सीखने की प्रक्रिया जन्म लेने के साथ ही आरम्भ हो जाती है. जन्म के बाद मनुष्य को संस्कारित करने के लिए संसार ने भांति-भांति के तरीके रचे ताकि उसे पशुता से दूर रखा जा सके लेकिन समाज में मनुष्यता सिखाने वाले हैं तो दुष्टता सिखाने वाले भी हैं. दोनों अपने-अपने फ़न में माहिर होते हैं. जो जिसके कहने में आ गया- वही उस मनुष्य का भवितव्य होता है. हमारा जीवन स्वप्नवत है पर नींद खुल जाने पर हम उससे मुक्त नहीं हो पाते। जागृत अवस्था में संकट से जूझते रहना और उनसे मुक्त होने के स्वप्न देखना ही हमारा जीवन है। जैसे जीवन अनिश्चित है वैसे ही संकट भी हमारे अनुमान से परे होते हैं। हम सब उन्हीं परिस्थितियों से जूझ रहे हैं। सिनेमा इस संकट से कुछ देर की मुक्ति का साधन बन कर आया।
मनुष्य की उत्सुकताओं में से एक है- दूसरे व्यक्ति की ज़िन्दगी में झांक कर देखना। हम वह इसलिए देखना चाहते हैं क्योंकि एक सामाजिक प्राणी होने के कारण हमें अपने आस-पास हो रही घटनाओं पर नज़र रखना ज़रूरी लगता है। दूसरों की ज़िन्दगी में विविध रंग हुआ करते हैं जैसे कोई खुश दिखता है तो कोई दुखी, कोई बहादुर दिखता है तो कोई कायर, कोई चतुर दिखता है तो कोई बुद्धू। अगर गौर से देखा जाए तो प्रत्येक मनुष्य में ये सारे लक्षण विद्यमान रहते हैं और अलग-अलग अवसरों पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से उद्घाटित होते रहते हैं। इसके अतिरिक्त दूसरों की गल्तियां भी हमें आकर्षित करती हैं क्योंकि उनकी भूलें हमें कुत्सित आनन्द देती हैं। सिनेमा हमारी इन आवश्यकताओं की पूर्ति में सहायक सिद्ध हुआ, सम्भवतः इसीलिए लोकप्रिय भी हुआ।
बीसवीं शताब्दी की शुरुआत के भारतवर्ष पर गौर करें तो हमारा देश गरीबी, गुलामी और सामाजिक वर्जनाओं से ग्रस्त था. अनेक फिल्मों के कथानक इन्हीं विषयों को ध्यान में रखकर लिखे गए और एक से एक फ़िल्में बनी, सबसे ज्यादा रोमांटिक फ़िल्में बनी. तात्कालीन समाज में स्त्री-पुरुष सम्बन्धों में एक स्पष्ट लक्ष्मण रेखा थी जिसे लांघना घोर अनैतिक माना जाता था. लिहाज़ा, प्यार करने पर प्रतिबन्ध था और यदि किसी को किसी से दुर्घटनावश प्यार हो ही गया तो फ़िर उनके विवाह पर महाप्रतिबंध था. सिनेमा रचने वालों ने इस सामाजिक सोच का भरपूर विदोहन किया. पहले छेड़-छाड़ दिखाई, फिर दोनों की आँखे मिलीं, दोनों मुस्कुराए, साथ-साथ गाने गाए. उसके बाद अचानक किसी ने उन्हें प्यार करते देख लिया, परिवार में खबर हो गई, परिवार की इज्जत दांव पर लग गई. दोनों को अलग कर दिया गया. विरह-वियोग के गीत गाए गाए और फिल्म का दुखांत हो गया. भारत के फिल्मकारों ने वर्जनाओं से ग्रस्त समाज की पीड़ा को उकेरा और फिर उस पर ठंडक देने वाला मरहम भी लगाया.
