हम सब अभिनय ही तो कर रहे हैं, जब तक सांस है, अभिनय चलता रहेगा, सांस रुक जाने पर रुक जाएगा और हम अपने वास्तविक स्वरूप में आ जाएंगे। जिंदगी में हम अपनी 'स्क्रिप्ट' हम लिखने की कोशिश करते ज़रूर हैं लेकिन अपना लिखा कम उपयोग में आता है और समय का लिखा हुआ अधिक पल्ले पड़ता है। डा॰ एरिक बर्न का मानना है कि मनुष्य की 'स्क्रिप्ट' उसके शैशवकाल में ही लिख जाती है, वह उसी के आधार पर अपना जीवन व्यतीत करता है। प्रश्न यह है कि इस 'स्क्रिप्ट' को कौन तैयार करता है ? इस 'स्क्रिप्ट' को हमारे बचपन से जुड़े आसपास के लोग तैयार करते हैं, उनकी गतिविधियों को देखकर शिशु अपने मस्तिष्क के कोरे कागज में लिख लेता है जिसका असर पूरे जीवन पर हावी रहता है। किसी साक्षात निर्देशक के बिना भी हमारे जीवन की फिल्म में हम अभिनय करते रहते हैं और बचपन में संरक्षित हुई 'स्क्रिप्ट' हमसे अभिनय करवाते रहती है।
फिल्मों में मनमानी नहीं चलती, फिल्म की 'स्क्रिप्ट' होती है, निर्देशक होते हैं और अदाकार होते हैं। अमिताभ बच्चन ने टेलीविज़न के एक चैनल के साक्षात्कार में साहसिक बयान दिया था- 'यदि किसी अदाकार का अभिनय आपको अच्छा लगे तो यह न समझना कि उसने अच्छी 'एक्टिंग' की, वह उसका नहीं, वरन फिल्म के निर्देशक का कमाल है जिसने उस अदाकार से वैसा अभिनय करवा लिया।' यह तो तर्क-वितर्क से सुलझने वाली बात नहीं है कि असल कमाल किसका है लेकिन मोटे तौर पर ऐसा माना जा सकता है कि दोनों के सम्मिलित प्रयासों से वह असर बाहर आता है जो असरदार हो।
समय के साथ स्थापित कलाकार विस्थापित हो जाते हैं, उनकी जगह नए कलाकार ले लेते हैं लेकिन जिन कलाकारों में हुनर होता है वे विस्थापित होने के बावजूद स्थापित रहते हैं। हिन्दी सिने-जगत ने विगत सौ वर्षों में अनेक प्रतिभाएँ दी, उन प्रतिभाओं को अनेक मौके मिले भी लेकिन अविस्मरणीय रचना तो संयोग से बनती है। ऐसी ही एक कृति थी- 'मदर इंडिया।'
महबूब खान ने सन 1940 में फिल्म 'औरत' बनाई थी जो उस समय विशेष चर्चित नहीं हुई। उनके दिमाग में 'औरत' का 'रीमेक' बनाने का विचार आया। संगी-साथियों ने समझाया, मना किया लेकिन महबूब खान पर तो जैसे धुन सवार हो गई थी।
फ़िल्म का शीर्षक अमरीकी लेखिका कैथरीन मायो द्वारा 1927 में लिखित पुस्तक मदर इण्डिया से लिया गया जिसमे उन्होंने भारतीय समाज, धर्म और संस्कृति पर हमला किया था। पुस्तक में भारतीय स्वतंत्रता की मांग के विरोध में मायो ने भारतीय महिलाओं की दुर्दशा, अछू तों के प्रति भेद-भाव, जानवरों, धूल-मिट्टी और राजनेताओं पर हमला किया था। मायो ने पूरे भारत में गुस्से का माहौल उत्पन्न कर दिया और विरोधस्वरूप उनकी पुस्तकों को जलाया गया। महात्मा गाँधी ने भी पुस्तक का विरोध किया था और कहा- "यह गटर इंस्पेक्टर द्वारा लिखी गई कोई रिपोर्ट है।"
महबूब खान को इस फ़िल्म के शीर्षक का ख्याल सन 1952 में आया। महबूब खान ने बताया- "हमारी फ़िल्म 'मदर इंडिया' और मायो की मदर इण्डिया को लेकर काफ़ी असमंजस की स्थिति पैदा हो गई थी। दोनों ही वस्तुएँ बेहद अलग और एक दूसरे के विपरीत हैं। हमने जानबूझ कर फ़िल्म को 'मदर इण्डिया' कहा ताकि हम पुस्तक को चुनौती दे सकें और लोगों के दिमाग में से मायो की बकवास को बाहर निकल सकें।"
फ़िल्म की कहानी इस तरह लिखी गई जिससे भारतीय समाज में महिलाओं की स्थिति, पुरुषों के बढ़ते आकर्षण का विरोध और स्त्री के अपने स्वाभिमान पर दृढ़ निश्चय को दर्शाया गया। महबूब खान को इस कहानी की प्रेरणा अमरीकी लेखक पर्ल एस. बक की द गुड अर्थ (1931) व द मदर (1934) पुस्तकों से मिली जिन्हें सिडनी फ्रेंकलिन ने 1937 और 1940 में फ़िल्मों के रूप में रुपंतारित किया था। महबूब खान ने इन सब चीज़ों का अपनी 1940 में बनी फ़िल्म 'औरत 'में प्रयोग किया था जो 'मदर इण्डिया '(1957) की असली प्रेरणा बनी।
महबूब खान ने 'लीड रोल' के लिए नर्गिस को चुना, उस नर्गिस को जो जनमानस में अपनी रोमांटिक भूमिकाओं के लिए लोकप्रिय थी। नायिका राधा के पुत्र के रूप में उनकी पसंद दिलीप कुमार थे लेकिन वे नर्गिस के बेटे के रूप में अभिनय करने के लिए राज़ी नहीं हुए तब सुनील दत्त को उसका अवसर मिला। नायिका के पति की भूमिका में राजकुमार लिए गए। गीत शकील बदायूनी ने लिखे और संगीत दिया नौशाद ने।
