बीसवीं शताब्दी में सिनेमा का आगमन समाज के बदलाव की रहस्यमयी आहट थी। दूरगामी प्रभाव पड़ने वाले थे लेकिन उस समय तो यह विस्मय था, आँखें फैला देने वाली आश्चर्यजनक खोज। पर्दे पर चलती-फिरती इन तस्वीरों का कौतूहल एक दिन पूरी दुनिया को अपने आगोश में समेट लेगा, ऐसा किसी ने सोचा तक न होगा।
शुरुआती फिल्में 'खामोश' थी लेकिन दुनिया को बहुत कुछ बता गई, नवीन वैज्ञानिक आविष्कारों से परिचित कराया, पृथ्वी की सैर कराई, डराया और हँसाया भी। उसके बाद फिल्मों को आवाज़ से जोड़ा गया, संवाद आए, गीत-संगीत आया। सन 1927 में पहली बार अमेरिका में सिनेमा में ध्वनि का प्रयोग किया गया, फिल्म का नाम था, The Jazz Singer तो फ़िल्मकार चार्ली चैपलिन ने 'सुसाइड ऑफ सिनेमा' शीर्षकयुक्त अपने लेख में लिखा था- 'ध्वनि के उपयोग से सुरुचिविहीन नाटकीयता के द्वार खुल जाएंगे और सिनेमा की अपनी विशिष्ट प्रकृति इसमें खो जाएगी।' चार्ली चैपलिन की भविष्यवाणी के प्रतिकूल ध्वनि के समावेश ने सिनेमा को और समृद्ध बना दिया, इस माध्यम के प्रवेश से सम्प्रेषण अधिक प्रभावोत्पादक हो गया। जनमानस सिनेमा देखने के लिए उमड़ पड़ा और गीत-संगीत की लहरों के साथ थिरकने लगा।
भारत में 7 जुलाई 1896 को आरंभ हुए सिनेमा प्रदर्शन से निर्माण तक की तमाम असुविधाओं और सामाजिक विरोध के बावजूद फिल्मों ने धीरे-धीरे अपने पैर जमा लिए। हिंदी सिनेमा के पितामह थे, दादा साहब फाल्के, जिन्होंने सन 1913 में फिल्म 'राजा हरिश्चंद्र' का अत्यंत सीमित साधन से निर्माण किया था. सन 1931 में अर्देशर ईरानी ने पहली बोलती फिल्म बनाई, 'आलम आरा'.
शुरुआती दौर में प्रचलित नाटकों का फिल्मांकन होता रहा जो सामान्यतया पौराणिक आख्यानों पर आधारित थे, फिर इन्हीं कथानकों पर स्वतंत्र रूप से फिल्में बनने लगी। आर्देशिर ईरानी, पृथ्वीराज कपूर, सोहराब मोदी जैसे समर्थ नाटककारों ने हिन्दी सिनेमा में प्रवेश कर इसे लोकप्रिय बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। दादा साहब फाल्के और बाबूराव पेंटर जैसे फिल्म-तकनीक-विशेषज्ञों ने सीमित साधनों के बल पर भारतीय सिनेमा की मजबूत नीव रखी।
फिल्में बनाना खर्चीला शौक है, बेहिसाब लागत वाला, बेशुमार मेहनती और बेहद जुनूनी काम है। सबसे पहले कहानी का चयन फिर धन का जुगाड़, कलाकारों और तकनीशियनों का चुनाव, 'लोकेशन', 'सेट' की व्यवस्था और फिल्म बन जाने के बाद प्रदर्शन का प्रबंध। हजारों के सपने आधे में टूट गए, सैकड़ों के सपने दुःस्वप्न में परिवर्तित हो गए। फिल्म 'हिट' न हुई तो फ़िल्मकार सड़क पर आ गया, कर्ज़ में डूब गया और अवसादग्रस्त होकर नशे की गिरफ्त में पहुँच गया। जोखिम भरे इस दुःसाहस का सामना करने वाले दो वर्ग बने, पहला व्यापारिक बुद्धि वाला निर्माता जिसने बाज़ार की मांग को ध्यान में रखते हुए फिल्मों का निर्माण किया और दूसरा कलात्मक बुद्धि वाला जिसने बाज़ार को ठेंगा दिखाया और आवाम की रूहानी ज़रूरतों को ध्यान में रखते हुए फिल्में बनाई।