सिनेमा अगर आसन्न संकटों का दिग्दर्शन है तो वह मीठे सपने बेचनेवाला सौदागर भी है। मेरे किशोर-वय की एक सच्ची बात आपको बता रहा हूं, सन १९६१ में जब मैं चौदह वर्ष का था, एक फ़िल्म आई- ‘जंगली’, जिसमें काश्मीर की हसीन वादियां थी, शंकर-जयकिशन का मधुर संगीत था, उछलता-कूदता शम्मी कपूर था और जन्नत की परी जैसी सायराबानो। हाय, सायराबानो की छरहरी काया, मोहक नाक-नक्श, सलोनापन और झील जैसी शान्त आंखों ने मुझपर जादू सा कर दिया। वह बोलती तो उसकी आवाज़ सुनकर ऐसा लगता जैसे उसके होंठों से होकर दसेहरी आम की फ़ांकों से रस अब गिरा कि तब। सच बता रहा हूं, मैं रात को अपनी तकिया के नीचे उसका फ़ोटोग्राफ़ रखकर सोता था क्योंकि मुझे किसी ने बताया था कि वैसा करने पर वह मेरे सपने में आएगी। यह दूसरी बात है कि सायरा तो नहीं आई, एक बार मीनाकुमारी जरूर मेरे सपने में आई थी। उस समय अक्ल ने काम नहीं किया अन्यथा मैं मीनाकुमारी का फ़ोटोग्राफ़ तकिए में दबाकर सोता तो शायद सायरा सपने में आ जाती। इस घटना से आप यह आसानी से समझ सकते हैं कि सिनेमा सिर्फ़ हमें सपने ही नहीं दिखाता वरन हमारे सपनों में दिखता भी है।
हिन्दी सिनेमा ने विगत सौ वर्षों में अपने सीमित साधनों के बावज़ूद विश्व सिनेमा में अपनी अलग साख बनाई है, संख्या के साथ-साथ गुणवत्ता में भी। इस अवधि की फ़िल्मों का अवलोकन किया जाए तो अनेक ऐसी फ़िल्में बनी जो मानवीय मूल्यों की गहरी समझ लिए हुए थी। सन १९५५ में प्रदर्शित फ़िल्म ‘श्री ४२०’ को मैंने आठ वर्ष की उम्र में देखा था. उस फ़िल्म में मनुष्य के छ्द्म सपनों का अभूतपूर्व चित्रण था. उन दिनों भारतवर्ष आजादी की ताज़ी सांस ले रहा था, भारतवासियों की उमंगें लहरा रही थी, आशाओं के दीप जगमगा रहे थे; उसी समय `श्री ४२०' आई जिसने सभ्यता और प्रगति के मुखौटे पहने समाज को पहचानने का प्रयास किया और उसके संभावित खतरों से अवाम को परिचित कराया। उस फिल्म में संकट से जूझती गरीबी, अभावों की कसक, धनवान बनने की चाहत और उसके टेढ़े-मेढ़े रास्तों का मानवीय चित्रण किया गया था। उसके एक दृश्य में दिन-रात भीख मांगकर गुजर-बसर करने वाला भिखारी 'अपने राजू' को विश्वास के कारण संतान्वे रूपए, नौ आने और दो खोटे पैसे दे जाता है, अपनी ज़िन्दगी के सबसे दिलकश सपने- ‘अपने घर’ की खातिर ! वह कहता है- "दो-ढाई रूपए कम हैं, चाहे एक खिड़की कम लगाना पर घर दे देना भाई !" सभ्यता का मतलब मनुष्य के भीतर कोमलता का विस्तार है, पाशविकता का नहीं। देव और दानव मनुष्य के ह्रदय में एक साथ मौजूद होते हैं और दानवी प्रवृतियों से मुक्त होने की लगातार संघर्ष यात्रा ही सभ्यता के उत्थान की महागाथा है। फिल्म `श्री ४२०' में मनुष्य के संकट और स्वप्न का ह्रदयस्पर्शी चित्रण था। इस फ़िल्म को मैंने जितनी बार देखा, हर बार इसने मुझे कुछ नए अर्थ समझाए. फ़िल्मकार राजकपूर ने जैसे दर्शक को खुली छूट दे रखी हो कि फ़िल्म के हर फ़्रेम में दर्शक अपने जीवन को फ़िट करके देखे और उसके चाहे जितने अर्थ निकाले. यह सच है कि मनुष्य के दुख और सुख उसकी व्यक्तिगत अनुभूति होती है लेकिन जब हम उसे अपनों के बीच साझा करके व्यापक अभिव्यक्ति देते हैं तब वे सबके हो जाते हैं.
