगा, जितना डूबेंगे, उतना पाएंगे.
एक दिन जाना है, रोते हुए क्यों जाना? रोते हुए आये थे, हंसते-नाचते जाएंगे. आपको एक रहस्य की बात बता दूं, मैंने अपनी वसीयत में लिखा है कि मेरी मृत्यु पर कोई न रोये और मृत्यु के बाद जो भी रविवार आये, उस दिन एक पार्टी का आयोजन किया जाए और सब मिल कर मस्त नाचें और ख़ुशी मनाएं.
* * * * *
No comments:
Post a Comment