Sunday, 13 January 2019

सिनेमा : प्रभावशाली हिंदी सिनेमा

बीसवीं शताब्दी की शुरुआत में जब चलती-फिरती तस्वीरें परदे पर उभरी तो हिन्दुस्तान में खलबली मच गईदर्शकों के लिए सिनेमा का आगमन किसी जादू से कम नहीं था। सिनेमा के आविर्भाव ने दर्शकों का ऐसा वर्ग तैयार किया जो सहस्त्रबाहु की तरह बढ़ता ही गया और वह मनोरंजन का सर्वाधिक लोकप्रिय माध्यम बन गया जब देश में सिनेमाहाल बनने लगे तो दर्शकों की संख्या और बढ़ने लगी। कालांतर में फिल्में जनमानस को सन्देश देने का प्रभावशाली माध्यम बन गई
          
सिनेमा की तकनीक ने दर्शकों के मनोविज्ञान को चुपके से प्रभावित किया। यद्यपि फिल्मों की कहानियां महज़ मनोरंजन के लिए लिखी जाती थी लेकिन उनका प्रभाव व्यापक होता था। वे फिल्में मनोरंजन के साथ-साथ मानव व्यवहार की विशेषताओं और कमजोरियों पर दर्शकों से खुली चर्चा करने लगे। मनुष्य के स्वभाव में कुछ बातें सार्वभौमिक हैं जैसे, प्रेम और घृणा, दया और दुष्टता, स्नेह और ईर्ष्या, राग और विराग, सहनशीलता और क्रोध, आनंद और आतंक, समझदारी और नासमझी आदि। हिन्दुस्तानी सिनेमा ने इन्हीं भावनाओं के आसपास बिखरी हुई कहानियों को अपनी फिल्म की विषयवस्तु बनाया और इनका भरपूर विदोहन किया।    
          
भारत में राम और कृष्णलीला की प्राचीन परम्परा रही है इसलिए शुरूआती सिनेमा पौराणिक कथाओं के चित्रांकन से आरम्भ हुआ जो सुर-असुर के मध्य संघर्ष में बुराई पर अच्छाई की विजय की प्रमाणिकता और भगवान की सत्ता भर विश्वास जन-मन में स्थापित करने में सफल रहा। धार्मिक फिल्मों ने अतीत की कथाओं को वर्तमान में इस तरह प्रस्तुत किया कि दर्शक धर्म के प्रति अधिक आस्थावान होकर आत्मिक गहराई से जुड़ सके। चूँकि फिल्मकार फ़िल्में धन कमाने के लिए बनाते थे इसलिए कथानक का चुनाव करते समय दर्शकों की संख्या का गणित उनके दिमाग में सदैव बना रहता था, आज भी ऐसा ही चल रहा है। उन दिनों अधिकतर फ़िल्में हिन्दू धर्म में प्रचलित दंतकथाओं पर बनी क्योंकि उसका दर्शक वर्ग बहुत बड़ा था। कुछ मुस्लिम मान्यताओं पर भी फ़िल्में बनी जिन्होंने मुस्लिम समुदाय को मोहित और प्रभावित किया। ईसाई मतावलंबियों के लिए भी फ़िल्में बनी होंगी लेकिन वे मेरी जानकारी में नहीं हैं, हां, बीसवी सदी के अंत में ईसाई परिवारों के जीवन पर अनेक लोकप्रिय फ़िल्में बनी और उनका असर समाज के सभी वर्गों पर समान रूप से पड़ा। मेरा अनुमान है कि इन फिल्मों ने भारतीय समाज में आधुनिकता का प्रसार करने में महती भूमिका निभाई। 
          
