Wednesday, 30 January 2019

लिखते लिखते

सोचने के साथ लिखने का संबंध तो है लेकिन हम सोचते अधिक हैं लिखते कम हैं. शायद सोचना सरल है किन्तु लिखना कठिन है. लिखने के लिए विचार के अलावा शब्द, शिल्प और शैली भी चाहिए। अपने स्कूली दिनों में जब मैंने हजारी प्रसाद द्विवेदी द्वारा लिखित एक लेख पढ़ा था, 'नाखून क्यों बढ़ते हैं' तो उसे पढ़कर मैं विस्मित हो गया था, आखिर यह निराली बात उनके के दिमाग में कैसे आयी होगी? लेखक ने नाखूनों के बढ़ने को मनुष्य की पाशविकता से जोड़ा था. अद्भुत लेख था वह.

जो भी लिखता है, वह अनुभव और उसके निष्कर्षों को अपने शब्द देता है. लेख किसी कहानी या उपन्यास की तरह सरस नहीं होते लेकिन ज्ञानवर्धक होते है. कालांतर में जब मुझे किस्से-कहानी लिखना आ गया तो लेख लिखने का साहस भी आ गया. विगत छः वर्षों में कई लेख ब्लॉग में लिखे, उनमें से कुछ ऐसे लेखों का चयन इस कृति के लिए किया गया जिन्हें पढ़कर आपको सुखद अनुभूति होगी। ये बोझिल नहीं, जीवनोपयोगी लेख हैं. कुछ बातें आपके जीवन-प्रबंधन से जुड़ी हुई हैं, कुछ आपके स्वास्थ्य से, कुछ समाज से, मार्केटिंग से तो कुछ मनोरंजन से. ये जीवन की सच्चाई से जुड़े लेख हैं.

इन लेखों को यद्यपि मैंने लिखा है लेकिन मेरी पत्नी माधुरी जी ने इस कार्य में मेरी बहुत मदद की है, विमर्श में सहभागी रही हैं. मुझे विश्वास है कि यह लेख संग्रह आपको पसंद आएगा और आप इस कृति को  पढ़ने की सिफारिश अपने परिचितों से भी करेंगे।

बिलासपुर (छत्तीसगढ़)                                                               द्वारिका प्रसाद अग्रवाल
20 मार्च 2019                                                                                    माधुरी अग्रवाल 

Monday, 14 January 2019

सिनेमा : सिनेमा और मैं

सीखने की प्रक्रिया जन्म लेने के साथ ही आरम्भ हो जाती है. जन्म के बाद मनुष्य को संस्कारित करने के लिए संसार ने भांति-भांति के तरीके रचे ताकि उसे पशुता से दूर रखा जा सके लेकिन समाज में मनुष्यता सिखाने वाले हैं तो दुष्टता सिखाने वाले भी हैं. दोनों अपने-अपने फ़न में माहिर होते हैं. जो जिसके कहने में आ गया- वही उस मनुष्य का भवितव्य होता है. हमारा जीवन स्वप्नवत है पर नींद खुल जाने पर हम उससे मुक्त नहीं हो पाते। जागृत अवस्था में संकट से जूझते रहना और उनसे मुक्त होने के स्वप्न देखना ही हमारा जीवन है। जैसे जीवन अनिश्चित है वैसे ही संकट भी हमारे अनुमान से परे होते हैं। हम सब उन्हीं परिस्थितियों से जूझ रहे हैं। सिनेमा इस संकट से कुछ देर की मुक्ति का साधन बन कर आया।
         
मनुष्य की उत्सुकताओं में से एक है- दूसरे व्यक्ति की ज़िन्दगी में झांक कर देखना। हम वह इसलिए देखना चाहते हैं क्योंकि एक सामाजिक प्राणी होने के कारण हमें अपने आस-पास हो रही घटनाओं पर नज़र रखना ज़रूरी लगता है। दूसरों की ज़िन्दगी में विविध रंग हुआ करते हैं जैसे कोई खुश दिखता है तो कोई दुखी, कोई बहादुर दिखता है तो कोई कायर, कोई चतुर दिखता है तो कोई बुद्धू। अगर गौर से देखा जाए तो प्रत्येक मनुष्य में ये सारे लक्षण विद्यमान रहते हैं और अलग-अलग अवसरों पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से उद्घाटित होते रहते हैं। इसके अतिरिक्त दूसरों की गल्तियां भी हमें आकर्षित करती हैं क्योंकि उनकी भूलें हमें कुत्सित आनन्द देती हैं। सिनेमा हमारी इन आवश्यकताओं की पूर्ति में सहायक सिद्ध हुआ, सम्भवतः इसीलिए लोकप्रिय भी हुआ।
         
बीसवीं शताब्दी की शुरुआत के भारतवर्ष पर गौर करें तो हमारा देश गरीबी, गुलामी और सामाजिक वर्जनाओं से ग्रस्त था. अनेक फिल्मों के कथानक इन्हीं विषयों को ध्यान में रखकर लिखे गए और एक से एक फ़िल्में बनी, सबसे ज्यादा रोमांटिक फ़िल्में बनी. तात्कालीन समाज में स्त्री-पुरुष सम्बन्धों में एक स्पष्ट लक्ष्मण रेखा थी जिसे लांघना घोर अनैतिक माना जाता था. लिहाज़ा, प्यार करने पर प्रतिबन्ध था और यदि किसी को किसी से दुर्घटनावश प्यार हो ही गया तो फ़िर उनके विवाह पर महाप्रतिबंध था. सिनेमा रचने वालों ने इस सामाजिक सोच का भरपूर विदोहन किया. पहले छेड़-छाड़ दिखाई, फिर दोनों की आँखे मिलीं, दोनों मुस्कुराए, साथ-साथ गाने गाए. उसके बाद अचानक किसी ने उन्हें प्यार करते देख लिया, परिवार में खबर हो गई, परिवार की इज्जत दांव पर लग गई. दोनों को अलग कर दिया गया. विरह-वियोग के गीत गाए गाए और फिल्म का दुखांत हो गया.  भारत के फिल्मकारों ने वर्जनाओं से ग्रस्त समाज की पीड़ा को उकेरा और फिर उस पर ठंडक देने वाला मरहम भी लगाया.
       
सिनेमा अगर आसन्न संकटों का दिग्दर्शन है तो वह मीठे सपने बेचनेवाला सौदागर भी है। मेरे किशोर-वय की एक सच्ची बात आपको बता रहा हूं, सन १९६१ में जब मैं चौदह वर्ष का था, एक फ़िल्म आई- ‘जंगली’, जिसमें काश्मीर की हसीन वादियां थी, शंकर-जयकिशन का मधुर संगीत था, उछलता-कूदता शम्मी कपूर था और जन्नत की परी जैसी सायराबानो। हाय, सायराबानो की छरहरी काया, मोहक नाक-नक्श, सलोनापन और झील जैसी शान्त आंखों ने मुझपर जादू सा कर दिया। वह बोलती तो उसकी आवाज़ सुनकर ऐसा लगता जैसे उसके होंठों से होकर दसेहरी आम की फ़ांकों से रस अब गिरा कि तब। सच बता रहा हूं, मैं रात को अपनी तकिया के नीचे उसका फ़ोटोग्राफ़ रखकर सोता था क्योंकि मुझे किसी ने बताया था कि वैसा करने पर वह मेरे सपने में आएगी। यह दूसरी बात है कि सायरा तो नहीं आई, एक बार मीनाकुमारी जरूर मेरे सपने में आई थी। उस समय अक्ल ने काम नहीं किया अन्यथा मैं मीनाकुमारी का फ़ोटोग्राफ़ तकिए में दबाकर सोता तो शायद सायरा सपने में आ जाती। इस घटना से आप यह आसानी से समझ सकते हैं कि सिनेमा सिर्फ़ हमें सपने ही नहीं दिखाता वरन हमारे सपनों में दिखता भी है।
         
हिन्दी सिनेमा ने विगत सौ वर्षों में अपने सीमित साधनों के बावज़ूद विश्व सिनेमा में अपनी अलग साख बनाई है, संख्या के साथ-साथ गुणवत्ता में भी। इस अवधि की फ़िल्मों का अवलोकन किया जाए तो अनेक ऐसी फ़िल्में बनी जो मानवीय मूल्यों की गहरी समझ लिए हुए थी। सन १९५५ में प्रदर्शित फ़िल्म ‘श्री ४२०’ को मैंने आठ वर्ष की उम्र में देखा था. उस फ़िल्म में मनुष्य के छ्द्म सपनों का अभूतपूर्व चित्रण था. उन दिनों भारतवर्ष आजादी की ताज़ी सांस ले रहा था, भारतवासियों की उमंगें लहरा रही थी, आशाओं के दीप जगमगा रहे थे; उसी समय `श्री ४२०' आई जिसने सभ्यता और प्रगति के मुखौटे पहने समाज को पहचानने का प्रयास किया और उसके संभावित खतरों से अवाम को परिचित कराया। उस फिल्म में संकट से जूझती गरीबी, अभावों की कसक, धनवान बनने की चाहत और उसके टेढ़े-मेढ़े रास्तों का मानवीय चित्रण किया गया था। उसके एक दृश्य में दिन-रात भीख मांगकर गुजर-बसर करने वाला भिखारी 'अपने राजू' को विश्वास के कारण संतान्वे रूपए, नौ आने और दो खोटे पैसे दे जाता है, अपनी ज़िन्दगी के सबसे दिलकश सपने- ‘अपने घर’ की खातिर ! वह कहता है- "दो-ढाई रूपए कम हैं, चाहे एक खिड़की कम लगाना पर घर दे देना भाई !" सभ्यता का मतलब मनुष्य के भीतर कोमलता का विस्तार है, पाशविकता का नहीं। देव और दानव मनुष्य के ह्रदय में एक साथ मौजूद होते हैं और दानवी प्रवृतियों से मुक्त होने की लगातार संघर्ष यात्रा ही सभ्यता के उत्थान की महागाथा है। फिल्म `श्री ४२०' में मनुष्य के संकट और स्वप्न का ह्रदयस्पर्शी चित्रण था। इस फ़िल्म को मैंने जितनी बार देखा, हर बार इसने मुझे कुछ नए अर्थ समझाए. फ़िल्मकार राजकपूर ने जैसे दर्शक को खुली छूट दे रखी हो कि फ़िल्म के हर फ़्रेम में दर्शक अपने जीवन को फ़िट करके देखे और उसके चाहे जितने अर्थ निकाले. यह सच है कि मनुष्य के दुख और सुख उसकी व्यक्तिगत अनुभूति होती है लेकिन जब हम उसे अपनों के बीच साझा करके व्यापक अभिव्यक्ति देते हैं तब वे सबके हो जाते हैं.
         
