स्वयं प्रबंधन : बातें करना एक कला है
==========================
कहते हैं,‘बातहि हाथी पाइए, बातहि हाथी पाँव.’ बातों के मनोहारी प्रस्तुतीकरण से आपको पुरस्कार मिल सकते हैं और हृदय को चोट पहुंचाने वाली बातों से सज़ा. संसार के लोग अपनी परिचित भाषा में अपने विचारों, भावनाओं और दृष्टिकोणों की अभिव्यक्ति किया करते हैं. सात-आठ माह का शिशु भी अपने आस-पास सबको बोलता सुनकर खुद भी बोलना चाहता है. आ, ऎ, ओ, ऊ का उच्चारण करता नन्हा बच्चा स्वर-व्यंजन का अभ्यास करता सा लगता है. उसके पश्चात मा, पा, दा, हा जैसे शब्द उसकी प्रगति की सीढ़ी बनते हैं. इस प्रकार यह छोटी सी कोशिश मनुष्य की अभिव्यक्ति की यात्रा बन जाती है जो उसका आयुपर्यन्त साथ देती है. बच्चे जब बोलना शुरू करते हैं तो उनका कुछ-न-कुछ बोलने का बहुत मन होता है. वे परिचित शब्दों का प्रयोग करना चाहते हैं, छोटे-छोटे वाक्य बनाना चाहते हैं और सुनने वाले पर कही गई बात का असर देखते हैं. जब लोग उन्हें सुनकर हंसते हैं या शाबासी देते हैं तो उनका उत्साह बढ़ता है. इस प्रकार व्यक्तिगत शब्दकोष बढ़ते जाता है, भाव जुड़ते हैं, सोच जुड़ती है और बोलने की शैली विकसित होती जाती है. शैली में निरन्तर परिवर्तन होते रहता है और सीखने की प्रक्रिया चलती रहती है.
बोलने के तरीके पर सबसे पहले परिवार फ़िर संगी-साथियों और आस-पड़ोस के लोगों का सर्वाधिक असर होता है. सुसंस्कृत वातावरण में पले-बढ़े बच्चे सभ्य समाज में प्रचलित भाषा सीखते हैं, वहीं पर असभ्य लोगों के साथ वे अपशब्दों का प्रयोग सीख लेते हैं. यदि किसी के घर में बड़ों की या दोस्त-यारों की गालियां पिरो कर बातें करने की आदत है तो बच्चा उसका भी प्रयोग करके देखता है. आश्चर्य की बात यह है कि ऐसे भी अभिभावक पाए जाते हैं जो अपने बच्चे के अपशब्द प्रयोग से खुश होकर उसे बढ़ावा देते हैं. जबकि इसके विपरीत यदि बच्चे को डांट पड़ गई तो उसे अपनी गलती समझ में आ जाती है, फ़िर वह ऐसे प्रयोगों से बचने लगता है.
ऐसा देखा गया है कि मनुष्य की बातचीत की शैली पर उसके स्वभाव का सर्वाधिक प्रभाव पड़ता है. हमारे आस-पास दो प्रकार के व्यक्तित्व दिखाई पड़ते हैं- अन्तर्मुखी, जो कम बात करते हैं और बहिर्मुखी, जो अधिक बात करते हैं. अन्तर्मुखी अपनी प्रतिक्रिया देने में संक्षिप्त रहते हैं, कम-से कम शब्दों में काम चलाते हैं. ज़रा सा मुस्कुरा दिया, थोड़ी आंखें तरेर दी, बस कुछ इसी तरह. वहीं पर बहिर्मुखी व्यक्ति अपने प्रस्तुतीकरण में शब्दों और भावाभिव्यक्तियों का भरपूर उपयोग करते हैं.