सन 1940 से 1960 के मध्य धार्मिक फिल्मों के साथ-साथ ऐतिहासिक घटनाओं पर केन्द्रित फिल्में भी बनी और उसके बाद अमरीकी 'काउ बॉय' फिल्मों की नकल पर मारधाड़ वाली स्टंट फिल्में भी बनी लेकिन इन फिल्मों को समाज ने इन्हें बहुत गंभीरता से नहीं लिया। उसके बाद सामाजिक विषयों पर बनी फिल्मों का दौर चला जिसने भारतीय समाज की कुप्रथाओं पर गहरी चोट की तथा जनमानस को नवीन दृष्टिकोण से विचार करने और अपनाने के लिए मानसिक रूप से तैयार किया।
          
आज़ादी के पूर्व काल में भारतीय जनमानस शिक्षित नहीं था। घरों में प्रचलित परिपाटी के अलिखित आदेश पर परिवार संचालित होते थे, पुराने रीति-रिवाजों का अखंड वर्चस्व था। ये सामाजिक नियम मजबूती से माने और कड़ाई से मनाए जाते थे। कम उम्र में विवाह होते थे, उसी अपरिपक्व आयु में स्त्री का गर्भाधान होता था। अक्सर बच्चे का जन्म देते समय या तो समुचित देखरेख के अभाव में माँ मर जाती थी या बच्चा निपट जाता था। स्त्री जब तक गर्भधारण करती रहे, उसे उतने बच्चे जनने पड़ते थे, आम तौर पर एक स्त्री के दस से पंद्रह बच्चे होना सामान्य बात थी। उसे घर के बाहर परदा करना पड़ता था और घर के भीतर भी। एक हाथ का लंबा घूँघट काढ़ कर चूल्हे में भोजन बनाने और परोसने वाली औरत की उसके अपने घर-परिवार में कोई आवाज़ नहीं थी। जब तक उसका पति जीवित होता तब तक वह मनुष्य जैसी होती लेकिन यदि पति का असमय निधन हो गया तो वह स्त्री न मनुष्य रह पाती न निरीह पशु। विधवा विवाह की बात सोचने से पुरुषों के समूह को पाप लग जाता था।
          
उन दिनों संयुक्त परिवार की व्यवस्था बेहद दोषपूर्ण थी जिसमें प्यार और स्नेह की जगह डांट-फटकार और आतंक का बोलबाला था। परिवार के सदस्यों में आपसी बातचीत का अभाव था, 'चुप रहो' का साम्राज्य था। विवाह के निर्णय पर बुजुर्गों का एकाधिकार था, जिन युवाओं की शादी होती थी वे निरीह पशुओं की खरीद-बिक्री की तरह चुपचाप अपने खूँटे बदल लेते थे। अविवाहित स्त्री और पुरुषों को प्यार करने की मनाही थी, यहाँ तक कि विवाह के बाद भी पति-पत्नी को प्यार दिखाने पर प्रतिबंध था। पिता-पुत्र के संबंध सदैव खिंचे-खिंचे रहते थे, सास-बहू के सहसंबंध बाघिन और बकरी की तरह हुआ करते थे।
          
भारतीय सिनेमा ने तात्कालीन हिन्दू-मुस्लिम परिवारों की परिस्थितियों को बारीकी से छुआ, उनकी विसंगतियों को उजागर किया और उस पर 'कुछ' नया करने की ज़रूरत को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया। 
          
सिनेमा की विधा दर्शकों को आकर्षित करती है लेकिन फिल्म निर्माण की प्रक्रिया इतनी जटिल है कि इससे जुड़े लोगों को आप पागल कह सकते हैं। इस पागलपन के पीछे उनकी अनेक उम्मीदें नृत्य करती हैं, कोई सिनेमा से पैसा कमाना चाहता है तो कोई नाम। आम तौर पर फ़िल्मकार की नज़र दर्शकों की रुचि पर टिकी रहती है जो समय-समय पर बदलती रहती है। फिल्म की सफलता का कोई निश्चित पैमाना नहीं है, 'जय संतोषी माता' सुपर हिट हो जाती है, 'मेरा नाम जोकर' बुरी तरह पिट जाती है। साधारणतया भारतीय फिल्म किसी निर्माता-निर्देशक की अजीब सी उधेड़-बुन का परिणाम होता है जो जनसामान्य पर अपना प्रभाव डाले, न डाले, निर्माता की आर्थिक स्थिति को अवश्य प्रभावित करता है। फिल्म बनाने के लिए केवल धन ही नहीं, धन डुबाने का हौसला भी चाहिए होता है।
          