सन १९५७ में फ़िल्म ‘मदर इन्डिया’ आई जिसमें ग्रामीण जीवन की विषमताओं और समस्याओं का गहन विश्लेषण करने के लिए भारतीय ग्राम्य जीवन के वैविध्य भरे कथानक को बखूबी पिरोया गया था। उसमें गरीब के सपने थे और जिजीविषा का संघर्ष भी। लहलहाती फ़स्लों का संतोष था और बाढ़ से उजड़ गए सपने भी। स्त्री की लज्जा एवं सम्मान का संकट था और उसके भूखे बच्चों का पेट भरने की विवशता भी।
         
मेहबूब खान ने इन्सानी ज़ज़्बात और उसकी मजबूरियों को इस तरह उकेरा था कि फ़िल्म देखने वाले का दिल दहल जाए। स्वप्न और संकट का अनवरत संघर्ष मनुष्य के जीवन की वह विशेषता है जो सपनों को सच करने की चाहत और उसे संकट से लड़ने की ताकत देते रहती है। यदि वह निराश करती है तो नए सपने दिखाकर पुनः आशा का संचार करती है और इसी तरह जीवनचक्र चलते रहता है। फ़िल्म ने दो विकल्प दिए- एक, नायक का घर-परिवार से पलायन कर जाना और दूसरा, नायिका का अत्यन्त विपरीत परिस्थितियों से संघर्ष करना. मैंने अपने जीवन में इस फ़िल्म के नायक को नहीं, नायिका को आदर्श बनाया और बिगड़े हालात से वर्षों तक जम कर लोहा लिया.
         
सन १९६० में प्रदर्शित फ़िल्म ‘मुगल-ए-आज़म’ में दो पीढ़ियों के संघर्ष को आधार बनाकर इन्सानी ताकत और मोहब्बत की ताकत के फ़र्क का बखूबी चित्रण किया गया. इस भव्य फ़िल्म को मैंने तेरह वर्ष की उम्र में देखा था. मधुर गीत संगीत से सजी इस फ़िल्म को देखना मनमोहक था लेकिन समझना कठिन क्योंकि  फ़िल्म के संवाद इस कदर खालिस उर्दू में थे जो मेरी पकड़ के बाहर थे. हां, जलालुद्दीन मोहम्मद अकबर का पात्र मेरे पिता से मिलता-जुलता था और डरपोक सलीम का मुझसे. जब बड़ा हुआ, फ़िल्मों की समझ विकसित हुई, उर्दू समझ में आने लगी- तब समझ में आया कि सलीम-अनारकली की काल्पनिक कहानी को निर्माता-निर्देशक के. आसिफ़ ने इस खूबसूरती से बनाया कि अगर शहंशाह अकबर ज़िन्दा होते और इस फ़िल्म को देखते तो उनके दरबार में नौ की जगह दस रत्न होते.
         
निर्माता एल.बी.लछमन और निर्देशक हृषिकेश मुखर्जी ने एक ईमानदार फ़िल्म बनाई, ‘अनाड़ी’ जिसे राजकपूर, नूतन, ललिता पवार, मोतीलाल के अभिनय और शंकर जयकिशन के संगीत ने यादगार बना दिया. नायक की संघर्ष गाथा में ईमानदारी के पुट को जोड़कर इस फ़िल्म ने संदेश दिया था कि ईमानदारी की राह कठिन है लेकिन वही जीवन का असल संगीत है. उस फ़िल्म का यह संवाद मुझे जीवन में हर पल भर याद रहा और मुझसे कभी चूक नहीं हुई.
         
फ़िर सन १९७१ में आई फ़िल्म ‘आनन्द’ -जिसे मैंने अपनी युवावस्था में देखा था. हृषिकेश मुखर्जी ने ज़िन्दगी और मौत के संघर्ष को इस तरह चित्रित किया था कि कैन्सर जैसी जानलेवा बीमारी भी एक कविता बन गई.
         
तब मुझे मालूम न था कि ‘आनन्द’ की कहानी मेरे जीवन में भी घटेगी. सन २००२ में मेरे गाल में कैन्सर हुआ और उसके बाद २००८ तथा २००९ में उसने लौट-लौट कर हमले किए. तीनों बार चेहरे की सर्जरी हुई, हर बार मौत से सामना हुआ और मैं टक्कर लेता रहा. फ़िल्म ‘आनन्द’ का नायक राजेश खन्ना एक अभिनेता ही तो था लेकिन संकट की हर घड़ी में वह मेरे आसपास रहा और मेरी हिम्मत बढ़ाता रहा. प्रचण्ड पीड़ा के समय उस पात्र के मुस्कुराते चेहरे ने मेरी बहुत मदद की और वह मदद आज भी ज़ारी है. एक दिन सभी को जाना है लेकिन संघर्षपूर्ण ज़िन्दगी को हंसते-हंसते कैसे जिया जाता है- यह मैंने इस फ़िल्म से सीखा.
         
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सिनेमा : बात अभिनय की

हम सब अभिनय ही तो कर रहे हैं, जब तक सांस है, अभिनय चलता रहेगा, सांस रुक जाने पर रुक जाएगा और हम अपने वास्तविक स्वरूप में आ जाएंगे। जिंदगी में हम अपनी 'स्क्रिप्ट' हम लिखने की कोशिश करते ज़रूर हैं लेकिन अपना लिखा कम उपयोग में आता है और समय का लिखा हुआ अधिक पल्ले पड़ता है। डा॰ एरिक बर्न का मानना है कि मनुष्य की 'स्क्रिप्ट' उसके शैशवकाल में ही लिख जाती है, वह उसी के आधार पर अपना जीवन व्यतीत करता है। प्रश्न यह है कि इस 'स्क्रिप्ट' को कौन तैयार करता है ? इस 'स्क्रिप्ट' को हमारे बचपन से जुड़े आसपास के लोग तैयार करते हैं, उनकी गतिविधियों को देखकर शिशु अपने मस्तिष्क के कोरे कागज में लिख लेता है जिसका असर पूरे जीवन पर हावी रहता है। किसी साक्षात निर्देशक के बिना भी हमारे जीवन की फिल्म में हम अभिनय करते रहते हैं और बचपन में संरक्षित हुई 'स्क्रिप्ट' हमसे अभिनय करवाते रहती है।
       
फिल्मों में मनमानी नहीं चलती, फिल्म की 'स्क्रिप्ट' होती है, निर्देशक होते हैं और अदाकार होते हैं। अमिताभ बच्चन ने टेलीविज़न के एक चैनल के साक्षात्कार में साहसिक बयान दिया था- 'यदि किसी अदाकार का अभिनय आपको अच्छा लगे तो यह न समझना कि उसने अच्छी 'एक्टिंग' की, वह उसका नहीं, वरन फिल्म के निर्देशक का कमाल है जिसने उस अदाकार से वैसा अभिनय करवा लिया।' यह तो तर्क-वितर्क से सुलझने वाली बात नहीं है कि असल कमाल किसका है लेकिन मोटे तौर पर ऐसा माना जा सकता है कि दोनों के सम्मिलित प्रयासों से वह असर बाहर आता है जो असरदार हो।
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समय के साथ स्थापित कलाकार विस्थापित हो जाते हैं, उनकी जगह नए कलाकार ले लेते हैं लेकिन जिन कलाकारों में हुनर होता है वे विस्थापित होने के बावजूद स्थापित रहते हैं। हिन्दी सिने-जगत ने विगत सौ वर्षों में अनेक प्रतिभाएँ दी, उन प्रतिभाओं को अनेक मौके मिले भी लेकिन अविस्मरणीय रचना तो संयोग से बनती है। ऐसी ही एक कृति थी- 'मदर इंडिया।'
       
महबूब खान ने सन 1940 में फिल्म 'औरत' बनाई थी जो उस समय विशेष चर्चित नहीं हुई। उनके दिमाग में 'औरत' का 'रीमेक' बनाने का विचार आया। संगी-साथियों ने समझाया, मना किया लेकिन महबूब खान पर तो जैसे धुन सवार हो गई थी।
     
फ़िल्म का शीर्षक अमरीकी लेखिका कैथरीन मायो द्वारा 1927 में लिखित पुस्तक मदर इण्डिया से लिया गया जिसमे उन्होंने भारतीय समाज, धर्म और संस्कृति पर हमला किया था। पुस्तक में भारतीय स्वतंत्रता की मांग के विरोध में मायो ने भारतीय महिलाओं की दुर्दशा, अछू तों के प्रति भेद-भाव, जानवरों, धूल-मिट्टी और राजनेताओं पर हमला किया था। मायो ने पूरे भारत में गुस्से का माहौल उत्पन्न कर दिया और विरोधस्वरूप उनकी पुस्तकों को जलाया गया। महात्मा गाँधी ने भी पुस्तक का विरोध किया था और कहा- "यह गटर इंस्पेक्टर द्वारा लिखी गई कोई रिपोर्ट है।"
       
महबूब खान को इस फ़िल्म के शीर्षक का ख्याल सन 1952 में आया। महबूब खान ने बताया- "हमारी फ़िल्म 'मदर इंडिया' और मायो की मदर इण्डिया  को लेकर काफ़ी असमंजस की स्थिति पैदा हो गई थी। दोनों ही वस्तुएँ बेहद अलग और एक दूसरे के विपरीत हैं। हमने जानबूझ कर फ़िल्म को 'मदर इण्डिया' कहा ताकि हम पुस्तक को चुनौती दे सकें और लोगों के दिमाग में से मायो की बकवास को बाहर निकल सकें।"
       
फ़िल्म की कहानी इस तरह लिखी गई जिससे भारतीय समाज में महिलाओं की स्थिति, पुरुषों के बढ़ते आकर्षण का विरोध और स्त्री के अपने स्वाभिमान पर दृढ़ निश्चय को दर्शाया गया। महबूब खान को इस कहानी की प्रेरणा अमरीकी लेखक पर्ल एस. बक की द गुड अर्थ (1931) व द मदर (1934) पुस्तकों से मिली जिन्हें सिडनी फ्रेंकलिन ने 1937 और 1940 में फ़िल्मों के रूप में रुपंतारित किया था। महबूब खान ने इन सब चीज़ों का अपनी 1940 में बनी फ़िल्म 'औरत 'में प्रयोग किया था जो 'मदर इण्डिया '(1957) की असली प्रेरणा बनी।
       