कम बातें करने वाले लोग किसी को धीरे-धीरे प्रभावित करते हैं. कुछ भी कहने के पहले उस पर गौर करना और समय लेना- अन्तर्मुखी व्यक्तियों की विशेषता होती है. वे शब्दों की जगह शरीर की भाषा का अधिक उपयोग करते हैं. गंभीर स्वभाव और यथासंभव चुप रहने की आदत वाले ये लोग गलतफ़हमी के शिकार बहुत कम होते हैं क्योंकि वे तो चुप रहकर केवल सुनते रहते हैं. ये लोग निर्णय लेने में ज़ल्दबाज़ी नहीं करते. आम तौर पर वैज्ञानिक, कूटनीतिज्ञ, चिन्तक-विचारक इसी स्वभाव के होते हैं. अन्तर्मुखी लोगों को पार पाना कठिन होता है. इस प्रकार के लोग सामान्यतया विवादों से दूर रहते हैं. कब, कितना और क्या बोलना- इसकी समझ रखते हैं. ये लोग अधिक लोकप्रिय नहीं होते, साथ ही अलोकप्रियता से भी बचे रहते हैं.
अब सिक्के के दूसरे पहलू पर गौर करें, रहस्य का आवरण ओढ़े ये मौनी स्वयं को परम विद्वान मानते हैं और दूसरों को हेय दृष्टि से देखते हैं. चुप रहकर ऐसे हाव-भाव बनाते हैं जैसे बुद्धि का भंडार केवल इनके पास है, बाकी लोग नासमझ हैं. अपनी इस तथाकथित बुद्धिमत्ता के चलते किसी दूसरे की बातों को बेकार मानते हुए अस्वीकृत कर देने में गर्व की अनुभूति करते हैं. इन्हें निर्णय लेने में देर लगती है साथ ही रूखे-सूखे व्यवहार और नीरस वार्तालाप के कारण स्वभाव से ही कृपण बन जाते हैं. मुस्कुराने और बोलने-बताने में कंजूस ये अन्तर्मुखी स्व-अर्जित ज्ञान को अपने साथ लेकर ही संसार से विदा लेने की कामना रखते हैं. ये कमजोरियां उन्हें व्यवहारकुशल इन्सान बनने में रुकावट पैदा करती हैं.
भरपूर बातें करने वालों को बहिर्मुखी कहा जाता है. बेलाग बोलना और विस्तार से समझाकर कहना- इनकी विशेषता होती है. संप्रेषण कला में दक्ष ये लोग अपना पक्ष उपलब्ध माध्यम के जरिए इस तरह प्रस्तुत करते हैं ताकि श्रोता तक इनका संदेश आसानी से पहुंच जाए. दोस्तों, समाज-समूह में ये आकर्षण के केन्द्र होते हैं. पढ़ने-लिखने का शौकीन बहिर्मुखी व्यक्ति अच्छा वक्ता बन कर समूह को प्रभावित करने की योग्यता विकसित कर लेता है. राजनीति, प्रशासन, अध्यापन, वकालत, चिकित्सा और व्यापार में इनकी पकड़ सहज बन जाती है. पार्षद बनने, छात्र नेतागिरी या मोहल्ला स्तर का 'दादा' बनने में यह गुण अत्यन्त उपयोगी होता है.
अब इनका भी सिक्का पलटकर देखिए- इनके मन में जो आता है, कह देते हैं, पाचन शक्ति कमजोर होती है इसलिए कुछ छिपाकर रखना इनके लिए कठिन होता है. अपनी बातें बताने का इतना शौक होता है कि वे सामने वाले को बोलने का मौका ही नहीं देते, परिणामस्वरूप समय बर्बाद करने वाली निरर्थक बातें करना, बिना मांगे सलाह देना, किसी की गैरहाज़िरी में उसकी आलोचना करना या हंसी उड़ाना- उनकी पटकथा में सदैव शामिल रहता है. कब बोलना, कितना बोलना और कैसे बोलना- इसका संतुलन अक्सर गड़बड़ाते रहता है.
एक बच्चा ढाई साल का हो गया और उसने बोलना शुरू नहीं किया, माता-पिता चिंतित थे. उन्होंने डाक्टर की सलाह ली, डाक्टर ने कुछ माह और इन्तज़ार करने की सलाह दी क्योंकि कई बच्चे देर से बोलना शुरू करते हैं. कुछ समय बीत जाने के बाद बच्चे के माता-पिता से डाक्टर की मुलाकात हो गई. डाक्टर ने पूछा- ‘क्यों आपका बच्चा बोलने लग गया?’
‘वो तो कब से बोलना सीख गया, अब उसे चुप रहना सिखा रहे हैं.’ माँ ने बताया.