जिनकी नज़र केवल पैसा पीटने की होती है वे फ़िल्मकार अपनी फिल्म को खट्टी-मीठी-चटपटी चाट की तरह तैयार करता है क्योंकि ऐसी फिल्म के प्रदर्शन पर सिनेमा की टिकट खिड़की पर लंबी लाइन लगने की संभावना अधिक होती है। वहीं पर कुछ ऐसे भी होते हैं जो सामाजिक सरोकार से जुड़ी फिल्में बनाते हैं ताकि वे अपनी फिल्म के माध्यम से नकारात्मक माहौल को दिखाकर समाज को कुछ सकारात्मक संदेश दे सकें।
          
विगत शताब्दि के मध्यकाल में मद्रासी फिल्म निर्माताओं ने पारिवारिक विषयों पर एक से बढ़कर एक शानदार फिल्में बनाई और भारतीय परिवारों में व्याप्त विसंगतियों पर मनोरंजक प्रहार किया। 'ललिता पवार टाइप' सास अपनी बहू के साथ 'लेडीज़ क्लास' में अगल-बगल बैठकर इन फिल्मों को देखती थी और फिल्म के कथानक में जब सास के द्वारा बहू पर अत्याचार का दृश्य पर्दे पर आता तो बहू के संग सास भी सिसक-सिसक कर रोती क्योंकि सास भी तो कभी बहू थी! जेमिनी, ए॰वी॰एम॰, एल॰वी॰प्रसाद आदि निर्माताओं ने अपनी फिल्मों के माध्यम से बहुओं के प्रति सासों के कड़क व्यवहार को कुछ हद तक 'डायल्यूट' किया था। यह परिवर्तन उन फ़िल्मकारों के साझा प्रयास का प्रतिफल था।
          
एक और संकट था उन दिनों युवाओं के लिए, विपरीतलिंगी प्यार पर समाज का कड़ा विरोध। इसके पहरेदार हर समय प्रेमियों की हरकतों पर सतर्क निगाह रखते थे और ज़रा सी भनक लगने पर क्रोध से भभकने लगते थे। दरअसल, 'वे मुहब्बत के दुश्मन नहीं थे, उसूलों के गुलाम थे।' लेकिन प्यार ऐसा जज़्बा है, चाहे जितनी पाबंदी लगाई जाए, हो जाता है। आश्चर्य की बात यह है कि विवाह जैसा जीवन के लिए महत्वपूर्ण संस्कार निपट अंजान से किया जा सकता था लेकिन किसी युगल का जान-पहचान के आधार पर विवाह होना असंभव था। एक मुश्किल यह भी थी कि प्रेमी प्यार करने के पहले जात-कुजात का विचार नहीं करते थे, प्यार अक्सर ऊंची-नीची जाति में होते थे, इस वजह से उन दिनों सामाजिक परंपरा के संकट खड़े हो जाते थे। प्यार करने वाले आशिक और माशूका दोनों को पहले तो घर में मनाया-समझाया जाता था फिर न मानने पर लतियाया जाता था। परिणामतः आत्महत्या और घर से भागना जैसे दुस्साहसिक प्रयोग बड़ी संख्या में सुनाई पड़ते थे।
          
