Sunday, 13 January 2019

स्वास्थ्य : हमारे चमकते दांत

स्वास्थ्य : हमारे चमकते दांत
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अब मैं अपने दांतों से बिछड़ जाने का अफ़सोस करता हूँ. सुना था कि बुढ़ापे में दांत गिर जाते हैं, जैसे, नज़र कमजोर हो जाती है या सुनना कम हो जाता है या बाल झड़ जाते हैं। उम्र बढ़ने के साथ जो होना था वह मेरे साथ भी हुआ लेकिन मैं यह मानता हूँ कि दांतों की दुर्दशा के लिए मैं खुद ज़िम्मेदार हूँ।

किसी को मस्त चबा-चबाकर कुछ खाते हुए देखता हूँ तो आज मुझे उससे जलन होती है क्योंकि मैं दांतों के अभाव में नहीं खा पाता। अमरूद, सेब, सिंघाड़ा, मूली, गाजर, खीरा, प्याज को केवल दूर से देखकर संतोष करना पड़ता है क्योंकि वे मुझसे चबाए नहीं जाते। ट्रेन में बैठकर मूंगफली और भुंजा चना चबाने का सुख हाथ से निकल गया। गन्ना, काजू और अखरोट का नाम लेना भी मेरे लिए पाप जैसा हो गया. तंदूरी और नान रोटी खाना असंभव हो गया, हाँ, चपाती को दाल या दूध में भिगाकर खाता लेता हूँ। कभी-कभी अपनी पत्नी से अनुरोध करता हूँ- 'यह मुझसे नहीं चब रहा है, तुम चबाकर दे दो।' आप सोचिए, उम्र बढ़ने से किस कदर दूसरों पर आश्रित होना पड़ता है! .

अब फोटो खिंचवाने में संकोच होने लग गया है क्योंकि बिना दांत निपोरे फोटो अच्छी नहीं आती। फिर भी, जब कभी फोटो खिंचती है तो मैं अपने होंठों को जोड़कर मुस्कुराने की कोशिश करता हूँ ताकि दाँतों की अनुपस्थिति का पता न चले लेकिन कितनी भी कोशिश करो, चेहरे पर मुस्कराहट आती ही नहीं। शादी-ब्याह के अवसर पर लिए गए समूह फोटोग्राफ में अपना मुखड़ा देखकर मुझे ऐसा लगता है कि मैं किसी शोकसभा में भाषण देने के लिए तैयारी कर रहा हूँ। 

मेरी बेटी संगीता और दामाद केदारनाथ, दोनों डेन्टिस्ट हैं, मेरा और मेरे दांतों का ख्याल रखते हैं लेकिन वे भी लाचार हैं क्योंकि कैंसर की सर्जरी में मेरे दाहिने जबड़े की वे हड्डियाँ निकालकर अलग कर दी गई हैं जिनमें डेंचर टिकाए जाते हैं। सामने और बाएँ जबड़े में डेंचर लगाना भी मुश्किल है क्योंकि सब्मूकस फाइब्रोसिस के कारण मुंह इतना कम खुलता है कि उसका नाप लेना नामुमकिन है। अब केवल 'इंप्लांट' संभव है लेकिन उसके लिए मुहूर्त नहीं निकाल रहा है। मुझे अर्थ-संकोच भी है, मेरी बनिया-बुद्धि मुझे बार-बार इस पर होने वाले व्यापक खर्च के लिए बाधा उपस्थित करती है। मेरा खेल खत्म होने को है, पारी समाप्ति की घोषणा होने वाली है, इतने महंगे दाँत राख़ बन जाएगे, क्या फायदा? जब मुंह में 'ओरिजनल' दाँत थे तब मालूम नहीं था कि एक दाँत की कीमत पचास हजार रुपए होती है, यदि पहले से मालूम होता तो उनकी हिफाज़त का ख्याल रखता।