‘वो तो कब से बोलना सीख गया, अब उसे चुप रहना सिखा रहे हैं.’ माँ ने बताया.
अधिक बातें करने से कोई लाभ नहीं होता. दरअस्ल, अपनी बात कहने के चक्कर में इनका सुनना बन्द हो जाता है इसलिए सामनेवाले के विचार, दृष्टिकोण और सोच को ये नहीं जान पाते. इस प्रकार संप्रेषण अधूरा और एक-मार्गी हो जाता है.
सामान्यतया, बहिर्मुखी व्यक्तियों के बोलने की शैली क्रमशः आक्रामक होती जाती है. शब्दों के चयन में होने वाली असावधानी, ज़रूरत से ज़्यादा बातें करना और स्वयं को दूसरे से अधिक होशियार मानने का भाव सामनेवाले पर विपरीत प्रभाव डालता है. कुछ लोग अपशब्दों के प्रयोग और दिल को चोट पहुंचाने वाली बातें कहने के आदी हो जाते हैं जिससे लोग आहत होते हैं, आपसी कड़ुवाहट पैदा होती है और संबन्धों में दरार बनने लगती है.
अधिक बोलने वालों का एक वर्ग ‘मुंहफ़ट’ लोगों का होता है. इनका वेद-वाक्य होता है- ‘हम जो कहते हैं, खरा-खरा कहते हैं और मुंह पर कहते हैं.’ ये लोग सदैव न्यायाधीश की मुद्रा में रहते हैं और बिना डरे अपनी बात कहने पर विश्वास करते हैं. जैसे ही कोई घटना उनके संज्ञान में आती है, वे त्वरित टिप्पणी के लिए आतुर रहते हैं. खरी-खरी बातें करने वाले ये लोग अपनी छबि इस तरह बर्बाद कर लेते हैं कि इनसे सम्पर्क में आनेवाले लोग इनके सामने पड़ने से कतराने लगते हैं और यदि आमना-सामना हो ही गया तो मन ही मन कहते हैं- ‘हे भगवान!’
कुछ ‘मुंहफ़ट’ लोग प्रसिद्ध भी हुए हैं जैसे- कबीर. उन्होंने अपनी वैचारिक प्रखरता से तात्कालीन समाज में व्याप्त कुरीतियों व धारणाओं पर कड़ी चोट की जो आज भी प्रासंगिक हैं. मुंहफ़ट कवि और मुंहफ़ट व्यक्ति में अन्तर होता है, कवि, व्यवस्था पर चोट करता है जबकि सामान्य व्यक्ति लोगों के हृदय पर. यह सम्बंधों को सहेज कर रखने का युग है, इसलिए समझदार लोग साफ़-साफ़ बातें करने से परहेज करने लग गए हैं. किसी की कमियों पर ध्यान आकर्षित करने के लिए अब सावधानीपूर्वक संकेत दिए जाते हैं ताकि संदेश पहुंच जाए और सामनेवाले को बुरा भी न लगे.
प्रभावी संप्रेषण की तकनीक समझना और अपनी शैली में आवश्यक परिवर्तन करते रहना बहुत ज़रूरी है. दूसरों को अपनी बातें समझाना कोई आसान काम नहीं है परन्तु उससे भी कठिन दूसरों की बातें समझना है. समझने का गुर है- धैर्यपूर्वक सुनने की आदत विकसित करना. जैसे- जैसे सुनने और समझने की कला में आप प्रवीण होते जाते हैं, आपका व्यक्तित्व निखरने लगता है और आप सफ़लता के सोपान तय करने लगते हैं.
अन्तर्मुखी या बहिर्मुखी होना जन्मजात नहीं, वरन किसी भी व्यक्ति के व्यक्तिगत अनुभवों से धीरे-धीरे विकसित होने वाली शैली है. आत्मविश्लेषण कर यह पता करें कि आप किसी ‘अति’ के शिकार तो नहीं हैं? अपने आकलन के प्रति आप जितने ईमानदार होंगे, वास्तविकता के उतने ही नज़दीक होंगे. तो, परिवर्तन के लिए तैयार हो जाइए, यह एक उपयोगी सूत्र है.
* * * * *
No comments:
Post a Comment