देश की आज़ादी के बाद इतने बड़े राष्ट्र को चलाने और आगे बढ़ाने के लिए संविधान सभा में लम्बा विचार-विमर्श चला. लोकतंत्र की अवधारणा को अपनाया गया और राज्य को संचालित करने की शक्ति लोक के हाथों में सौंपना तय किया. आधी सदी से अधिक समय बीत गया, बीते समय में हम आगे बढ़े लेकिन समय से पीछे रह गए. समय हमसे तेज चल रहा है लेकिन हमारी गति कम है क्योंकि देश में गण और तंत्र अलग-अलग चल रहे हैं. यदि इन दोनों का साथ होता तो टीम-वर्क उभर कर आता और हम समय के साथ कदम ताल मिला लेते.
गणतंत्र के नाम पर हमें वोट देने का अधिकार मिला है लेकिन वोट उसे देना है जो कम बुरा है. अच्छे और बुरे के बीच चुनाव करने का अधिकार हमें प्राप्त नहीं है. गणतंत्र के नाम पर हमें बोलने का अधिकार मिला है लेकिन उसे तंत्र सुनता नहीं क्योंकि कुर्सी पर आसीन नेता और अफसर, जनता को मूर्ख समझते हैं, वे मानते हैं कि ये बेवज़ह हल्ला करने वाले नासमझ लोग हैं. वो समझते हैं कि 'ये' करेंगे, ये समझते हैं 'वो' करेंगे और दोनों एक-दूसरे की और संदेह भरी निगाह से देख रहे हैं. जब कुछ हासिल होता दिखाई नहीं पड़ता तो 'ये' 'वो' को गरिया रहा है और 'वो' 'ये' को. दोनों के बीच का पुल संविधानसभा में बनाया गया था लेकिन पुल पुराना पड़ता गया, सत्ता ने हौले-हौले पुल की नींव हटा दी, पुल भसक कर जमींदोज हो गया. अब प्रजा एक छोर पर खड़ी है और तंत्र दूसरे छोर पर, यही आज का बचा-खुचा गणतंत्र है.
ऐसा नहीं है कि हमारे देश में प्रगति नहीं हुई है. पुलिस का उदाहरण लेते हैं. आज़ादी के पहले पुलिस के हाथ में डंडा और बन्दूक थे, अब स्टेनगन है उनके हाथों में. ये स्टेनगन लोक की रक्षा के लिए नहीं है, तंत्र की रक्षा के लिए तैनात है. लोक अपनी रक्षा स्वयं करे, तंत्र की जिम्मेदारी नहीं है लेकिन तंत्र की रक्षा लोक करे क्योंकि तंत्र का जीवन लोक के मुकाबले अधिक महत्वपूर्ण है. सही तो है, तंत्र नहीं रहेगा तो लोक का क्या होगा? लोक का क्या है? रहे न रहे.
न्याय व्यवस्था को देख लीजिए, लोग इसलिए झगड़ लेते हैं कि न्यायालय है, जहां विवाद का निपटारा होगा लेकिन वादी-प्रतिवादी दोनों निपट जाते हैं. विवाद का समाधान नहीं होता, तारीख पर तारीख. न्यायालयों की अढ़धप में फंसे व्यक्ति की जो आर्थिक और मानसिक दुर्दशा होती है उसे वही व्यक्ति जानता है जिसे मुकदमा लड़ने का सौभाग्य प्राप्त हुआ हो. जज से लेकर मुंशी तक, हर व्यक्ति आमजन को इस कदर अपमानित और तंग करता है कि वह अदालत जाने के नाम से कान पकड़ लेता है. क्या हमारी आज़ादी के दीवानों ने ऐसी निकृष्ट न्याय व्यवस्था की उम्मीद की होगी?
कोई भी पार्टी हो, सबके नेता नौटंकीबाज हैं. सबको अपनी फ़िक्र है, गण की नहीं. गण तो उनके ऊपर पहुँचाने की सीढ़ी हैं, ऊपर पहुँच गए, खेल ख़तम, पैसा हज़म. शासक और प्रशासक आपस में मिलीभगत करके आमजन के जीवन को कष्ट में डालने के लिए हर संभव प्रयास करते हैं लेकिन गीत जन कल्याण के गाएंगे. ईमानदारी का भजन गाने राजनीतिज्ञ वाले बेईमानी के धन से चुनाव लड़ते हैं और जीतने के बाद वसूली अभियान चलाते हैं, जो हार जाता है वह भुट्टे की तरह जलता-भुंजता-कुढ़ता रह जाता है.
तंत्र के किसी वर्ग को गण से कोई लेना-देना नहीं दिखता. सब खुद में मस्त हैं. कोई-कोई ऐसा दिलवाला दिख जाता है जो जन के मन को समझता है और उस दृष्टि से सार्थक काम करता है लेकिन वह व्यक्ति भी बहुत जल्दी सत्ता की नज़रों में चढ़ जाता है और उसके हाथ-पैर बाँध दिए जाते हैं ताकि उसकी कार्य-संस्कृति का प्रभाव पूरे सिस्टम को कहीं प्रदूषित न कर दे !