आवाम के सिनेमा की शुरुआत का श्रेय निर्माता-निर्देशक बाबूराव पेंढारकर की मराठी फिल्म 'सावकारी पाश' को दिया जा सकता है जो साहूकारों के द्वारा गरीबों पर अत्याचार की कहानी पर आधारित थी। इस फिल्म ने सिनेमा को अवाम के साथ जोड़ा। इस सिलसिले को चंदूलाल शाह, वीरेन्द्रनाथ सरकार, पी. सी. बरुआ, देवकी बोस, नितिन बोस, हिमांशु रॉय, व्ही.शांताराम, महबूब खान, नन्दलाल जसवंतलाल, फणि मजुमदार, बिमल रॉय जैसे फिल्मकारों ने बखूबी आगे बढाया।
बाज़ार की नब्ज़ पर गौर करने वालों ने मनोरंजन को केन्द्र में रखकर 'मसाला' फिल्म की अवधारणा विकसित की जिसका आरंभ हिमांशु रॉय की 'सुपर हिट' फिल्म 'अछूत कन्या'(1936) से हुआ। इस फिल्म की सफलता ने हिन्दी फिल्म जगत को वह 'फार्मूला' दिया जो टिकट खिड़की पर भीड़ इकट्ठा करने में मददगार था। उसके बाद निर्माताओं ने नित नए प्रयोग किए, कुछ सफल हुए तो कुछ असफल। मोटे तौर पर मधुर गीत-संगीत, रोमांस और रोमांच सफलता का पैमाना बन गए। इस फार्मूले के 'इंग्रेडिएंट्स' में दिनोंदिन इज़ाफ़ा होता गया और टिकट खिड़की पर भीड़ जुड़ती गई। हिन्दी फिल्मों पर गीत-संगीत, मार-धाड़, हंसी-मज़ाक और आंसुओं का स्थायी कब्जा हो गया। कुछ फ़िल्मकारों ने हॉलीवुड की तर्ज पर 'सेक्स' को परोसा लेकिन भारतीय जनमानस ने उसे स्वीकार नहीं किया, इस प्रकार भारतीय फिल्मों में काफी हद तक शुचिता बनी रही।
विगत शताब्दी के उत्तरार्द्ध की फिल्मों को चार श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है- पहली, धार्मिक और ऐतिहासिक फिल्में जिन्हें देखने वाला वर्ग बहुत बड़ा था। यद्यपि उल्लेखित शताब्दी के मध्यकाल में अधिकाँश परिवारों में फिल्म देखने जाने पर सख्त पाबंदी हुआ करती थी किन्तु ऐसी फिल्मों के लिए 'जाओ, देख आओ' की सुविधा प्राप्त हो जाती थी। ये फिल्में अपनी 'पवित्रता' और मधुर संगीत के सहारे खूब चलती थी।
दूसरी, सामाजिक और पारिवारिक फिल्में जिन्हें बनाने में एव्हीएम, जेमिनी, प्रसाद प्रोडक्शन जैसी मद्रासी फिल्म निर्माण कम्पनियों को खास महारत हासिल थी। ये फिल्म निर्माता पारिवारिक कथानक पर संयुक्त परिवारों की तात्कालीन परिस्थितियों को पर्दे पर इस तरह प्रस्तुत करते कि परिवारों का समूह, खास तौर से महिलायें, सिनेमा हाल की ओर उमड़ पड़ते। परिवार की तकलीफों, प्रताड़नाओं और असुविधाओं का सामूहिक प्रदर्शन पूरे हाल को सिसकियों और आंसुओं से भर देता। उस विरेचन प्रक्रिया से तृप्त होकर दर्शक स्वयं को ‘रिलेक्स' महसूस करते और 'पैसा वसूल' की मनोदशा के साथ घर वापस जाता।
तीसरी,स्टंट फिल्में थी जिनके पात्र तलवारबाजी या उठापटक की विभिन्न विधाओं से उन दर्शकों का मनोरंजन करते थे जिन्हें 'चवन्नी क्लास' का तमगा हासिल था। ये फिल्में दर्शकों में उत्तेजना बनाए रखती, ठूठे और कमजोर लोगों की भी शक्तिसंपन्न कर देती फलस्वरूप इन दर्शकों की आँखें और कान लाल हो जाते, वे खुशी के मारे सीटियाँ बजाते और तालियाँ पीटने लगते। नाडिया, जान कावस, रंजन, शेख मुख्तार, निशि, दारासिंह जैसे अनेक कलाकार इन झनझनाती फिल्मों के जरिये बेहद लोकप्रिय थे। कहानी की मांग पर यदाकदा स्थापित नायक भी तलवार भांजते दिखाई पड़ जाते यथा- 'आन'(1952), 'आजाद'(1955) और 'कोहिनूर'(1960) में दिलीपकुमार आदि।