देश की आज़ादी के आसपास स्त्री-पुरुष प्रेम पर आधारित फिल्मों का जो सिलसिला शुरू हुआ तो आज तक थमा नहीं है। सन 1944 में एक फिल्म 'रतन' प्रदर्शित हुई जिसमें नौशाद की धुन पर प्रेमरस से पगे हुए ऐसे मधुर गीत थे कि जिसने भी उन्हें सुना, प्यार की भावना से सराबोर हो गया। उन गीतों ने मोहब्बत करने वालों को दीवाना बना दिया। उस जमाने के लोग बताते हैं कि फिल्म 'रतन' से प्रभावित होकर अनेक अविवाहित जोड़े घर से भाग गए और समाज के विरोध की परवाह किए बिना विवाह कर लिया और अपनी गृहस्थी बसा ली। इस फिल्म के 29 वर्ष बाद 'बॉबी' आई जिसका असर 'रतन' से बहुत आगे बढ़कर हुआ। उन युवाओं ने घर-परिवार से विद्रोह करके अपनी आज़ादी की नई इबारत लिखी और पुराने उसूलों की धज्जियाँ उड़ा दी। ऐसी रोमांटिक भारतीय फिल्मों की लिस्ट लंबी है जिसने युवा पीढ़ी की सोच में परिवर्तन लाने एवं उनमें साहस के संचार करने का अद्भुत कारनामा कर दिखाया और अनेक युवाओं को आत्महत्या जैसा घटिया निर्णय लेने से बचाया।
          
1947 में देश को आज़ादी मिली, पूरा देश खुशहाली के सपने आशा भरी निगाह से देख रहा था। आज़ादी के बाद कई फिल्मों भूख और बेकारी को केंद्र में रखकर बनाई गई ताकि भारत के आवाम की जरूरतों को सार्थक दिशा दी जा सके। ख़्वाजा अहमद अब्बास जैसे कई लेखकों की कलम ने गरीबी की तकलीफ़ों को सिनेमा के पर्दे पर पहुंचा कर जन गण मन को शब्द दिए। ऐसी फिल्में अधिक नहीं बनी लेकिन जो बनी, उन्होंने अपनी उपस्थिति दर्ज़ कराई और दर्शकों ने उन फिल्मों को बेहद शिद्दत से देखा।
          
1960 से 2000 तक की फिल्में मुहब्बत के तराने गाते हुए आई। ऐसा लगा जैसे भारतीय फिल्मों में मस्ती छाई हुई है। प्रेमकथा में संयोग और वियोग को पिरोया गया, विविध शैली के खलनायकों के चरित्र गढ़े गए, भावपूर्ण गीत लिखे गए, मधुर संगीत से सजाया गया। उस युग का युवा वर्ग उन फिल्मों को देखकर थिरकने लगा। श्वेत-श्याम फिल्में कम होती गई और 'गेवाकलर', 'टेक्निकलर' फिल्में आ गई जो देखने में मनमोहक और अधिक प्रभावशाली हो गई। इसी काल में समानान्तर सिनेमा आया जिसने अनेक कलात्मक फिल्में दी और देश भर में वैसा प्रबुद्ध दर्शक वर्ग तैयार कर दिया जैसा पश्चिम बंगाल में था।
          
फिल्मों की कलाकारों की वेषभूषा का जनमानस पर गहरा प्रभाव पड़ा। सन 1950 तक नायक-खलनायक-सह कलाकार आम तौर पर धोती-कुरता पहनते थे लेकिन उसके बाद वे शर्ट-फुलपेंट पहनकर अवतरित होने लगे। धोती जिस तरह सिनेमा से गुम हुई, उसी तरह उस समय के युवकों ने धोती पहनना छोड़ दिया और शर्ट-फुलपेंट अपना लिया। फिल्म में यदि नायक को ईमानदार और भले आदमी के रूप में प्रस्तुत करना हो तो उसे मज़बूरी में कुरता-पायजामा पहना कर उतारा जाता था जैसे 'सुजाता' में सुनील दत्त और 'सत्यकाम' में धर्मेंद्र। जब 'सुपर स्टार' राजेश खन्ना का जलवा हिंदुस्तान के सिनेमा जगत में बिखरा तो पुराने जमाने का कुरता और नए जमाने का फुलपेंट एक साथ चलन में आया और 'गुरु कुरता' फैशन में छा गया, जिसे पुराने और तात्कालिक परिधान का 'फ्यूजन' कहा जा सकता है।
          