महबूब खान ने 'लीड रोल' के लिए नर्गिस को चुना, उस नर्गिस को जो जनमानस में अपनी रोमांटिक भूमिकाओं के लिए लोकप्रिय थी। नायिका राधा के पुत्र के रूप में उनकी पसंद दिलीप कुमार थे लेकिन वे नर्गिस के बेटे के रूप में अभिनय करने के लिए राज़ी नहीं हुए तब सुनील दत्त को उसका अवसर मिला। नायिका के पति की भूमिका में राजकुमार लिए गए। गीत शकील बदायूनी ने लिखे और संगीत दिया नौशाद ने।
       
नर्गिस ने अनेक फिल्में की थी, उनके अभिनय का असर हर सिने-प्रेमी पर था लेकिन 'मदर इंडिया' में वे नर्गिस न रही, राधा बन गई। कलाकार विलुप्त हो गया और कला उजागर हो गई।

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सिनेमा : अवाम का सिनेमा

बीसवीं शताब्दी में सिनेमा का आगमन समाज के बदलाव की रहस्यमयी आहट थी। दूरगामी प्रभाव पड़ने वाले थे लेकिन उस समय तो यह विस्मय था, आँखें फैला देने वाली आश्चर्यजनक खोज। पर्दे पर चलती-फिरती इन तस्वीरों का कौतूहल एक दिन पूरी दुनिया को अपने आगोश में समेट लेगा, ऐसा किसी ने सोचा तक न होगा।        
शुरुआती फिल्में 'खामोश' थी लेकिन दुनिया को बहुत कुछ बता गई, नवीन वैज्ञानिक आविष्कारों से परिचित कराया, पृथ्वी की सैर कराई, डराया और हँसाया भी। उसके बाद फिल्मों को आवाज़ से जोड़ा गया, संवाद आए, गीत-संगीत आया। सन 1927 में पहली बार अमेरिका में सिनेमा में ध्वनि का प्रयोग किया गया, फिल्म का नाम था, The Jazz Singer तो फ़िल्मकार चार्ली चैपलिन ने 'सुसाइड ऑफ सिनेमा' शीर्षकयुक्त अपने लेख में लिखा था- 'ध्वनि के उपयोग से सुरुचिविहीन नाटकीयता के द्वार खुल जाएंगे और सिनेमा की अपनी विशिष्ट प्रकृति इसमें खो जाएगी।' चार्ली चैपलिन की भविष्यवाणी के प्रतिकूल ध्वनि के समावेश ने सिनेमा को और समृद्ध बना दिया, इस माध्यम के प्रवेश से सम्प्रेषण अधिक प्रभावोत्पादक हो गया। जनमानस सिनेमा देखने के लिए उमड़ पड़ा और गीत-संगीत की लहरों के साथ थिरकने लगा।
       
भारत में 7 जुलाई 1896 को आरंभ हुए सिनेमा प्रदर्शन से निर्माण तक की तमाम असुविधाओं और सामाजिक विरोध के बावजूद फिल्मों ने धीरे-धीरे अपने पैर जमा लिए। हिंदी सिनेमा के पितामह थे, दादा साहब फाल्के, जिन्होंने सन 1913 में फिल्म 'राजा हरिश्चंद्र' का अत्यंत सीमित साधन से निर्माण किया था. सन 1931 में अर्देशर ईरानी ने पहली बोलती फिल्म बनाई, 'आलम आरा'.
       
शुरुआती दौर में प्रचलित नाटकों का फिल्मांकन होता रहा जो सामान्यतया पौराणिक आख्यानों पर आधारित थे, फिर इन्हीं कथानकों पर स्वतंत्र रूप से फिल्में बनने लगी। आर्देशिर ईरानी, पृथ्वीराज कपूर, सोहराब मोदी जैसे समर्थ नाटककारों ने हिन्दी सिनेमा में प्रवेश कर इसे लोकप्रिय बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। दादा साहब फाल्के और बाबूराव पेंटर जैसे फिल्म-तकनीक-विशेषज्ञों ने सीमित साधनों के बल पर भारतीय सिनेमा की मजबूत नीव रखी।
       
फिल्में बनाना खर्चीला शौक है, बेहिसाब लागत वाला, बेशुमार मेहनती और बेहद जुनूनी काम है। सबसे पहले कहानी का चयन फिर धन का जुगाड़, कलाकारों और तकनीशियनों का चुनाव, 'लोकेशन', 'सेट' की व्यवस्था और फिल्म बन जाने के बाद प्रदर्शन का प्रबंध। हजारों के सपने आधे में टूट गए, सैकड़ों के सपने दुःस्वप्न में परिवर्तित हो गए। फिल्म 'हिट' न हुई तो फ़िल्मकार सड़क पर आ गया, कर्ज़ में डूब गया और अवसादग्रस्त होकर नशे की गिरफ्त में पहुँच गया। जोखिम भरे इस दुःसाहस का सामना करने वाले दो वर्ग बने, पहला व्यापारिक बुद्धि वाला निर्माता जिसने बाज़ार की मांग को ध्यान में रखते हुए फिल्मों का निर्माण किया और दूसरा कलात्मक बुद्धि वाला जिसने बाज़ार को ठेंगा दिखाया और आवाम की रूहानी ज़रूरतों को ध्यान में रखते हुए फिल्में बनाई।
         
आवाम के सिनेमा की शुरुआत का श्रेय निर्माता-निर्देशक बाबूराव पेंढारकर की मराठी फिल्म 'सावकारी पाश' को दिया जा सकता है जो साहूकारों के द्वारा गरीबों पर अत्याचार की कहानी पर आधारित थी। इस फिल्म ने सिनेमा को अवाम के साथ जोड़ा। इस सिलसिले को चंदूलाल शाह, वीरेन्द्रनाथ सरकार, पी. सी. बरुआ, देवकी बोस, नितिन बोस, हिमांशु रॉय, व्ही.शांताराम, महबूब खान, नन्दलाल जसवंतलाल, फणि मजुमदार, बिमल रॉय जैसे फिल्मकारों ने बखूबी आगे बढाया।
         
बाज़ार की नब्ज़ पर गौर करने वालों ने मनोरंजन को केन्द्र में रखकर 'मसाला' फिल्म की अवधारणा विकसित की जिसका आरंभ हिमांशु रॉय की 'सुपर हिट' फिल्म 'अछूत कन्या'(1936) से हुआ। इस फिल्म की सफलता ने हिन्दी फिल्म जगत को वह 'फार्मूला' दिया जो टिकट खिड़की पर भीड़ इकट्ठा करने में मददगार था। उसके बाद निर्माताओं ने नित नए प्रयोग किए, कुछ सफल हुए तो कुछ असफल। मोटे तौर पर मधुर गीत-संगीत, रोमांस और रोमांच सफलता का पैमाना बन गए। इस फार्मूले के 'इंग्रेडिएंट्स' में दिनोंदिन इज़ाफ़ा होता गया और टिकट खिड़की पर भीड़ जुड़ती गई। हिन्दी फिल्मों पर गीत-संगीत, मार-धाड़, हंसी-मज़ाक और आंसुओं का स्थायी कब्जा हो गया। कुछ फ़िल्मकारों ने हॉलीवुड की तर्ज पर 'सेक्स' को परोसा लेकिन भारतीय जनमानस ने उसे स्वीकार नहीं किया, इस प्रकार भारतीय फिल्मों में काफी हद तक शुचिता बनी रही।
       
विगत शताब्दी के उत्तरार्द्ध की फिल्मों को चार श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है- पहली, धार्मिक और ऐतिहासिक फिल्में जिन्हें देखने वाला वर्ग बहुत बड़ा था। यद्यपि उल्लेखित शताब्दी के मध्यकाल में अधिकाँश परिवारों में फिल्म देखने जाने पर सख्त पाबंदी हुआ करती थी किन्तु ऐसी फिल्मों के लिए 'जाओ, देख आओ' की सुविधा प्राप्त हो जाती थी। ये फिल्में अपनी 'पवित्रता' और मधुर संगीत के सहारे खूब चलती थी।
     
दूसरी, सामाजिक और पारिवारिक फिल्में जिन्हें बनाने में एव्हीएम, जेमिनी, प्रसाद प्रोडक्शन जैसी मद्रासी फिल्म निर्माण कम्पनियों को खास महारत हासिल थी। ये फिल्म निर्माता पारिवारिक कथानक पर संयुक्त परिवारों की तात्कालीन परिस्थितियों को पर्दे पर इस तरह प्रस्तुत करते कि परिवारों का समूह, खास तौर से महिलायें, सिनेमा हाल की ओर उमड़ पड़ते। परिवार की तकलीफों, प्रताड़नाओं और असुविधाओं का सामूहिक प्रदर्शन पूरे हाल को सिसकियों और आंसुओं से भर देता। उस विरेचन प्रक्रिया से तृप्त होकर दर्शक स्वयं को ‘रिलेक्स' महसूस करते और 'पैसा वसूल' की मनोदशा के साथ घर वापस जाता।
       
तीसरी,स्टंट फिल्में थी जिनके पात्र तलवारबाजी या उठापटक की विभिन्न विधाओं से उन दर्शकों का मनोरंजन करते थे जिन्हें 'चवन्नी क्लास' का तमगा हासिल था। ये फिल्में दर्शकों में उत्तेजना बनाए रखती, ठूठे और कमजोर लोगों की भी शक्तिसंपन्न कर देती फलस्वरूप इन दर्शकों की आँखें और कान लाल हो जाते, वे खुशी के मारे सीटियाँ बजाते और तालियाँ पीटने लगते। नाडिया, जान कावस, रंजन, शेख मुख्तार, निशि, दारासिंह जैसे अनेक कलाकार इन झनझनाती फिल्मों के जरिये बेहद लोकप्रिय थे। कहानी की मांग पर यदाकदा स्थापित नायक भी तलवार भांजते दिखाई पड़ जाते यथा- 'आन'(1952), 'आजाद'(1955) और 'कोहिनूर'(1960) में दिलीपकुमार आदि।
     
चौथी,'रोमांटिक' फिल्में थी जो युवाओं के दिल के बहुत नजदीक हुआ करती थी। सामान्यतया इनका कथानक अपराध के इर्द-गिर्द बुना जाता था जिसमें पारिवारिक खलनायकों से बचते या मुकाबला करते प्रेमियों की दुखद दास्ताँ को मधुर गीत संगीत के साथ प्रस्तुत किया जाता था। इन फिल्मों में पेड़ों के आसपास नाचते नायक-नायिका और बेबसी तथा बेवफाई के दर्द भरे गीत होते जो युवाओं को मोहब्बत में होने वाले खतरों से वाकिफ भी कराते और इश्क के जज्बात को सिनेमाहाल में ही उपलब्ध करा देते।
     