चौथी,'रोमांटिक' फिल्में थी जो युवाओं के दिल के बहुत नजदीक हुआ करती थी। सामान्यतया इनका कथानक अपराध के इर्द-गिर्द बुना जाता था जिसमें पारिवारिक खलनायकों से बचते या मुकाबला करते प्रेमियों की दुखद दास्ताँ को मधुर गीत संगीत के साथ प्रस्तुत किया जाता था। इन फिल्मों में पेड़ों के आसपास नाचते नायक-नायिका और बेबसी तथा बेवफाई के दर्द भरे गीत होते जो युवाओं को मोहब्बत में होने वाले खतरों से वाकिफ भी कराते और इश्क के जज्बात को सिनेमाहाल में ही उपलब्ध करा देते।
राजकपूर जैसे कुछ निर्धारित सीमा पार कर जाते अन्यथा 'पवित्रता' का फिल्म बनाते समय पर्याप्त ध्यान रखा जाता। निर्माता-निर्देशक यदि होशियारी में लक्ष्मणरेखा लांघता तो सेंसरबोर्ड बेरहमी से अपनी कैंची चलाता। केवल पक्षियों और फूलों के चुम्बन दृश्यों को अनुमति प्राप्त थी, वह भी संक्षिप्त। राजकपूर के अतिरिक्त दिलीपकुमार, अशोककुमार, देव आनंद, बलराज साहनी, शम्मी कपूर, किशोर कुमार, गुरुदत्त, राजेन्द्रकुमार, धर्मेंद्र, जितेंद्र, राजेश खन्ना, संजीव कुमार, सुनील दत्त, मनोजकुमार, अमिताभ बच्चन, शत्रुघ्न सिन्हा, महमूद आदि इस युग के महानायक रहे। नर्गिस, मधुबाला, मीनाकुमारी, नूतन, नन्दा, वैजयंतीमाला, तनुजा, माला सिन्हा, वहीदा रहमान, हेमा मालिनी, सायराबानो, आशा पारेख, साधना आदि का अत्यंत लोकप्रिय अभिनेत्रियों के रूप में बोलबाला था।
रोचक पटकथा, तीखे चुटीले संवाद, मनमोहक नृत्य और मधुर संगीत से सजी ये फिल्में उस समय की सामाजिक परिस्थितियों और समस्याओं का बखूबी चरित्र चित्रण करती थी। निर्माता और निर्देशक अपनी अभिरुचियों के अनुरूप लेखकों से कहानियां लिखवाते और उसे मनोरंजक बनाकर प्रस्तुत करते। ऐसा नहीं था कि सभी फिल्में स्तरीय थी, कुछ कमजोर फिल्में बनती थी परन्तु फूहड़ता, जुगुप्सा या अश्लीलता का कोई काम न था।
इसी दौरान व्ही.शांताराम की 'दुनिया न माने'(1937), 'डा॰ कोटनीश की अमर कहानी'(1946), 'तूफान और दिया'(1956), 'दो आँखें बारह हाथ'(1957); महबूब खान की 'औरत'(1940), 'रोटी'(1942), 'मदर इंडिया'(1957); अमिय चक्रवर्ती की 'सीमा'(1955), बिमल रॉय की 'दो बीघा जमीन'(1953), 'परख'(1960); सत्येन बोस की 'जागृति'(1954), 'दोस्ती'(1964); राजकपूर की 'श्री 420'(1955), 'बूट पालिश'(1954), 'जागते रहो'(1956); बी॰आर॰चोपड़ा की 'धर्मपुत्र'(1961), ऋषिकेश मुखर्जी की 'अनाड़ी'(1959), 'आनंद'(1971); श्रीनिवास सथ्यू की 'गरम हवा'(1973), श्याम बेनेगल की 'अंकुर'(1974), 'निशांत'(1975), 'मंडी'(1983), 'मम्मो'(1994); गोविंद निहलानी की 'तमस'(1986) जैसी सामाजिक सरोकार से जुड़ी अनेक फिल्में बनी।
अधिकांश फिल्म निर्माता अपने कार्य को व्यापार की तरह करते थे जिसका उद्देश्य लाभ कमाना होता था। उसके लिए वे फिल्म की कहानी में भावुकता, उत्सुकता, नाचना-गाना, अंग-प्रदर्शन, कॉमेडी, मार-धाड़ और सुखांत घटनाएं पिरोते थे। उनकी सोच वाज़िब थी क्योंकि फिल्म निर्माण में बहुत बड़ी लागत लगती थी जिसको वसूल करना मज़ाक नहीं था। सारे 'टोटकों' के बावज़ूद तथाकथित फार्मूला फ़िल्में पिटती थी वहीं पर कम बजट में बनी सामाजिक सरोकार की फ़िल्में न केवल लागत वसूल कर लेती थी वरन लाभ भी कमाती थी क्योंकि इन फिल्मों की कहानी दर्शक के जीवन के यथार्थ से जुडी हुई थी जिसे वह सिनेमा-हाल के अँधेरे में देखना चाहता था। वह महसूस करना चाहता था कि उसका संताप और उसकी भावनाएं उसके अकेले की नहीं बल्कि सार्वभौमिक हैं।