साड़ी पहनने वाली नायिकाएँ सलवार-कमीज पहनने लगी तो लड़कियों ने भी साड़ी त्यागकर चूड़ीदार सलवार-कमीज पहन ली। सार्वजनिक रूप से ढँकी-छुपी स्त्री की देह हौले-हौले खुलने लगी। घरेलू बहुओं के घूँघट सिर पर टिके पल्लू में आकर रुक गए, स्त्रियॉं के ब्लाउज़ और कुरती की बांह ऊपर खिसकने लगी, अधोवस्त्र कम होने लगे। सबसे गज़ब अभिनेत्री साधना ने ढाया। उसका माथा बहुत बड़ा था जो फिल्म के निर्माता-निर्देशक को 'फोटोजनिक' नहीं लग रहा था इसलिए साधना के सिर के सामने वाले कुछ बाल मेकअपमेन ने उसके माथे पर तनिक 'ट्विस्ट' देकर चिपका दिए। साधना हिट हो गई तो साधना-कट 'हेयर स्टाइल' भी हिट हो गई और अधिकांश युवतियों ने अपने माथे पर उसी तरह बाल चिपका लिए।
          
सिनेमा ने नशे की आदतों को बहुत प्रोत्साहित किया। अशोक कुमार, देव आनंद, प्राण जैसे कलाकार हर फिल्म में सिगरेट फूंकते थे, धुएँ के गोल छल्ले बनाते थे और ऊपर शून्य में ताकने का अभिनय करते थे। युवकों ने उसे फैशन की तरह अपना लिया और हर दूसरा युवक सिगरेट पीने की लत लगा बैठा। बिलकुल ऐसा ही असर शराब का भी हुआ। मनुष्य के स्वास्थ्य और खुशहाली को नष्ट करने वाली शराब को अनेक फिल्मों ने 'प्रमोट' किया। गम भुलाने के लिए पी गई शराब ने पीने वालों को ही पी लिया, कई कलाकार पीने का अभिनय करते-करते स्वयं शराब की चपेट में आ गए और असमय काल के गाल में चले गए। मीनाकुमारी जैसी अद्भुत कलाकार इसी लत का शिकार होकर देखते-देखते हमारी आँखों से ओझल हो गई। दर्शक तो फिल्मों से और आगे निकल गए, फिल्मों ने गम भुलाने के लिए पीने का उपाय समझाया लेकिन 'पब्लिक' खुशी मनाने के लिए भी पीने लगी। अब हाल यह है कि शराब न पीने वाले 'सोसाइटी' में पिछड़े हुए माने जाते हैं !
          
किसी जमाने में छोटे-छोटे घर थे, उनमें पूरा परिवार मिल-जुल कर रहता था। घरों में जगह कम थी लेकिन लोगों के दिलों में जगह की कोई कमी न थी। बीसवी शताब्दी के अंतिम कालखंड में लोगों के दिल सिकुड़ गए और घर में रहने की जगह कम पड़ने लगी। फिल्मों में घरों के लिए सजाए गए 'सेट' और सोफासेट दर्शकों की आँखों से होकर उनके दिमाग में प्रवेश कर गए और घर की कल्पना ने वही वृहद आकार ले लिया जो उस काल के सिनेमा में दिखाया गया। उसी शैली के घर बनवाने के लिए भरपूर धन की ज़रूरत थी इसलिए उतनी मात्रा में धन जुगाड़ने की चाहत उत्पन्न हुई और लोग उस तरफ अधाधुंध दौड़ पड़े। धन आए, चाहे जिस तरह आए, अपना घर बनेगा तो वैसा जैसा फिल्मों में होता है, बाथरूम बनेगा तो वैसे 'बाथ टब' वाला जिसमें 'हीरोइन' नहाती है। सिनेमा के असर ने शानदार घरों की कतार खड़ी कर दी और उन भवनों के निर्माण में लगाने वले धन को अर्जित करने के लिए नैतिक मूल्य गौड़ हो गए, मानवीय गुणों का क्षय हो गया।
          