राजकपूर जैसे कुछ निर्धारित सीमा पार कर जाते अन्यथा 'पवित्रता' का फिल्म बनाते समय पर्याप्त ध्यान रखा जाता। निर्माता-निर्देशक यदि होशियारी में लक्ष्मणरेखा लांघता तो सेंसरबोर्ड बेरहमी से अपनी कैंची चलाता। केवल पक्षियों और फूलों के चुम्बन दृश्यों को अनुमति प्राप्त थी, वह भी संक्षिप्त। राजकपूर के अतिरिक्त दिलीपकुमार, अशोककुमार, देव आनंद, बलराज साहनी, शम्मी कपूर, किशोर कुमार, गुरुदत्त, राजेन्द्रकुमार, धर्मेंद्र, जितेंद्र, राजेश खन्ना, संजीव कुमार, सुनील दत्त, मनोजकुमार, अमिताभ बच्चन, शत्रुघ्न सिन्हा, महमूद आदि इस युग के महानायक रहे। नर्गिस, मधुबाला, मीनाकुमारी, नूतन, नन्दा, वैजयंतीमाला, तनुजा, माला सिन्हा, वहीदा रहमान, हेमा मालिनी, सायराबानो, आशा पारेख, साधना आदि का अत्यंत लोकप्रिय अभिनेत्रियों के रूप में बोलबाला था।
     
रोचक पटकथा, तीखे चुटीले संवाद, मनमोहक नृत्य और मधुर संगीत से सजी ये फिल्में उस समय की सामाजिक परिस्थितियों और समस्याओं का बखूबी चरित्र चित्रण करती थी। निर्माता और निर्देशक अपनी अभिरुचियों के अनुरूप लेखकों से कहानियां लिखवाते और उसे मनोरंजक बनाकर प्रस्तुत करते। ऐसा नहीं था कि सभी फिल्में स्तरीय थी, कुछ कमजोर फिल्में बनती थी परन्तु फूहड़ता, जुगुप्सा या अश्लीलता का कोई काम न था।
       
इसी दौरान  व्ही.शांताराम की 'दुनिया न माने'(1937), 'डा॰ कोटनीश की अमर कहानी'(1946), 'तूफान और दिया'(1956), 'दो आँखें बारह हाथ'(1957); महबूब खान की 'औरत'(1940), 'रोटी'(1942), 'मदर इंडिया'(1957); अमिय चक्रवर्ती की 'सीमा'(1955), बिमल रॉय की 'दो बीघा जमीन'(1953), 'परख'(1960); सत्येन बोस की 'जागृति'(1954), 'दोस्ती'(1964); राजकपूर की 'श्री 420'(1955), 'बूट पालिश'(1954), 'जागते रहो'(1956); बी॰आर॰चोपड़ा की 'धर्मपुत्र'(1961), ऋषिकेश मुखर्जी की 'अनाड़ी'(1959), 'आनंद'(1971); श्रीनिवास सथ्यू की 'गरम हवा'(1973), श्याम बेनेगल की 'अंकुर'(1974), 'निशांत'(1975), 'मंडी'(1983), 'मम्मो'(1994); गोविंद निहलानी की 'तमस'(1986) जैसी सामाजिक सरोकार से जुड़ी अनेक फिल्में बनी।
       
अधिकांश  फिल्म निर्माता अपने कार्य को व्यापार की तरह करते थे जिसका उद्देश्य लाभ कमाना होता था। उसके लिए वे फिल्म की कहानी में भावुकता, उत्सुकता, नाचना-गाना, अंग-प्रदर्शन, कॉमेडी, मार-धाड़ और सुखांत घटनाएं पिरोते थे। उनकी सोच वाज़िब थी क्योंकि फिल्म निर्माण में बहुत बड़ी लागत लगती थी जिसको वसूल करना मज़ाक नहीं था। सारे 'टोटकों' के बावज़ूद तथाकथित फार्मूला फ़िल्में पिटती थी वहीं पर कम बजट में बनी सामाजिक सरोकार की फ़िल्में न केवल लागत वसूल कर लेती थी वरन लाभ भी कमाती थी क्योंकि इन फिल्मों की कहानी दर्शक के जीवन के यथार्थ से जुडी हुई थी जिसे वह सिनेमा-हाल के अँधेरे में देखना चाहता था। वह महसूस करना चाहता था कि उसका संताप और उसकी भावनाएं उसके अकेले की नहीं बल्कि सार्वभौमिक हैं।
       
हिन्दुस्तानी सिनेमा में व्यापारियों की बहुतायत थी लेकिन कला-मनीषियों की उपस्थिति भी कम न थी। सच तो यह है की फिल्मों के व्यापारी कलाकारों की कला का शोषण करके धन कमाते थे लेकिन कभी-कभी 'सत्कर्म' भी हो जाता था, संयोग से संदेशवाहक फिल्में भी बन जाती थी जैसे बी॰आर॰चोपड़ा की 'नया दौर'(1957), एम॰एस॰वासन की 'पैगाम'(1959), 'जिस देश में गंगा बहती है (1960) आदि। यद्यपि अनेक फिल्मों में जनसामान्य की समस्या को कहानी का आधार बनाकर मनोरंजन का तानाबाना बुना जाता था ताकि कोई 'अच्छा संदेश' चला जाए और लागत भी वसूल हो जाए। जनोपयोगी पटकथा के आधार पर आगे बढ़ी अनेक फिल्में निर्माण के दौरान बनते-बनते भटक गई क्योंकि निर्माता-निर्देशक पर उनकी धारा बदलने के लिए 'फायनेंसर' और वितरकों का दबाव रहता था।
       
हिन्दी सिनेमा जगत में अब नई पीढ़ी ने काम सम्हाल लिया है जो वर्तमान दौर की जरूरतों के अनुसार फिल्में रचते हैं। उनका स्पष्ट कथन है- 'वही बनाएँगे जो बिकता है।' परिणामस्वरूप भारतीय सिनेमा को हॉलीवुड ने अपनी गिरफ्त में ले लिया और आयातित कहानी, स्टंट और निर्लज्जता ने पुराने मूल्यों को विस्थापित कर दिया। अब फिल्म बनाने का उद्देश्य समाज की समस्याओं पर चिंतन करना, बेहतर समाज का निर्माण करना, लोगों को शिष्टाचार सिखाना, देशभक्त बनाना, संवेदनशील बनाना नहीं रहा; उद्देश्य है, 'पब्लिक' का मनोरंजन करना और अपने 'बैंक बेलेन्स' की वृद्धि पर नज़र रखना है। आज का पटकथा लेखक 'क्यू' को तोड़कर अलग खड़े नायक से यह संवाद कहलाता है- 'जहां हम खड़े होते हैं, लाइन वहीं से शुरू होती है।' ऐसे गैरजिम्मेदार संवाद लेखकों और फिल्मकारों से सामाजिक सरोकार की उम्मीद कैसे की जाए ? अब तो 'मुन्नी बदनाम हुई डार्लिंग तेरे लिए' का युग है।
       
फिर भी नई पीढ़ी के आदित्य चोपड़ा, करण जौहर, संजय लीला भंसाली, आशुतोष गोवारीकर, राजकुमार हिरानी, मधुर भंडारकर, फरहान अख्तर, प्रकाश झा, इम्तियाज़ अली, अनुराग कश्यप, हर्षवर्धन कुलकर्णी, पूजा भट्ट, सुधीर मिश्रा, अभिषेक चौबे, सौरभ शुक्ल, आर. बाल्की, कबीर खान जैसे फ़िल्मकार अच्छी फिल्में दे रहे हैं। ये नवोदित आवाम से जुड़े यथार्थ को भारतीय सिनेमा के मुकुट में दैदीप्यमान मणि की तरह जड़ रहे हैं और वर्तमान दौर के दूषित चलचित्र-विश्व में महाभारत के भीष्म की तरह अडिग बने हुए हैं।
       
वर्तमान पीढ़ी को शिक्षित करने में फिल्में अपना योगदान दे सकती हैं बशर्ते, शिक्षा देने वाले स्वयं 'सुशिक्षित' हों।ऐसे फ़िल्मकार पहले भी थे और आज भी हैं जो समाज की गतिविधियों पर नज़र रखते हैं और उसकी विसंगतियों पर फिल्म के माध्यम से प्रहार करने का साहस करते है। मनोरंजन के साथ-साथ लोकशिक्षण का उत्तरदायित्व निभाने वाले और भी आएँगे, नई समझ लेकर आएँगे और फिल्मों को जनमानस के सकारात्मक परिवर्तन का माध्यम बनाएंगे। आने वाले समय को आने वाले फ़िल्मकारों से बड़ी उम्मीदें हैं जो फिल्मों के माध्यम से भावी पीढ़ी को मनोरंजन देने के साथ-साथ मनुष्य बने रहना सिखाएंगे और उन्हें दूसरों की तकलीफ़ों के प्रति संवेदनशील होने का पाठ पढ़ाएंगे।

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समाज : विज्ञान के ज्ञान का असर

समाज : विज्ञान के ज्ञान का असर 
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ज्ञान-विज्ञान का महत्व अपनी जगह ठीक है . विज्ञान हमारी ज़रुरत पूरी कर रहा है और अब हमारी ज़रूरी जरूरत बन भी गया है. विगत सदी के सौ वर्ष मानव इतिहास में उन्नति के सुनहरे वर्ष रहे हैं. इसने समय को बदल दिया, मनुष्य को बदल दिया, उसकी सोच को भी बदल दिया. इस बदलाव का श्रेय विज्ञान को जाता है.

विज्ञान जिस अदा से हमारे करीब आया वह मनभावन थी. उसने हमारे जीवन को विस्तार दिया. हमें आधुनिक चिकित्सा विज्ञानं दिया. इसकी मदद से हमारे कष्ट दूर हुए, असमय मृत्यु से अनेक मनुष्यों की जान बचाई बचाई.  शिक्षा की नयी तकनीक दी और दुनिया भर के ज्ञान-विज्ञान को सबके लिए आसान बना दिया. रस्सी से बनी खटिया को गद्देदार पलंग में बदल दिया. पैरों की ताकत से चलने वाले लोग दिमाग की शक्ति से भागने और उड़ने लगे. धीमी आवाज तेज हो गयी, दूरी नजदीकी में बदल गयी और देखते-देखते पूरी दुनिया हमारी मुट्ठी में आ गयी.