हर २६ जनवरी को गणतंत्र दिवस मनाया जाता रहेगा क्योंकि यह संविधान को सम्मान देने का उत्सव है. काश गणतंत्र दिवस की भावना को समझते हुए अपनी शक्ल संविधान के पन्नों में देखें और अपनी गलतियों को सुधारने का यत्न करें अन्यथा अगली पीढ़ी हमें माफ़ नहीं करने वाली.
नौटंकी ज़ारी है.
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गणतंत्र के नाम पर हमें वोट देने का अधिकार मिला है लेकिन वोट उसे देना है जो कम बुरा है. अच्छे और बुरे के बीच चुनाव करने का अधिकार हमें प्राप्त नहीं है. गणतंत्र के नाम पर हमें बोलने का अधिकार मिला है लेकिन उसे तंत्र सुनता नहीं क्योंकि कुर्सी पर आसीन नेता और अफसर, जनता को मूर्ख समझते हैं, वे मानते हैं कि ये बेवज़ह हल्ला करने वाले नासमझ लोग हैं. वो समझते हैं कि 'ये' करेंगे, ये समझते हैं 'वो' करेंगे और दोनों एक-दूसरे की और संदेह भरी निगाह से देख रहे हैं. जब कुछ हासिल होता दिखाई नहीं पड़ता तो 'ये' 'वो' को गरिया रहा है और 'वो' 'ये' को. दोनों के बीच का पुल संविधानसभा में बनाया गया था लेकिन पुल पुराना पड़ता गया, सत्ता ने हौले-हौले पुल की नींव हटा दी, पुल भसक कर जमींदोज हो गया. अब प्रजा एक छोर पर खड़ी है और तंत्र दूसरे छोर पर, यही आज का बचा-खुचा गणतंत्र है.
ऐसा नहीं है कि हमारे देश में प्रगति नहीं हुई है. पुलिस का उदाहरण लेते हैं. आज़ादी के पहले पुलिस के हाथ में डंडा और बन्दूक थे, अब स्टेनगन है उनके हाथों में. ये स्टेनगन लोक की रक्षा के लिए नहीं है, तंत्र की रक्षा के लिए तैनात है. लोक अपनी रक्षा स्वयं करे, तंत्र की जिम्मेदारी नहीं है लेकिन तंत्र की रक्षा लोक करे क्योंकि तंत्र का जीवन लोक के मुकाबले अधिक महत्वपूर्ण है. सही तो है, तंत्र नहीं रहेगा तो लोक का क्या होगा? लोक का क्या है? रहे न रहे.
न्याय व्यवस्था को देख लीजिए, लोग इसलिए झगड़ लेते हैं कि न्यायालय है, जहां विवाद का निपटारा होगा लेकिन वादी-प्रतिवादी दोनों निपट जाते हैं. विवाद का समाधान नहीं होता, तारीख पर तारीख. न्यायालयों की अढ़धप में फंसे व्यक्ति की जो आर्थिक और मानसिक दुर्दशा होती है उसे वही व्यक्ति जानता है जिसे मुकदमा लड़ने का सौभाग्य प्राप्त हुआ हो. जज से लेकर मुंशी तक, हर व्यक्ति आमजन को इस कदर अपमानित और तंग करता है कि वह अदालत जाने के नाम से कान पकड़ लेता है. क्या हमारी आज़ादी के दीवानों ने ऐसी निकृष्ट न्याय व्यवस्था की उम्मीद की होगी?
कोई भी पार्टी हो, सबके नेता नौटंकीबाज हैं. सबको अपनी फ़िक्र है, गण की नहीं. गण तो उनके ऊपर पहुँचाने की सीढ़ी हैं, ऊपर पहुँच गए, खेल ख़तम, पैसा हज़म. शासक और प्रशासक आपस में मिलीभगत करके आमजन के जीवन को कष्ट में डालने के लिए हर संभव प्रयास करते हैं लेकिन गीत जन कल्याण के गाएंगे. ईमानदारी का भजन गाने राजनीतिज्ञ वाले बेईमानी के धन से चुनाव लड़ते हैं और जीतने के बाद वसूली अभियान चलाते हैं, जो हार जाता है वह भुट्टे की तरह जलता-भुंजता-कुढ़ता रह जाता है.
तंत्र के किसी वर्ग को गण से कोई लेना-देना नहीं दिखता. सब खुद में मस्त हैं. कोई-कोई ऐसा दिलवाला दिख जाता है जो जन के मन को समझता है और उस दृष्टि से सार्थक काम करता है लेकिन वह व्यक्ति भी बहुत जल्दी सत्ता की नज़रों में चढ़ जाता है और उसके हाथ-पैर बाँध दिए जाते हैं ताकि उसकी कार्य-संस्कृति का प्रभाव पूरे सिस्टम को कहीं प्रदूषित न कर दे !
हर २६ जनवरी को गणतंत्र दिवस मनाया जाता रहेगा क्योंकि यह संविधान को सम्मान देने का उत्सव है. काश गणतंत्र दिवस की भावना को समझते हुए अपनी शक्ल संविधान के पन्नों में देखें और अपनी गलतियों को सुधारने का यत्न करें अन्यथा अगली पीढ़ी हमें माफ़ नहीं करने वाली.
नौटंकी ज़ारी है.
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