आज़ादी के बाद देश में समृद्धि आई, भले ही वह कम लोगों के हिस्से में आई। हमारे राजनीतिज्ञों का पूर्वानुमान है कि वह समय भी आएगा जब देश का हर नागरिक समृद्ध हो जाएगा। इस समृद्धि के सपने हम सब देखते हैं, पता नहीं वे दिन आएंगे या नहीं लेकिन एक सिने-दर्शक जब टिकट खरीद कर सिनेमाहाल की सीट पर बैठता है तो दो-अढ़ाई घंटे की समृद्धि पर उसका पूर्ण अधिकार रहता है। उतने समय तक उसके पास एक शानदार हवेली होती है, खूबसूरत कार होती है, मादक जोड़ीदार होता है। वह उन क्षणों में जी कर अपने भूत और भविष्य काल को भुला देता है, यह समय उसका खरीदा हुआ समय होता है, उसका अपना। इसी समृद्धि का दिवास्वप्न सिनेमा की लोकप्रियता का आधार है जो हर फिल्म में घुमा-फिराकर अलग-अलग ढंग से दिखाया जाता है।
          
समृद्धि के प्रदर्शन के लिए फ़िल्मकार बड़े सेट लगवाता है, ड्रेस डिजाइन करवाता है, गहने पहनाता है, कलाकारों के चेहरे पर मेकअप करके छ्द्म आभा बिखेरता है। ट्रिक फोटोग्राफी और कंप्यूटर की मदद से नकली को असली बना कर दर्शक के समक्ष प्रस्तुत करता है। अधिकतर फिल्मों का असर दो-अढ़ाई घंटे तक ही रहता है लेकिन कुछ फिल्में बहुत गहरे तक असर कर जाती हैं।
          
सादगी और ईमानदारी के झूले में अच्छाई के झोंके लेते समाज ने अचानक करवट ली और झूले से नीचे उतर कर जमीन में अपनी बाहें समेटता खड़ा हो गया, जैसे चलती गाड़ी में किसी ने 'गेयर' बदल दिया हो। आज़ादी के चालीस वर्षों से निराश भारतीय अकड़ कर खड़ा हो गया और उसने गरज कर कहा, 'जहां हम खड़े होते हैं वहीं से लाइन शुरू होती है।' 'एंग्रीयंगमेन' के सनसनीखेज अवतरण ने युवाओं को अतिआत्मविश्वास, दुस्साहस और मनमर्जी का ऐसा धारदार हथियार दे दिया कि समाज में शिक्षित-अशिक्षित का अंतर समाप्त हो गया, शिष्टता और शालीनता प्रश्नवाचक चिन्ह बन गई।
          
किसी भी समाज को उसकी सज्जनता और परिश्रम से पहचान मिलती है। भारतवासी स्वाभाविक रूप से सहनशील और सरल स्वभाव के हैं। बहुसंख्य लोगों को कानून में लिखी धाराओं से कोई सरोकार नहीं रहता क्योंकि वे जीवन भर समाज के उन अलिखित नियमों के अधीन रहते हैं जो उन्हें किसी ने बताए-समझाए नहीं है लेकिन वे स्वयमेव प्रशिक्षित हो जाते हैं। इसके बावजूद शासन के द्वारा नियम-अधिनियम इसलिए बनाए जाते हैं ताकि लोग नियम भंग करने से डरें। नियमों के पालन के लिए पुलिस है और पुलिस के ऊपर न्यायालय। जब समाज को ऐसा लगता है कि पुलिस और न्यायालय उसके हितों की रक्षा नहीं कर रहे हैं, अपराधियों पर उनका दबाव नहीं है तब समाज में से ऐसे लोग प्रगट होने लगते हैं जो कानून के पालन करवाने के लिए कानून को अपने हाथ में लेने लगते हैं और गैर-इरादन गैर-कानूनी कार्य करने लगते हैं। हिन्दुस्तानी फिल्मों ने पश्चिमी फिल्मों से प्रभावित होकर ऐसे लोगों को प्रोत्साहित करने में बेहद गैरजिम्मेदाना भूमिका निभाई। विगत तीस वर्षों में भारत में बनी फिल्मों का विवेचन किया जाए तो आधी से अधिक फिल्में ऐसे ही विषयों पर बनी जिसने युवाओं की सोच को नकारात्मक दिशा दी। लचर प्रशासनिक और न्यायिक व्यवस्था से उपजे असंतोष के कारण कानून अपने हाथ में लेने वालों की संख्या बहुत बढ़ी है जो अत्यंत चिंताजनक है।
          