इधर दुनिया हमारी मुट्ठी में आई, उधर हम विज्ञान की मुट्ठी में चले गए. अब हमें पसीना नहीं सुहाता, ठण्ड बर्दास्त नहीं होती, बारिश के पानी में भीगने में मज़ा नहीं आता. प्रकृति के ऋतु परिवर्तन और हमारे शरीर के स्वाभाविक रुझान के तार टूट गए. प्रकृति आज भी अपना काम कर रही है लेकिन हम प्रकृति से दूरी बनाते जा रहे हैं.
हमारे देश में आदिकाल से ज्ञान उपलब्ध था, विश्व की बहुसंख्य आबादी के मुकाबले हम अधिक सभ्य थे. जब दुनिया भर के लोग आदिवासियों जैसा जीवन व्यतीत करते थे, नंगे रहते थे, कंद-मूल खाकर अपना पेट भरते थे तब हमारे पूर्वज वस्त्र धारण करते थे और अन्न उगाकर खाते थे.

शून्य का आविष्कार हमने किया. खगोल-विज्ञान के गहरे रहस्य हमारे मनीषियों के पास थे. हड़प्पा और मोहनजोदड़ो के अवशेष बताते हैं कि वास्तुकला के निर्माण में हमारे आदि-पुरुष कितने अनुपम थे. वास्तु निर्माण में हमारी वैज्ञानिकता का दुनिया लोहा मानती है. मलमल का कपड़ा हमारी उन्नत तकनीक का ज्वलंत उदाहरण है. धातु के अस्त्र-शस्त्र और काष्ठ कला के निर्माण में हमारे कारीगर अतुलनीय रहे हैं. 

आधुनिक विज्ञान ने अपनी खोज को छुपाया नहीं बल्कि उसे सार्वजनिक किया ताकि विज्ञान की तकनीक का उपयोग सामाजिक परिवर्तन के लिए किया जबकि हमारे देश में अनेक ज्ञानी अपने ज्ञान और उपलब्धियों को सीने में छुपाए चिता में भस्म हो गए. अपनी खोजी हुई विधा को रहस्य बनाकर रखने की इस जिद के कारण हमारी पुरातन वैज्ञानिक उपलब्धियां जनसामान्य के काम नहीं आ सकी. 

एक बात और है, अपने देश के सन्दर्भ में देखें तो विकसित देशों के मुकाबले हमारी गति बहुत धीमी है क्योंकि हमारी सोच किसी भी परिवर्तन को आहिस्ता-आहिस्ता अपनाती है. परिवर्तन को स्वीकारने की हिचकिचाहट हमें बार-बार रोकती है और यह संकोच हमें आगे बढ़ने के बजाय कदमताल करने के लिए मजबूर कर देता है. हम जब तक किसी नवीनता को अपनाते हैं, तब तक विज्ञान और आगे बढ़ जाता है और हम दौड़ में पिछड़ जाते हैं. हमारे शिक्षित समाज को आधुनिक तकनीक का लाभ उठाना नहीं आता. उन्नत तकनीक समाज को उन्नति की राह दिखाती है लेकिन भारतीय जनमानस को उसका सकारात्मक उपयोग कम समझ आता है, नकारात्मक अधिक. वे पुरानी परंपरा और आधुनिक खोज का ऐसा विचित्र घालमेल करते है कि उस विधा के मूल आविष्कारक को यदि पता लग जाए तो उसको अपने आविष्कार पर अफ़सोस होने लगेगा. इसकी वज़ह यह है कि वे अपनी दुनिया में खुश रहते हैं. संचार तकनीक इसका इसका जीता-जागता उदाहरण है. संचार तकनीक ने पूरे विश्व को हमारी मुट्ठी में समेट दिया है. संदेशों का आना-जाना त्वरित हो गया है. आपसी संवादों के आदान-प्रदान में इस तकनीक के कारण बहुत मदद मिली है लेकिन इसने मानवीय सरोकार को चिंताजनक स्तर तक कम कर दिया है. मानवीय संबंधों के मामले में हम अवनति की और अग्रसर हैं. दुःख की बात यह है कि जो विज्ञान मानवता के कल्याण के लिए नित नयी खोज कर रहा है, वही हमारे समाज में मनुष्यता को कमजोर कर रहा है.  

विज्ञान परम ज्ञान नहीं होता, यह सतत परिवर्तनशील प्रक्रिया है. कल जो ज्ञात था, आज अतीत है; जो आज ज्ञात है, कल अतीत हो जाएगा. विज्ञान ने हर युग में मनुष्यता को बेहतर मनुष्य बनने में मदद की, उन तकनीकों का अन्वेषण किया जिनसे मनुष्य के जीवन को सुविधाजनक बनाया जा सके. दो पैरों से चलने वाला मनुष्य, बैलगाड़ी, सायकिल, मोटर सायकिल, कार और वायुयान की गति से बढ़ता हुआ राकेट पर सवार होकर उड़ने लगा. 

ऊपरी तौर पर ऐसा लगता है कि मनुष्य विज्ञान के साथ-साथ आगे बढ़ रहा है लेकिन ऐसा नहीं है, विज्ञान के तेज कदमों के साथ चलना मनुष्य के वश की बात नहीं है. मनुष्य जब तक विज्ञान की तकनीक को समझने और अंगीकार करने की कोशिश करता है, तब तक विज्ञान बहुत आगे बढ़ जाता है. इन दोनों के बीच फासला लगातार बढ़ रहा है. जितना फासला बढ़ रहा है उतना ही विज्ञान मनुष्यता पर हावी होता जा रहा है, विज्ञान अब मालिक बन गया है और मनुष्य उसका गुलाम.

सबसे बड़ी खबर यह है कि हमारा मानवीय सरोकार दिन-प्रतिदिन कम होता जा रहा है. समाज विज्ञान के सन्दर्भ में हम लगातार गिरावट की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं. मोबाइल फोन जैसे गैजेट ने हमारी पीढ़ी को एकाकी बना दिया है, सब अपने-अपने में मस्त हैं. जैसे किसी को किसी से कोई सरोकार ही न हो. थोड़े-बहुत बातचीत अगर कहीं चल रही है तो वह किसी मजबूरी के चलते. अगर यही हाल रहा तो अंतिम संस्कार के लिए कन्धा देने वाले लोग नहीं मिलेंगे. वैवाहिक सम्बन्ध भसक रहे हैं. आपसी संबंधों का लिहाज़ ख़त्म हो रहा है. परिवारों में देने का भाव समाप्त हो रहा है, केवल लेने की जुगत बैठाई जा रही है. सेक्स बेपर्दा और अनियंत्रित होता जा रहा है. व्यवहार की शालीनता गायब हो रही है, 'मेरी मर्जी' का समूह गान चल रहा है. 


रिश्ते भूले, खैरियत भूले कल अदब भूल जाएंगे,
जुनून में कत्ल करके, कत्ल का सबब भूल जाएंगे. 

हमारी मान्यताएं जिस रफ़्तार से टूट रही हैं, वह भयावह है. ये सारे परिवर्तन विज्ञान की उन तकनीकों की देन है जो आज घर-घर में विराजमान हैं. इन परिवर्तनों को मैं गलत नहीं कह रहा हूँ क्योंकि सही-गलत की परिभाषा बदलती रहती है लेकिन सवाल यह है कि हमारे मानवीय मूल्यों के भविष्य क्या होगा? 

विज्ञान ने यह कभी नहीं चाहा कि मनुष्य तकनीक का दुरुपयोग करे. विज्ञान तो  मानव जाति के लिए वरदान बन कर आया लेकिन हम सब भस्मासुर बन गए हैं और खुद को भस्म करने के लिए आमादा हैं. 
दुःख की बात यह है कि जो विज्ञान मानवता के कल्याण के लिए नित नयी खोज कर रहा है उसी विज्ञान के कारण हमारे समाज की मानवीयता को कमजोर हो रही है. इसमें कोई संदेह नहीं कि वह परिवर्तन को प्रोत्साहित कर रहा है लेकिन मानवीयता को सार्थक दिशा में ले जाने के लिए हमारी मदद नहीं कर रहा है. 

विगत कुछ वर्षों में विज्ञान और तकनीक ने हमारे समाज को बदलने में अग्रणी भूमिका निभाई है. हमारे रहन-सहन और सोच पर इसका व्यापक असर हुआ है. यद्यपि भौगोलिक दूरियां कम हुई हैं लेकिन आपसी दूरियां बढ़ती जा रही हैं. मनुष्य आधुनिक तकनीक की पकड़ में आ चुका है. अब यह मानवीय मूल्यों को कुचलने की दुष्ट भूमिका में उतर आई है. एक मददगार के रूप में अवतरित सोच ने तानाशाह की शैली अपना ली है और वह मनुष्य को वैसा बदलने के लिए मजबूर कर रहा है, जैसा 'वह चाहता है'. अब विज्ञान मनुष्य को ऐसा मनुष्य बना रहा है जिसमें मानवता का रक्त न हो, केवल हाड़-मांस का शरीर हो. समस्या यह है कि उस बलशाली का क्या करें जो हम पर इस कदर हावी हो चुका है. उसका शरीर प्रति-पल मज़बूत हो रहा है और उसके सामने मानवता कमजोर पड़ती जा रही है.  

मुझे उम्मीद है कि हम सब विज्ञान के नकारात्मक उपयोग को सकारात्मक मोड़ देने के उपाय खोजेंगे ताकि अब तक हो चुके मानवीय नुकसान की मरम्मत हो सके और भविष्य में होने वाले नुकसान को रोका जा सके. 

यह तय है कि मनुष्य को कुचला जा सकता है लेकिन उसे हराया नहीं जा सकता. 

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समाज : कला संस्कृति और साहित्य

समाज : कला संस्कृति और साहित्य 
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विज्ञान ने हमारी सुविधा के लिए मशीनें बनाई, मशीनों ने धीरे-धीरे मनुष्य को ही मशीन बना दिया. अब उसके पास ललित कलाओं के लिए समय नहीं बचा. परिणामस्वरूप मनुष्य में मनुष्यता के लक्षण कमजोर पड़ते जा रहे हैं और धनोपार्जन की कामना बलवती होती जा रही है. दरअसल, कला की साधना से हमारी कल्पनाशीलता का विकास होता है. रचना हमारे लिए मनोरंजन मात्र नहीं वरन, हमें व्यवस्थित ढंग से जीने के उपाय सिखाती है.