सन १९५७ में फ़िल्म ‘मदर इन्डिया’ आई जिसमें ग्रामीण जीवन की विषमताओं और समस्याओं का गहन विश्लेषण करने के लिए भारतीय ग्राम्य जीवन के वैविध्य भरे कथानक को बखूबी पिरोया गया था। उसमें गरीब के सपने थे और जिजीविषा का संघर्ष भी। लहलहाती फ़स्लों का संतोष था और बाढ़ से उजड़ गए सपने भी। स्त्री की लज्जा एवं सम्मान का संकट था और उसके भूखे बच्चों का पेट भरने की विवशता भी।
मेहबूब खान ने इन्सानी ज़ज़्बात और उसकी मजबूरियों को इस तरह उकेरा था कि फ़िल्म देखने वाले का दिल दहल जाए। स्वप्न और संकट का अनवरत संघर्ष मनुष्य के जीवन की वह विशेषता है जो सपनों को सच करने की चाहत और उसे संकट से लड़ने की ताकत देते रहती है। यदि वह निराश करती है तो नए सपने दिखाकर पुनः आशा का संचार करती है और इसी तरह जीवनचक्र चलते रहता है। फ़िल्म ने दो विकल्प दिए- एक, नायक का घर-परिवार से पलायन कर जाना और दूसरा, नायिका का अत्यन्त विपरीत परिस्थितियों से संघर्ष करना. मैंने अपने जीवन में इस फ़िल्म के नायक को नहीं, नायिका को आदर्श बनाया और बिगड़े हालात से वर्षों तक जम कर लोहा लिया.
सन १९६० में प्रदर्शित फ़िल्म ‘मुगल-ए-आज़म’ में दो पीढ़ियों के संघर्ष को आधार बनाकर इन्सानी ताकत और मोहब्बत की ताकत के फ़र्क का बखूबी चित्रण किया गया. इस भव्य फ़िल्म को मैंने तेरह वर्ष की उम्र में देखा था. मधुर गीत संगीत से सजी इस फ़िल्म को देखना मनमोहक था लेकिन समझना कठिन क्योंकि फ़िल्म के संवाद इस कदर खालिस उर्दू में थे जो मेरी पकड़ के बाहर थे. हां, जलालुद्दीन मोहम्मद अकबर का पात्र मेरे पिता से मिलता-जुलता था और डरपोक सलीम का मुझसे. जब बड़ा हुआ, फ़िल्मों की समझ विकसित हुई, उर्दू समझ में आने लगी- तब समझ में आया कि सलीम-अनारकली की काल्पनिक कहानी को निर्माता-निर्देशक के. आसिफ़ ने इस खूबसूरती से बनाया कि अगर शहंशाह अकबर ज़िन्दा होते और इस फ़िल्म को देखते तो उनके दरबार में नौ की जगह दस रत्न होते.
निर्माता एल.बी.लछमन और निर्देशक हृषिकेश मुखर्जी ने एक ईमानदार फ़िल्म बनाई, ‘अनाड़ी’ जिसे राजकपूर, नूतन, ललिता पवार, मोतीलाल के अभिनय और शंकर जयकिशन के संगीत ने यादगार बना दिया. नायक की संघर्ष गाथा में ईमानदारी के पुट को जोड़कर इस फ़िल्म ने संदेश दिया था कि ईमानदारी की राह कठिन है लेकिन वही जीवन का असल संगीत है. उस फ़िल्म का यह संवाद मुझे जीवन में हर पल भर याद रहा और मुझसे कभी चूक नहीं हुई.
फ़िर सन १९७१ में आई फ़िल्म ‘आनन्द’ -जिसे मैंने अपनी युवावस्था में देखा था. हृषिकेश मुखर्जी ने ज़िन्दगी और मौत के संघर्ष को इस तरह चित्रित किया था कि कैन्सर जैसी जानलेवा बीमारी भी एक कविता बन गई.
तब मुझे मालूम न था कि ‘आनन्द’ की कहानी मेरे जीवन में भी घटेगी. सन २००२ में मेरे गाल में कैन्सर हुआ और उसके बाद २००८ तथा २००९ में उसने लौट-लौट कर हमले किए. तीनों बार चेहरे की सर्जरी हुई, हर बार मौत से सामना हुआ और मैं टक्कर लेता रहा. फ़िल्म ‘आनन्द’ का नायक राजेश खन्ना एक अभिनेता ही तो था लेकिन संकट की हर घड़ी में वह मेरे आसपास रहा और मेरी हिम्मत बढ़ाता रहा. प्रचण्ड पीड़ा के समय उस पात्र के मुस्कुराते चेहरे ने मेरी बहुत मदद की और वह मदद आज भी ज़ारी है. एक दिन सभी को जाना है लेकिन संघर्षपूर्ण ज़िन्दगी को हंसते-हंसते कैसे जिया जाता है- यह मैंने इस फ़िल्म से सीखा.
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