सन 1940 से 1990 तक पचास वर्षों की अवधि में अनेक फिल्में स्त्री-पुरुष प्रणय सम्बन्ध को केंद्र में रखकर बनी। तात्कालिक समाज में स्त्री-पुरुष के विवाहपूर्व प्रेम प्रसंग स्वीकार्य नहीं थे, इस बात को फ़िल्मकारों ने बखूबी भुनाया और उनकी छुपी इच्छाओं को अभिव्यक्ति दी। फिल्म ऐतिहासिक हो या धार्मिक, सामाजिक हो या पारिवारिक, जासूसी हो या मारधाड़ वाली, पूरी फिल्म में एक प्रेमकथा साथ-साथ चलती थी। प्यार के रास्ते पर कांटे बिछाने वालों कीदुष्टता का असर दर्शकों पर इतना अधिक होता था कि वह खुद को पीड़ित महसूस करने लगता था। प्रेम की आत्मीयता, त्याग और पीड़ा से लबरेज ये फिल्में दर्शकों के हृदय में बस गई और उन्हें आत्मिक प्रेम की ऊंचाई पर स्थापित किया। इन फिल्मों में प्रेम से होने वाली अनुभूति का नाचता-गाता चित्रण होता था। इन फिल्मों में पिरोए गए मधुर गीत आज भी जीवंत हैं और सदियों तक ज़िंदा रहेंगे।
          
उसके बाद प्यार करने का अंदाज़ बदला। पुरानी फिल्मों में नायक को प्यार होता था, नायिका उसके प्यार में 'पड़' जाती थी, इस काल की फिल्मों ने 'प्यार हो जाने' की शैली में किंचित परिवर्तन किया और दोनों पक्ष एक-दूसरे से प्रेम की पहल करने लगे। सन 1990 के बाद की फिल्मों ने युवाओं के प्यार को नई दिशा दी, अब नायिका प्यार की पहल करती है और नायक भागा-भागा फिर रहा है। प्यार की पहल कोई भी कर सकता है, इसमें कोई ऐतराज़ नहीं लेकिन वर्तमान में प्यार की भाषा और परिभाषा दोनों बदल गई है। प्रेमी-प्रेमिका का प्रेम अब 'यूज एंड थ्रो' वाले खेल में तब्दील हो गया। आत्मिक संबंधों का स्थान दैहिक सम्बन्ध ले चुके हैं। विवाह-पूर्व दैहिक संबंध बनाने की वर्जना अब 'यू टर्न' ले रही है. सामाजिक सोच के इस परिवर्तन का असर हमारी विवाह व्यवस्था को प्रभावित कर रहा है।
          
फटाफट प्यार का यह सूत्र उन्हें आधुनिक सिनेमा की रोमांटिक कहानियों से मिला। फिल्म बनाने वाले कहते हैं, 'हम वही बनाते हैं जो लोग देखना चाहते हैं।' जबकि दर्शक कहते है, 'हम वही देखते हैं जो वे बनाते हैं।' सच्चाई जो भी हो लेकिन यह तय है कि सिनेमा की अभिव्यक्ति का प्रभाव बहुत व्यापक और गहरा है।
          