हाथों में खेलते ऊन के गोले, उंगलियों के बीच उलझे क्रोशिया के धागे, लकड़ी के फ़्रेम में कसे कपड़े पर सुई की नोक से चुभकर निखरते रंगीन धागों के मनोरम चित्र और वे खुशियां हमसे बहुत दूर चली गई हैं. आंगन-चौबारे और घर के बाहर की दीवारों को गोबर या मिट्टी से लीपने के बाद सफ़ेद मिट्टी से की जाने वाली चित्रकारी अब गांव-देहात में ही सिमट गई, शहर में इन कलाकृतियों के दर्शन अब दुर्लभ हो गए हैं. हां, शहरों में रंगोली ने अपना असर अभी भी बनाए रखा है जो त्यौहारों में दिख जाता है. नववर्ष व दीपावली में हाथ से बनाए खूबसूरत बधाई कार्ड अब इतिहास की बात बनकर रह गए हैं क्योंकि बधाई संदेश देने के लिए मोबाइल और लेपटाप जैसे आधुनिक उपकरण हमारे पास उपलब्ध हैं जो सस्ते हैं और तीव्रगामी भी. ललित कलाएं बहुत तेजी से हमसे दूर होती जा रही हैं जिसके कारण हम सहज मानवीय भावनाओं से भी दूर होते जा रहे हैं. कला से जुड़ने का अर्थ है- स्वयं के व्यक्तित्व का विकास, ऐसा विकास जो अपने साथ-साथ दूसरों के लिए प्रेरणा भी बन सके और सहज मनोरंजन का साधन भी.
दक्षिण भारत में विवाह योग्य युवतियों को नृत्य निपुण होने पर अन्य लड़कियों की स्पर्धा में अधिक पसन्द किया जाता था, वहीं पर, बंगाल में गायन और उत्तर भारत में सिलाई-कढ़ाई को प्राथमिकता मिलती थी. पाक कला में दक्षता तो सभी परिवारों की अनिवार्य चाहत रही है. इस तरह कलाएं स्वयं ही पनपती और विकसित होती थी. बदलते परिवेश में ये बातें कमजोर पड़ गई हैं क्योंकि धन-कमाऊ पत्नी और पति अब विवाह की अनिवार्यता हो गई है. पैसे के महत्व ने अब कला को गौण कर दिया है. कला सीखने की क्या जरूरत है ? जरूरत होगी तो खरीद लेंगे, जेब में पैसा होना चाहिए.
ऐसे उदाहरण अक्सर दिखाई देते हैं कि प्रशासनिक अधिकारी, चिकित्सक, इन्जीनियर या व्यापारी साहित्य सृजन कर रहे हैं क्योंकि उन्हें उनकी अपनी अभिरुचि को विकसित करने का यथोचित अवसर नहीं मिला. वे ऐसे काम में फँस गए जिसकी ख्वाहिश उन्हें न थी किन्तु वे उस समय अपने माता-पिता की इच्छा पूरी करने के लिए प्रतिबद्ध थे. 'केरियर' बनाने के चक्कर में वे इस तरह उलझे कि उनकी मौलिक प्रतिभा घुट-घुट कर कहीं दबी रह गई और अब जगह खोज कर इधर-उधर से प्रस्फ़ुटित हो रही है. यह उस अन्धी दौड़ का परिणाम है जिसने इनसे पूछा था- 'कविता लिख रहे हो, कहानी लिख रहे हो, चित्र बना रहे हो, खेल रहे हो, योग-प्राणायाम-ध्यान कर रहे हो, पर यह तो बताओ कि अपना घर कैसे चलाओगे ?' सवाल यह उठता है कि क्या पेट भरना ही जीवन का एकमात्र उद्देश्य है ? तो आज के युग का जवाब है- 'हाँ.'
कुछ 'सिरफिरे' अपवादों को छोड़ दें तो शेष विश्व के लोगों की केवल दो समस्याएँ हैं- पेट भरने की समस्या और पेट के नीचे की आग बुझाने की समस्या। ऐसी सामाजिक सोच के साथ कला, संस्कृति और साहित्य को कैसे विकसित किया जा सकता है?
अब, ऐसा भी नहीं है कि सब कुछ हाथ से निकल गया हो. अभी भी ऐसे जागरूक साधक हैं जो इसकी ज्योति को जलाए और बचाए रखे हुए हैं. नृत्य, गायन, संगीत, लेखन, चित्रकला, नाटक, और फ़िल्मांकन के क्षेत्र में अनेक लोग मनोयोग से साधनारत हैं लेकिन लोकप्रियता के एक स्तर को प्राप्त करने के बाद उनकी ऊर्जा भटकने लगती है, प्रवीणता निखारने के स्थान पर अपनी कीमत लगवाने और बढ़वाने में केन्द्रित हो जाती है. परिणामतः कला में पारंगत होने वाला मनुष्य गणित के ऐसे सवालों में उलझ जाता है जिसके कारण उसकी तथा उसके जरिए दूसरों को ललित कला से जोड़ने की सम्भावनाएं कम होती जाती हैं. देश की इतनी बड़ी आबादी और कला संस्कृति और साहित्य की ओर कम होता रुझान देश के मानसिक स्वास्थ्य के लिए खतरे की घंटी बजने जैसा है.

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समाज : अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता

समाज : अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता
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किसी सूचना या विचार को बोलकर, लिखकर या किसी अन्य रूप में अभिव्यक्त करने की आज़ादी अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता कहलाती है। संविधान में अनुच्छेद १९ (१) के तहत प्रदत्त मौलिक अधिकारों में अभिव्यक्ति का अधिकार हमारे देश के लोकतान्त्रिक स्वरूप को बनाए रखने का एक महत्वपूर्ण ज़रिया  है। जिस देश में लोगों के मुंह चुप करा दिए जाते है, कलम थाम ली जाती हैं, वहाँ अराजकता हावी होना तय है, शासन निरंकुश हो जाता है। जनतंत्र में जनता का शासन होता है इसलिए जनता के मन की बात को समझने और समझाने के लिए अभिव्यक्ति सर्वोत्तम साधन है। लोग क्या चाहते हैं, क्या नहीं चाहते, इसे स्वतंत्र अभिव्यक्ति के माध्यम से ही ज्ञात किया जा सकता है।

अभिव्यक्ति किसी संदेश को व्यक्त करने का विस्तार है। भारत के संविधान में इसे जनता का मौलिक अधिकार घोषित किया गया है, वहीं पर इसके उपयोग पर पाबन्दियाँ लगाने के लिए भारतीय दंड संहिता में प्रावधान भी बनाए गए हैं, अर्थात स्वतन्त्रता है, लेकिन सीमित। यह पाबंदी सड़क में बने हुए उस मार्ग-अवरोधक की तरह है जो तेज गति से वाहन चलाने पर, होने वाली दुर्घटना की चेतावनी देता है और गति कम करने की बाध्यता भी उत्पन्न करता है। इसका एक मतलब यह निकलता है कि नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता सीमित है। उसकी सीमा कानून तय करता है और कानून शासन के हाथ में है इसलिए असली ताकत जनता के हाथ में नहीं वरन शासन के हाथ में है। शासन की मंशा लोकतान्त्रिक होने पर स्वतन्त्रता के पैमाने शिथिल रहते हैं लेकिन उसके गैर-लोकतान्त्रिक होने पर स्वतन्त्रता सीमित हो जाती है।

अभिव्यक्ति और स्वतन्त्रता, दोनों बरसाती नदी की तरह हैं जिन्हें सीमा में बांधना बेहद कठिन है। अभिव्यक्ति याने अपने मन की बात व्यक्त करना। मन की बात करने के सबके अलग-अलग तरीके होते है। बच्चे मैदान में खेलते समय शोर मचाते हैं, वे शोर करके अपनी खुशी व्यक्त करते हैं। छोटे बच्चे की माँ काम की अधिकता का गुस्सा अपने बच्चे को झापड़ मार कर व्यक्त करती है। पति से नाराज पत्नी किचन में बर्तन पटक कर अपना आक्रोश व्यक्त करती है या पति से बात करना बंद कर देती है। माता-पिता अपने बच्चों की गलती पर नाराज़ होते हैं या बड़बड़ा कर गुस्सा जाहिर करते है। कुछ लोग अप्रिय बात पर सामने वाले को केवल घूर देते हैं तो कुछ मार-पीट पर उतारू हो जाते हैं। इन सभी तरीकों के पीछे दूसरे को सुधारने या उसके व्यवहार को बदलने मंशा होती है।

यह सदैव विवाद का कारण रहा है कि अभिव्यक्ति का कौन सा तरीका सही है ? सकारात्मक अभिव्यक्ति सबको अच्छी लगती है लेकिन आलोचना पीड़ा देती है। आलोचना को समालोचना मानने का अभ्यास बहुत कम लोगों में होता है। खास तौर से राजनीति में जब किसी बात का विरोध होता है तो जनहित के महत्व की बात भी दलीय राजनीति से जोड़कर चतुराई के साथ ख़ारिज़ कर दी जाती है। ज़िंदा कौम विरोध करती है, उसके तरीके अख़्तियार करती है और अपनी अभिव्यक्ति को सत्ता के गलियारों में प्रविष्ट कराती है।

स्वतन्त्रता की सीमाएं अनिश्चित है। मनुष्य असीमित स्वतन्त्रता चाहता है लेकिन समाज उसे बांधकर रखना चाहता है। परंपरा से चले आ रहे अलिखित नियमों के अनुरूप उसे अनुकूलित किया जाता है ताकि मन, विचार और कृत्य से वह समाज के निर्धारित दायरे में रहे। अलग-अलग समूहों के अपने-अपने नियम होते हैं। इन समूहों में कई बार ऐसी घटनाएँ हो जाती हैं जो समूह को स्वीकार्य नहीं होती, यहीं से विरोधाभास शुरू होता है और संघर्ष आरम्भ हो जाता है। कई बार दो समूहों के मध्य विवाद की ऐसी स्थिति उत्पन्न हो जाती है जो बड़े संघर्ष का रूप ले लेती है। गहराई से देखें तो इन विवादों के पीछे स्वतन्त्रता से जुड़े हुए सूत्र होते हैं जो ऊपरी तौर से दिखाई नहीं पड़ते।

हर उम्र में स्वतन्त्रता की चाहत अपना रूप बदलती है। बचपन उछल-कूद की आज़ादी चाहता है तो यौवन अपनी मनमर्जी से काम करने की। प्रौढ़ को विस्तार की छूट चाहिए तो वृद्ध को विश्राम की। जाने-अनजाने हम सब एक-दूसरे की सीमा का अतिक्रमण करते हैं लेकिन दूसरों से उम्मीद करते है कि वे सीमा में रहें, यह बेहद चिंताजनक है। मैं यदि सीमा का अतिक्रमण करूं तो उसके लिए मेरे अपने तर्क हैं, कारण हैं लेकिन दूसरा कोई तोड़े तो हम कहेंगे- 'तुमको अपनी सीमा याद रखनी चाहिए।' हम में कितने लोग हैं जो किसी कार्य को करने के पहले संविधान के प्रावधानों या भारतीय दंड संहिता के नियमों को याद करते हैं या उन्हें याद रख सकते हैं ! आम तौर पर हमारा व्यवहार सुविचारित नहीं होता, एक 'रिफ़्लेक्स' होता है जो असावधानी से अभिव्यक्त हो जाता है, परिणाम चाहे जो हो।