नर्गिस ने अनेक फिल्में की थी, उनके अभिनय का असर हर सिने-प्रेमी पर था लेकिन 'मदर इंडिया' में वे नर्गिस न रही, राधा बन गई। कलाकार विलुप्त हो गया और कला उजागर हो गई।
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फिल्मों में मनमानी नहीं चलती, फिल्म की 'स्क्रिप्ट' होती है, निर्देशक होते हैं और अदाकार होते हैं। अमिताभ बच्चन ने टेलीविज़न के एक चैनल के साक्षात्कार में साहसिक बयान दिया था- 'यदि किसी अदाकार का अभिनय आपको अच्छा लगे तो यह न समझना कि उसने अच्छी 'एक्टिंग' की, वह उसका नहीं, वरन फिल्म के निर्देशक का कमाल है जिसने उस अदाकार से वैसा अभिनय करवा लिया।' यह तो तर्क-वितर्क से सुलझने वाली बात नहीं है कि असल कमाल किसका है लेकिन मोटे तौर पर ऐसा माना जा सकता है कि दोनों के सम्मिलित प्रयासों से वह असर बाहर आता है जो असरदार हो।
समय के साथ स्थापित कलाकार विस्थापित हो जाते हैं, उनकी जगह नए कलाकार ले लेते हैं लेकिन जिन कलाकारों में हुनर होता है वे विस्थापित होने के बावजूद स्थापित रहते हैं। हिन्दी सिने-जगत ने विगत सौ वर्षों में अनेक प्रतिभाएँ दी, उन प्रतिभाओं को अनेक मौके मिले भी लेकिन अविस्मरणीय रचना तो संयोग से बनती है। ऐसी ही एक कृति थी- 'मदर इंडिया।'
महबूब खान ने सन 1940 में फिल्म 'औरत' बनाई थी जो उस समय विशेष चर्चित नहीं हुई। उनके दिमाग में 'औरत' का 'रीमेक' बनाने का विचार आया। संगी-साथियों ने समझाया, मना किया लेकिन महबूब खान पर तो जैसे धुन सवार हो गई थी।
फ़िल्म का शीर्षक अमरीकी लेखिका कैथरीन मायो द्वारा 1927 में लिखित पुस्तक मदर इण्डिया से लिया गया जिसमे उन्होंने भारतीय समाज, धर्म और संस्कृति पर हमला किया था। पुस्तक में भारतीय स्वतंत्रता की मांग के विरोध में मायो ने भारतीय महिलाओं की दुर्दशा, अछू तों के प्रति भेद-भाव, जानवरों, धूल-मिट्टी और राजनेताओं पर हमला किया था। मायो ने पूरे भारत में गुस्से का माहौल उत्पन्न कर दिया और विरोधस्वरूप उनकी पुस्तकों को जलाया गया। महात्मा गाँधी ने भी पुस्तक का विरोध किया था और कहा- "यह गटर इंस्पेक्टर द्वारा लिखी गई कोई रिपोर्ट है।"
महबूब खान को इस फ़िल्म के शीर्षक का ख्याल सन 1952 में आया। महबूब खान ने बताया- "हमारी फ़िल्म 'मदर इंडिया' और मायो की मदर इण्डिया को लेकर काफ़ी असमंजस की स्थिति पैदा हो गई थी। दोनों ही वस्तुएँ बेहद अलग और एक दूसरे के विपरीत हैं। हमने जानबूझ कर फ़िल्म को 'मदर इण्डिया' कहा ताकि हम पुस्तक को चुनौती दे सकें और लोगों के दिमाग में से मायो की बकवास को बाहर निकल सकें।"
फ़िल्म की कहानी इस तरह लिखी गई जिससे भारतीय समाज में महिलाओं की स्थिति, पुरुषों के बढ़ते आकर्षण का विरोध और स्त्री के अपने स्वाभिमान पर दृढ़ निश्चय को दर्शाया गया। महबूब खान को इस कहानी की प्रेरणा अमरीकी लेखक पर्ल एस. बक की द गुड अर्थ (1931) व द मदर (1934) पुस्तकों से मिली जिन्हें सिडनी फ्रेंकलिन ने 1937 और 1940 में फ़िल्मों के रूप में रुपंतारित किया था। महबूब खान ने इन सब चीज़ों का अपनी 1940 में बनी फ़िल्म 'औरत 'में प्रयोग किया था जो 'मदर इण्डिया '(1957) की असली प्रेरणा बनी।
महबूब खान ने 'लीड रोल' के लिए नर्गिस को चुना, उस नर्गिस को जो जनमानस में अपनी रोमांटिक भूमिकाओं के लिए लोकप्रिय थी। नायिका राधा के पुत्र के रूप में उनकी पसंद दिलीप कुमार थे लेकिन वे नर्गिस के बेटे के रूप में अभिनय करने के लिए राज़ी नहीं हुए तब सुनील दत्त को उसका अवसर मिला। नायिका के पति की भूमिका में राजकुमार लिए गए। गीत शकील बदायूनी ने लिखे और संगीत दिया नौशाद ने।
नर्गिस ने अनेक फिल्में की थी, उनके अभिनय का असर हर सिने-प्रेमी पर था लेकिन 'मदर इंडिया' में वे नर्गिस न रही, राधा बन गई। कलाकार विलुप्त हो गया और कला उजागर हो गई।
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