हिन्दुस्तानी सिनेमा में व्यापारियों की बहुतायत थी लेकिन कला-मनीषियों की उपस्थिति भी कम न थी। सच तो यह है की फिल्मों के व्यापारी कलाकारों की कला का शोषण करके धन कमाते थे लेकिन कभी-कभी 'सत्कर्म' भी हो जाता था, संयोग से संदेशवाहक फिल्में भी बन जाती थी जैसे बी॰आर॰चोपड़ा की 'नया दौर'(1957), एम॰एस॰वासन की 'पैगाम'(1959), 'जिस देश में गंगा बहती है (1960) आदि। यद्यपि अनेक फिल्मों में जनसामान्य की समस्या को कहानी का आधार बनाकर मनोरंजन का तानाबाना बुना जाता था ताकि कोई 'अच्छा संदेश' चला जाए और लागत भी वसूल हो जाए। जनोपयोगी पटकथा के आधार पर आगे बढ़ी अनेक फिल्में निर्माण के दौरान बनते-बनते भटक गई क्योंकि निर्माता-निर्देशक पर उनकी धारा बदलने के लिए 'फायनेंसर' और वितरकों का दबाव रहता था।
हिन्दी सिनेमा जगत में अब नई पीढ़ी ने काम सम्हाल लिया है जो वर्तमान दौर की जरूरतों के अनुसार फिल्में रचते हैं। उनका स्पष्ट कथन है- 'वही बनाएँगे जो बिकता है।' परिणामस्वरूप भारतीय सिनेमा को हॉलीवुड ने अपनी गिरफ्त में ले लिया और आयातित कहानी, स्टंट और निर्लज्जता ने पुराने मूल्यों को विस्थापित कर दिया। अब फिल्म बनाने का उद्देश्य समाज की समस्याओं पर चिंतन करना, बेहतर समाज का निर्माण करना, लोगों को शिष्टाचार सिखाना, देशभक्त बनाना, संवेदनशील बनाना नहीं रहा; उद्देश्य है, 'पब्लिक' का मनोरंजन करना और अपने 'बैंक बेलेन्स' की वृद्धि पर नज़र रखना है। आज का पटकथा लेखक 'क्यू' को तोड़कर अलग खड़े नायक से यह संवाद कहलाता है- 'जहां हम खड़े होते हैं, लाइन वहीं से शुरू होती है।' ऐसे गैरजिम्मेदार संवाद लेखकों और फिल्मकारों से सामाजिक सरोकार की उम्मीद कैसे की जाए ? अब तो 'मुन्नी बदनाम हुई डार्लिंग तेरे लिए' का युग है।
फिर भी नई पीढ़ी के आदित्य चोपड़ा, करण जौहर, संजय लीला भंसाली, आशुतोष गोवारीकर, राजकुमार हिरानी, मधुर भंडारकर, फरहान अख्तर, प्रकाश झा, इम्तियाज़ अली, अनुराग कश्यप, हर्षवर्धन कुलकर्णी, पूजा भट्ट, सुधीर मिश्रा, अभिषेक चौबे, सौरभ शुक्ल, आर. बाल्की, कबीर खान जैसे फ़िल्मकार अच्छी फिल्में दे रहे हैं। ये नवोदित आवाम से जुड़े यथार्थ को भारतीय सिनेमा के मुकुट में दैदीप्यमान मणि की तरह जड़ रहे हैं और वर्तमान दौर के दूषित चलचित्र-विश्व में महाभारत के भीष्म की तरह अडिग बने हुए हैं।
वर्तमान पीढ़ी को शिक्षित करने में फिल्में अपना योगदान दे सकती हैं बशर्ते, शिक्षा देने वाले स्वयं 'सुशिक्षित' हों।ऐसे फ़िल्मकार पहले भी थे और आज भी हैं जो समाज की गतिविधियों पर नज़र रखते हैं और उसकी विसंगतियों पर फिल्म के माध्यम से प्रहार करने का साहस करते है। मनोरंजन के साथ-साथ लोकशिक्षण का उत्तरदायित्व निभाने वाले और भी आएँगे, नई समझ लेकर आएँगे और फिल्मों को जनमानस के सकारात्मक परिवर्तन का माध्यम बनाएंगे। आने वाले समय को आने वाले फ़िल्मकारों से बड़ी उम्मीदें हैं जो फिल्मों के माध्यम से भावी पीढ़ी को मनोरंजन देने के साथ-साथ मनुष्य बने रहना सिखाएंगे और उन्हें दूसरों की तकलीफ़ों के प्रति संवेदनशील होने का पाठ पढ़ाएंगे।
* * * * *
No comments:
Post a Comment