ऐसा कहा जाता है कि स्वतन्त्रता उतनी होनी चाहिए जो दूसरे को कष्ट न दे, असुविधा में न डाले लेकिन किसी एक प्रतिक्रिया का सब पर एक जैसा असर नहीं होता। एक बार मैं अपने एक मित्र के घर किसी कार्य से गया था। बैठक में हम दोनों बात कर रहे थे अचानक उनका चार वर्षीय पुत्र मेरे पास आया और उसने मुझे दो झापड़ लगाए। उस अनायास झापड़ के कारण मैं असहज हो गया क्योंकि बच्चे की वैसी अभिव्यक्ति का मूल कारण मुझे समझ में नहीं आ रहा था। मैं उस बच्चे से पहली बार मिल रहा था और उस बच्चे ने भी मुझे पहली बार देखा था। उस बच्चे ने 'रिफ़्लेक्स' में वैसा किया। प्रश्न यह है कि क्या वह बच्चा है इसलिए उसे ऐसा करने की स्वतन्त्रता है ? मुझे आश्चर्य तब हुआ जब उस बालक के पिता को अपने सुपुत्र के कृत्य पर हंसी आ गई, वे गदगद हो गए, जैसे उनके पुत्र ने कोई प्रशंसनीय कार्य कर दिया हो। तो, सबकी स्वतन्त्रता के अर्थ अलग-अलग होते हैं।

स्वतन्त्रता को मर्यादित करने के पैमाने भी युग के साथ परिवर्तित होते रहते है. समाज हर दिन बदलता है, कपड़ों के फैशन की तरह. जो कल गलत था, आज सही है. जो आज सही है, कल गलत घोषित हो जाएगा. धन-संपत्ति-वैभव और स्त्री-पुरुष देह का दिखावा कभी अशोभनीय माना जाता था, आज शोभायमान हो गया है, उनके स्वतन्त्र सोच की अभिव्यक्ति करता है. बड़ों का मान-सम्मान अब अनिवार्य नहीं रह गया. जीवन से सम्बंधित निर्णय लेने में अब माता-पिता की भूमिका गौड़ होती जा रही है. इन उदाहरणों से यह समझा जा सकता है कि सामाजिक मर्यादाएं भी स्वतंत्र होकर आधुनिक होना चाहती हैं.

हमारे देश के लोकतंत्र ने लोगों को पारंपरिक अधिनायकवादी सोच से हटकर लोकतान्त्रिक सोच के लिए प्रशिक्षित किया है. जीवन के हर क्षेत्र में खुलापन उभर रहा है और खुलकर अपने विचारों को व्यक्त करने का साहस विकसित हुआ है. आम भारतीय खुलने की कोशिश में है लेकिन पुरानी मान्यताएं और कानून उनके लिए जंजीर और ताले लिए आसपास मंडरा रहा है. इन दिनों स्वतन्त्रता और मर्यादा के बीच अदृश्य संघर्ष चल रहा है जो इस बदलते समाज के लिए मनोरंजक और रोचक कहानियाँ लिख रहा है.

उम्मीद है कि स्वतन्त्रता की जीत होगी और बंधनमुक्त समाज उभर कर सामने आएगा.

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स्वयं प्रबंधन : कार्य संस्कृति

स्वयं प्रबंधन : कार्य संस्कृति 
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समाज शास्त्री अब्राहम मास्लो का निष्कर्ष है - 'यदि मनुष्य को कुछ किए बिना खाने को मिल जाए तो वह अपने बिस्तर से नहीं उठेगा।'

वह 'भूख' है जो मनुष्य को काम करने के लिए मज़बूर करती है। इसका एक निहितार्थ यह भी है कि मनुष्य परम आलसी जीव है ! किसी भी उम्र का मनुष्य हो, वह काम करने से बचना चाहता है, काम न करने के बहाने खोजता है। योग के कार्यक्रम को देखकर स्वस्थ होना चाहता है लेकिन योग करना नहीं चाहता। 'खाना ख़जाना' के कार्यक्रम को मन लगाकर देखनेवालों की कमी नहीं लेकिन किचन में उन डिशों को बनाकर खाने-खिलाने वाले बिरले होते हैं। सुबह जागने का संकल्प करनेवाले अलार्म बजने पर अलार्म के आविष्कारक को को मन ही मन गरियाते हैं और उसे 'ऑफ' करके और अच्छे से सो जाते हैं। इस प्रकार के अनेक उदाहरण हमारे आसपास बिखरे हुए हैं जो हमारे आलस्य का गुणगान करते पाए जाते हैं। अब, स्वभाव से जन्मजात आलसी इस व्यक्ति को काम से लगाना बेहद चुनौतीपूर्ण कार्य है।

जैसे, सरकारी सेवा में पदानुक्रम होते हैं। इस क्रम में सबके ऊपर कोई न कोई होता है। हर व्यक्ति स्वयं को 'बॉस' समझता है लेकिन बॉस कोई नहीं होता, हर कोई अधीनस्थ होता है। हर कोई अपने अधीनस्थ को धमकाकर या उसे चमकाकर काम लेता है क्योंकि हमारे बाप-दादों के जमाने से यही परिपाटी चली आ रही है, हमने वही सीखा है। यह सामंतवादी उपाय सुधारवादी प्रयोग की देन है जिसका असर सरकार में है, समाज में है, व्यापार में है और परिवार में भी है। बीसवी सदी के आरंभ में अनेक समाजशास्त्रियों ने मानव मन की गहराई में जाकर यह समझने की कोशिश की कि इस आलसी जीव से कैसे काम लिया जाए ?

समस्या यह है कि आलसी व्यक्ति को सक्रिय कैसे किया जाए!

आलस्य की शुरुआत मनुष्य के बचपन से होती है। ये प्रारम्भिक वर्ष बड़े मज़े के होते हैं। आराम से पड़े हैं, दिन में बीस-बीस घंटे सो रहे हैं, भूख लगी रो रहे हैं। माँ दौड़कर आएगी और दूध पिलाएगी। हगने-मूतने के लिए भी कहीं उठकर नहीं जाना है, सब बिस्तर पर हो रहा है और बिना किसी स्व-प्रयास के साफ हो रहा है। बदन की मालिश हो रही है, नहलाया जा रहा है, कपड़े बदले जा रहे हैं, सजाया-संवारा जा रहा है। कितना अच्छा हो कि मनुष्य का पूरा जीवन ऐसी ही सुख-सुविधा में बीते! लेकिन जैसे ही उम्र बढ़ती है, परिवार में बच्चे को आत्मनिर्भर बनने का प्रशिक्षण दिया जाता है। उम्मीद की जाती है कि दस वर्ष का होते-होते वह अपने काम खुद करने लगे। आत्मनिर्भर बनाने का यह दौर उसके भावी व्यवहार के लिए निर्णायक होता है। इस शिक्षण अवधि में यदि उसने सक्रियता का पाठ पढ़ लिया तो वह आजीवन सक्रिय रहेगा और अगर इसे न सीख पाया तो पूरा जीवन अजगर की तरह गहरी सांस लेगा और उम्मीद करेगा कि उसका भोजन उसके पास उड़ कर उसके पास चला आए।
दो आलसी एक बेर के पेड़ के नीचे लेटे थे। पेड़ में बेर के फल लटक रहे थे। एक ने दूसरे से कहा- 'कितना अच्छा हो कि बेर टपक का गिर जाए तो हम लेटे-लेटे खा लें।'
दूसरे ने उसे डपटते हुए कहा- 'चुप, बेर इधर-उधर गिर जाएगी तो उसे उठाने के लिए उठना पड़ेगा, कितना अच्छा हो कि बेर सीधे मुंह में आकर गिरे।'

बचपन में मनुष्य को कुछ समझ नहीं आता। माता-पिता और शिक्षक की नाव में बैठकर उस उम्र को बिताना होता है। वे नाव को जिस दिशा में ले जाए या जो कहें, वह सही मानना होता है। किशोरावस्था में ही हमें अपनी समझ और बुद्धि को परिमार्जित करना अत्यंत आवश्यक है। आप इस बात से सहमत होंगे कि इस कालखंड में मनुष्य के समक्ष अनेक चुनौतियाँ रहती हैं, जैसे, वह अच्छा छात्र बनना चाहता है लेकिन उसका पढ़ाई में मन नहीं लगता, उत्कृष्ट खिलाड़ी बनना चाहता है लेकिन खेल के मैदान में सांस फूलती है, घर के काम में दक्ष होने की अभिलाषा है लेकिन वह कष्टसाध्य है, आदि। अपनी ऐसी मनोदशा में किशोर बहाने बनाना आरंभ कर देता है और परिश्रम से बचने के ये प्रयत्न उसे आलसी स्वभाव का बना देते है। काम से बच निकलने की यह यात्रा आजीवन चलती है, कोई काम करने को कहे तो बुरा लगता है, परिणामस्वरूप मनुष्य के विकास की गति धीमी पड़ जाती है।

मनुष्य की कार्यशैली के तीन रूप होते हैं, सक्रिय, अर्धसक्रिय और असक्रिय। सक्रिय वे लोग है जो परिश्रम को पूजा मानते हैं और ज़िम्मेदारी की गंभीरता को समझते हैं। ऐसे लोगों को आप आराम से बैठे या ऊँघते या आँखें बंद करके पसरे हुए नहीं पाएंगे। इन्हें काम दिखता है, सूझता है और जब तक काम पूरा न हो, इन्हें चैन नहीं पड़ता। सक्रियता का यह गुण आपको भारत उपमहाद्वीप की गृहणियों में बहुतायत से मिलेगा। गृहणियाँ घर के काम को जिस सूझ-बूझ और परिश्रम से संपादित करती हैं, वह किसी बड़ी कंपनी के प्रबंध-संचालक के काम से कम नहीं होता। उनका किचन प्रबंधन की पाठशाला है, उनका घर सुप्रबंधन का विश्वविद्यालय है। घर व्यवस्थित रखने का उनका बुद्धि-कौशल और भोजन बनाने से लेकर चौका समेटने तक का उनका परिश्रम उनकी बौद्धिक और शारीरिक सक्रियता का जीता-जागता उदाहरण है।