साठ-पैंसठ साल पहले घरों में भोजन पकाने के लिए चूल्हे हुआ करते थे जिनमें लकड़ी जलायी जाती थी। उसकी राख़ बर्तन माँजने और दांतों की सफाई के काम आती थी। अधिकतर लोग दाँत की सफाई के लिए नीम और बबूल की दातौन से मुखारी किया करते थे। नीम की दातौन कड़वी होती थी, सुबह-सुबह मुंह का स्वाद बिगड़ जाता था इसलिए मैं बबूल को प्राथमिकता देता था। सन 1950 के आसपास बिटको का काला दंतमंजन आया। मेरा अनुमान है कि वह कोयला का चूर्ण था जिसमें ठंडक के लिए 'मिंट' मिलाई गई होगी। इस दंतमंजन का उपयोग घर-घर में होने लगा। उसके बाद आया वैद्यनाथ और डाबर का लाल दंतमंजन जो दाँत की अच्छी सफाई करता था लेकिन सोंठ की अधिकता के कारण तीखा लगता था। फिर आया टूथपेस्ट, 'बिनाका' और 'कॉलगेट', जिसने दाँत की सफाई करने की वह विधि बाज़ार में उतारी जो आज सर्वाधिक लोकप्रिय है। साथ ही टूथपेस्ट के साथ सफ़ेद टुथ-पावडर भी आ गया। 'कॉलगेट' से लेकर 'पतंजलि' तक सभी टूथपेस्ट उत्पादक चमकीले दांतों व उनकी रक्षा के नाम पर अपने उत्पादन को बेचने के लिए मीठी-मीठी बातों के सहारे हर घर में मौजूद हैं।

टूथपेस्ट का आविष्कार सन 1850 में डेन्टिस्ट और केमिस्ट डा॰वाशिंगटन वेंटवर्थ शेफील्ड (न्यू लंदन कनेक्टिकट) ने 23 वर्ष की उम्र में किया था, इसका नाम रखा- क्रीम डेंटिफ्राइस। डा॰वाशिंगटन ने इस क्रीम की सफलता और लोकप्रियता के बाद इसे ट्यूब में भरकर बाज़ार में उतारा जबकि कॉलगेट-पामोलिव का दावा है कि पहली बार उन्होंने 'कॉलगेट रिबन डेंटल क्रीम' के नाम से सन 1896 में प्रस्तुत किया था। टूथपेस्ट बनाने के लिए इन वस्तुओं का सम्मिश्रण किया जाता है :
दांतों की सफाई के लिए : Hydrated silica, Calcium corbonate, Sodium bicorbonate, Bicorbonate of soda.
झाग उत्पन्न करने के लिए : Sodium lauryl sulphate, Sodium lauryl sulfocetate, Sulfolaurate.
पेस्ट में पानी की उपस्थिति बनाए रखने, ठंडक और मिठास के लिए : Sorbitol, Glycerin, Mint॰
दंत-क्षय रोकने के लिए : Sodium flouride.
ऊपर उल्लेखित वस्तुएँ टूथपेस्ट को तैयार करने की विश्व-प्रचलित विधि है। इन सामग्रियों से निर्मित पेस्ट में निर्माता अपनी प्राथमिकता के अनुसार खुशबू, रंग और स्थानीय औषधियाँ मिश्रित करते हैं।

टूथपेस्ट के बारे में कुछ उपयोगी और रोचक तथ्य आपको जानने चाहिए। सभी टूथपेस्ट की ट्यूब पर उपभोक्ता को यह सलाह दी जाती है कि वे अपने टूथब्रश में मटर के दाने के बराबर पेस्ट निकालकर उपयोग करें क्योंकि पेस्ट के निर्माण में प्रयुक्त रसायनों में कैंसर के कारक तत्व है इसलिए इसे कम मात्रा में लेना सुरक्षित है। प्रत्येक ट्यूब पर यह सूचना अत्यंत छोटे अक्षरों में अंग्रेजी भाषा में इस तरह लिखी रहती है- Use only a pea sized amount. जो अंग्रेजी नहीं जानता वह इस सूचना को कैसे समझेगा और जो अंग्रेजी जानता है वह कैसे पढ़ेगा?
इतना ही नहीं, सन1980 के दशक में एक निर्माता के द्वारा उत्पाद की बिक्री बढ़ाने के लिए टूथपेस्ट की ट्यूब का प्रचलित मुहाना बढ़ाया गया ताकि ट्यूब दबाने से अधिक पेस्ट निकले और उसकी अधिक खपत हो। इस चतुराई भरे निर्णय को सभी उत्पादकों ने अपना लिया और टूथपेस्ट की बिक्री में आशातीत वृद्धि हुई।