फिल्म 'शोले' (1975) को भारतीय सिनेमा में हिंसा के खुले प्रदर्शन के सूत्रपात का श्रेय दिया जा सकता है।इन चालीस वर्षों में फिल्मों में बहुप्रचारित की गई हिंसा वर्तमान भारतीय समाज में भलीभाँति प्रवेश कर गई है और अब हत्या और डकैती की घटनाएँ हमारे देश में भी उसी तरह होने लगी जैसी अमेरिका में हुआ करती हैं। इन घटनाओं के पीछे हमारी फिल्मों का पर्याप्त योगदान है क्योंकि इन फिल्मों के कथानक में नायक या नायिका के हिंसक व्यवहार को महिमामंडित किया गया। हिंसक कथानक वाली फिल्मों ने दर्शकों के मानस को इस कदर प्रभावित किया है कि नई पीढ़ी में सहनशीलता के गुण कमजोर पड़ते जा रहे हैं और बदला लेने की प्रवृत्ति हावी हो रही है।
          
5 अगस्त 1994 को रिलीज़ हुई फिल्म 'हम आपके हैं कौन' ने भारतवर्ष के सभी अभिजात्य और मध्यमवर्गी परिवारों को सिनेमाघरों तक खींच कर बुला लिया और आम परिवारों को मिलजुल कर रहने और खुश रहने का संदेश दिया। इस फिल्म ने पारिवारिक सम्बन्धों की खरोच पर ठंडा मरहम लगाया और मस्ती में जीने का सलीका भी सिखाया। इस फिल्म की कहानी वैभवशाली परिवारों की थी इसलिए भव्य सेट्स, आकर्षक वेषभूषा और मंहगे गहनों की मदद से ऐसा मनोहारी तानाबाना बुना गया था कि उस फिल्म को लोग सम्मोहन की दशा में देखते रह गए। कहानी में पिरोई गई खुशियाँ और दुख फिल्म समाप्त होते ही वहीं छूट गई किन्तु उसका वैभव दर्शक अपने सीने में सँजो कर अपने साथ ले आया। उस वैभव का प्रभाव हमारे शादी-ब्याह के कार्यक्रमों में दिखाई पड़ने लगा और शादियों में होने वाला व्यय अपव्यय में परिवर्तित हो गया। शिक्षित समाज से वैवाहिक आडंबर से बचने के लिए जिस परिवर्तन की आशा थी उसे इस फिल्म ने सहसा अवरोधित कर दिया और दिखावे की ऐसी प्रतिस्पर्धा को जन्म दे दिया जिसे अब हर परिवार भुगतने के लिए मजबूर हो गया है, चाहे वह सम्पन्न हो, मध्यम हो या विपन्न। 
          
फिल्में जनजागरण का सशक्त माध्यम बन सकती हैं, आज़ादी के आसपास बनी फिल्मों ने ऐसा कर दिखाया है लेकिन अधिकांश आधुनिक फिल्म निर्माता समाज के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी न समझते हुए नागरिकों के असंतोष को नकारात्मक मोड़ दे रहे हैं। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में विधु विनोद चोपड़ा, राजकुमार हिरानी, आमिर खान, आशुतोष गोवारीकर, प्रकाश झा,अनुराग बसु जैसे कुछ फ़िल्मकार हैं जो सामाजिक समस्याओं और उनके समाधान को अपनी फिल्मों का विषय बनाते हैं, शेष निर्माता अपनी फिल्म की कहानी का चयन के समय केवल सौ करोड़ की दौड़ का ध्यान रखते हैं। फ़िल्मकारों की एक नई पौध दमखम के साथ सार्थक फिल्मों के निर्माण के लिए आती दिखाई पड़ रही है जिनसे उम्मीद बन रही है कि वे धन के लिए पगलाए मनुष्य को मानवीयता का मार्ग दिखाएंगे और जन-मन पर सिनेमा से होने वाले प्रभाव का प्रभावशाली उपयोग करेंगे। बेशक सिनेमा मनोरंजन का साधन है लेकिन यदि इसे आम जन की सोच को सकारात्मक दिशा देने के उपकरण के रूप में इस्तेमाल किया जाए तो समाज की भावी स्थिति पर इसके दूरगामी परिणाम होंगे। ज़रुरत इस बात की है कि फिल्मकार इस तलवार की धार को समझें

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