पहले टूथपेस्ट की ट्यूब टिन की होती थी लेकिन अब प्लास्टिक की आने लगी। प्लास्टिक की ट्यूब आसानी से दबती है इसलिए हल्के से दबाव से ही ढेर सारा पेस्ट बाहर निकल जाता है जिसे वापस नहीं डाला जा सकता इसलिए जितना पेस्ट निकल गया सो निकल गया और हम उसका पूरा उपयोग कर लेते हैं। यह हमारे स्वास्थ्य के लिए घातक है। मटर की साइज़ का पेस्ट लेकर ब्रश करना चाहिए, यह मुझे अब, 69 साल बाद मालूम हुआ है। वैसे, अभी तक मैं अपने ब्रश में कम मात्रा में ही पेस्ट लिया करता था ताकि पैसे की बचत की जा सके। हमारी बचत का आलम यह है कि मैं ट्यूब का पेस्ट खत्म हो जाने के बाद बेलन की मदद से बचा-खुचा पेस्ट ट्यूब के मुहाने तक ले जाता हूँ और मेरी पत्नी ट्यूब को उसकी गर्दन को कैंची से उड़ा देती हैं ताकि शेष पेस्ट का भी उपयोग किया जा सके। बचत के चक्कर में हम सुरक्षित रहे, है न?

ट्रेन के कम्पार्टमेंट और रेल्वे स्टेशन में सुबह के समय लोग ब्रश करते दिख जाते हैं। उन्हें ब्रश करते देख मुझे अपना बचपन याद आ जाता है जब मैं अपने दांतों को रगड़कर साफ किया करता था, उसी तरह जैसे बूट-पालिस की जाती है। पेस्ट करने के बाद कुल्ला करते समय अक्सर रक्तकण दिख जाया करते थे। परिणाम यह हुआ कि युवावस्था आते-आते दांतों में किनकिनाहट होने लगी, अर्थात ठंडक और गर्माहट का दाँत विरोध करने लगे। मैंने अपने डेन्टिस्ट से कारण पूछा तो उन्होंने बताया कि दांतों के एनामेल घिस जाने की वजह से ऐसा होता है और एनामेल गलत ढंग से ब्रश करने के कारण खुल जाते हैं। मैंने उनसे ब्रश करने का सही तरीका पूछा तो उन्होंने बताया कि ब्रश दाएँ से बाएँ या बाएँ से दाएँ नहीं करना चाहिए बल्कि ऊपर से नीचे और नीचे से ऊपर बिना दबाव डाले आहिस्ता-आहिस्ता करना चाहिए। 

विशेषज्ञों की राय है कि जब भी कुछ खाया जाए, हर बार कुल्ला करके भलीभाँति मुंह की सफाई की जाए। सबसे अधिक खतरा रात को सोते समय होता है जब रात भर मुंह में पनपे कीटाणु दांतों और मसूढ़ों को नुकसान पहुंचाते हैं इसलिए सोने के पहले मुंह की सफाई के लिए ब्रश करना बेहद जरूरी समझ में आता है, सुबह के समय तो हम सब ब्रश करते ही हैं। सोने से पहले और सुबह जागने के बाद नियमित ब्रश करने से आपके दाँत और मसूढ़े लंबे समय तक सुरक्षित रहेंगे।

दांतों को नुकसान पहुंचाने वाली मुख्य वस्तुओं हैं, टाफी, पान, तंबाखू, सुपारी, गुठखा, गुड़ाखू, खैनी, नस, पानमसाला और कोल्ड ड्रिंक्स, इनके उपयोग से बचें ताकि आप जीवन भर अपने दातों का उपयोग खाने और मुस्कुराने में कर सकें।

मैंने अपने जीवन में दांतों की यथोचित सफाई पर ध्यान नहीं दिया और पान, तंबाखू, तथा सुपारी का लगभग बत्तीस वर्षों तक भरपूर उपयोग किया, पुरस्कार में मुझे मुंह का कैंसर मिला। आठ सालों में तीन बार कैंसर ने मुझ पर आक्रमण किया, हर बार प्रारम्भिक अवस्था में सर्जरी हो गई, मेरा चेहरा बिगड़ गया लेकिन मैं बच गया। संसाधन बन गये, योग्य डाक्टर मिल गये, देखरेख हो गई, इस कारण जीवित हूँ, सब इतने सौभाग्यशाली नहीं होते।

अब आप समझे कि दांतों और मसूढ़ों की सफाई कितनी आवश्यक है?

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