अर्धसक्रिय वे होते हैं जो हर समय सक्रिय नहीं होते बल्कि अपने 'मूड' से संचालित होते हैं। इनमें से अस्थिर स्वभाव के लोग कुछ खास अवसरों पर, या किसी खास व्यक्ति को देखकर या किसी को अपनी सक्रियता दिखाने के लिए सक्रिय होते हैं। इस श्रेणी के प्राणी कठिन कार्यों से खुद को दूर रखते हैं और 'यह काम मुझसे नहीं होगा' कहकर काम को दूसरों की तरफ खिसकाने के विशेषज्ञ होते हैं। वहीं पर स्थिर स्वभाव के लोग परिस्थिति की गंभीरता और महत्व को देखते हुए सक्रिय होते हैं लेकिन उस कार्य को पूरा करने के बाद चुपचाप बैठ जाते हैं। ऐसे लोग किसी के आग्रह करने पर प्रेरित होकर काम करते हैं लेकिन 'लग कर' काम करना इनके स्वभाव में नहीं होता। कई बार सक्रिय लोग दूसरों को काम न करता देखकर नाराजगी में अपनी सक्रियता कम कर देते हैं और अर्धसक्रिय हो जाते हैं।

तीसरी जमात है, असक्रिय लोगों की। यह धरती इन्हीं का बोझ उठाते हुए त्रस्त है। ये शारीरिक रूप से शिथिल लेकिन मानसिक रूप से प्रबल होते हैं। ये हर काम करना चाहते हैं, योग्य भी हैं लेकिन इनसे काम नहीं होता। बातें करने, बातें बनाने और दूसरे के किये कार्य पर मीनमेख निकालने में प्रवीण होते हैं। काम करने वाले की हंसी उड़ाना, ताने मारना और हतोत्साहित करना इनका प्रिय कार्य होता है क्योंकि इस उपाय के माध्यम से इनका काम न करना छुप जाता है। असक्रिय लोग अपनी असक्रियता को किसी संक्रामक रोग की तरह फैलाते हैं और अनेक सक्रिय लोग इनके प्रभाव में सहज ही आ जाते हैं। हमारे देश की आज़ादी के बाद की धीमी प्रगति में भ्रष्टाचार का जितना योगदान है, उतना ही इन आलसियों का भी है।

जो काम कर सकता है लेकिन नहीं करता, वह समाज पर बोझ नहीं तो और क्या है?

आम तौर पर सरकारी नौकरी मज़े के नौकरी मानी जाती है। नौकरी पक्की हो जाए तो काम करना या न करना- शासकीय सेवक की मर्जी से जुड़ा हुआ है। 'कंफर्म' होने के पहले और उसके बाद के काम करने की गुणवत्ता में पर्याप्त अंतर देखा जाता है। इससे यह निष्कर्ष भी निकाला जा सकता है कि काम करने का संबंध डर से है जिसमें नौकरी छिन जाने का डर सबसे बड़ा है। ऐसे अनेक उदाहरण देखने में आते हैं जहां ऐसे महानुभावों से काम लेने के लिए डांट-डपट, धमकी और अपशब्दों का सहारा लेना पड़ता है। यह विचारणीय है कि संगठन में इस तरह का माहौल क्या उचित है? क्यों लोग काम करने से विमुख हो जाते हैं, उनका उत्साह भंग हो जाता है ? क्या पढ़े-लिखे लोकतान्त्रिक समाज में 'चमकाइटिस' के अस्त्र का प्रहार न्यायोचित है? क्या संगठन में इस तरह का माहौल उचित है? क्यों लोग काम करने से विमुख हो जाते हैं, उनका उत्साह क्यों भंग हो जाता है?

दबाव के अधीन या डर के वशीभूत किए गए कार्य अपेक्षित परिणाम नहीं देते जबकि सरकारी, अर्धसरकारी या निजी संगठनों में कामगार को उत्साहित करने की जगह उनसे डरा-धमका कर कार्य लिया जाता है इसलिए काम की गुणवत्ता कमजोर होती है। यह विधा हमें अपने परिवार से उत्तराधिकार में मिली है जो हमारे  साथ चल रही है। आधुनिक युग सामने वाले को बढ़ावा देकर, उत्साहित कर और चुनौती देकर काम करवाने का है। दादागिरी के दिन गए लेकिन हम अभी भी आदिमयुगीन प्रबंधन शैली को गले लगाए घूम रहे हैं।

उत्साह भंग होने की मुख्य वजह है, उत्साह की अस्थिरता। किसी काम को अपना काम समझकर करेंगे तो आपका उत्साह बना रहेगा लेकिन जैसे ही काम बोझ बना, उसे करने में रुचि खुद-ब-खुद कम होने लगेगी और उत्साह भी कम हो जायेगा।

सद्गुरु जग्गी वासुदेव ने कहा है- 'अपने जीवन के हर पल आप जो भी करें, वह स्वेच्छा से करें, अनिच्छा से नहीं क्योंकि जिस पल अनिच्छा आती है, उस पल अगर कोई बहुत खूबसूरत चीज भी आपके साथ घटित हो रही होगी, तो वह भी आपको ऐसी लगेगी जैसे जिंदगी आपको परेशान कर रही है। अगर आप इच्छुक हैं तो बड़ी ही अच्छी बात है।'

किसी समूह में यदि लोग काम ठीक से नहीं कर रहे हैं, या काम करने से बचते हैं तो इसका एक ही कारण है- कार्य संस्कृति का विकसित न होना। प्रबंधन-गुरु शरू रांगड़ेकर ने कार्य संस्कृति का वर्गीकरण इस प्रकार किया है :

#आराम जीवन-मूल्य : आराम पसंद लोग प्रत्येक समूह में पाए जाते हैं। इनका जीवन-मंत्र है- 'आज करे सो कल कर, कल करे सो परसों; जल्दी जल्दी क्यों करता है, अभी जीना है बरसों।' ये लोग काम न करने या उसे टालने या किसी दूसरे पर काम थोपने के विशेषज्ञ होते हैं। लच्छेदार बातें करना, बातें बनाना और बहाना करना- इनका अदृश्य गुण होता है। ये लोग कार्यालय का काम भले न करें लेकिन 'साहब का काम' करने में विशेष दक्ष होते हैं। कई साहब तो इनकी प्रतिभा से इस कदर प्रभावित रहते हैं कि इनकी राय लेकर 'स्टाफ मेनेजमेंट' करते हैं ! ऐसे लोग सरकारी-गैर सरकारी कार्यालयों में, उद्योग-व्यापार में, खेत-खलिहान में, घर-परिवार में- अर्थात यत्र-तत्र-सर्वत्र मिल जाएंगे। ये अपनी निष्क्रियता को छुपाने के लिए सक्रिय होने का ढोंग करने, काम करने वाले व्यक्ति का उपहास करने और एक-दूसरे को लड़ाने-भिड़ाने की कला में प्रवीण होते हैं।

#अर्थ जीवन-मूल्य : इस श्रेणी के लोग अर्ध-सक्रिय मानसिकता के होते हैं जो अपनी सेवाएँ यथोचित मूल्य प्राप्त होने पर ही देते हैं। डाक्टर, वकील, सी॰ए॰, आर्किटेक्ट, कंसल्टेंट जैसे 'प्रोफेशनल्स' अपनी काबिलियत को निःशुल्क नहीं देते बल्कि मनचाही कीमत वसूल करते हैं। सरकारी-अर्ध सरकारी संस्थानों में इस स्वभाव के कर्मचारी अपने वेतन के अतिरिक्त वसूली करते हैं जिसे बोलचाल की भाषा में रिश्वत कहा जाता है।

#कार्य जीवन-मूल्य :  'काम ही पूजा है' के सिद्धान्त को मानने वाले लोग ही इस दुनिया को संचालित कर रहे हैं। इन्हें काम करने में मज़ा आता है और जब तक सौंपे गए काम को ये पूरा नहीं कर लेते- इन्हें चैन नहीं आता। सिर्फ अपना ही नहीं, अपने सहयोगियों का काम भी अपने सिर पर ले लेने से इन्हें कोई परेशानी नहीं होती। अतिरिक्त पैसा, प्रमोशन आदि प्रलोभनों का इनके काम पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। ये कार्यस्थल की ऐसी रक्तवाहिनी धमनियाँ हैं जो बिना शोर किए अपना कर्तव्य पूरा करती हैं।

यह रोचक तथ्य है कि आराम जीवन-मूल्य वाले महानुभावों का असर कार्य जीवन-मूल्य वालों पर तेजी से होता है लेकिन इसका उल्टा बहुत कम होता है। काम करने वाला मनुष्य भिड़कर काम करता है, हर समय खटते रहता है और अपने अधिकारी से भरपूर डांट भी खाता है। यह दुनिया का रिवाज है कि डांट उसे पड़ती है जो गलती करता है, गलती वह करता है जो काम करता है ! इसलिए काम करने वाले का उत्साह धीरे-धीरे कम होते जाता है और वह आराम जीवन-मूल्य को अपनाने लगता है, परिणाम स्वरूप पूरा कार्यस्थल 'आफिस-आफिस' बन जाता है।

'गुड गवर्नेंस' के लिए कार्यस्थल का कार्यनुकूल वातावरण बहुत मायने रखता है। आराम-जीवनमूल्य और अर्थ-जीवनमूल्य वाले लोगों को कार्य-जीवनमूल्य की भावना से जोड़ना ही प्रशासक, प्रबन्धक या गृहस्वामी का कार्य होता है। आरामपसंद लोगों को काम से लगाना चुनौतीपूर्ण और कठिन है लेकिन जो लोग स्वयं कर्तव्यनिष्ठ होते हैं, वे अपने आसपास के माहौल को इस तरह 'चार्ज' कर देते हैं कि काम न करने वाले को अपराधबोध होने लगता है, फलस्वरूप वह खुद में बदलाव लाता है और सक्रिय हो जाता है। परिश्रमी और ईमानदार प्रबन्धक सबको अपने ढंग से संचालित करने का माद्दा रखते हैं।


अधिकतर कार्यस्थलों में यथास्थिति बनाए रखने के प्रयास होते हैं जिसके फलस्वरूप कार्यशैली में परिवर्तन दिखाई नहीं पड़ता और स्थिति दिनों-दिन बिगड़ती जाती है। 'साहब' यदि साहब है तो वह चाहे जितना चीखे-चिल्लाए, कोई खास परिवर्तन नहीं होता। वह सामने से हटा और उसका असर घटा। 'चेम्बर' में अपनी आराम कुर्सी में बैठा अधिकारी अपने अधीनस्थों को प्रेरित करने में सफल नहीं हो सकता. उसे अपने अधीनस्थों को काम समझाने और काम लेने के लिए बाहर निकलकर उनके साथ भिड़ना होगा, तब बात बनेगी। कुशल नेतृत्वकर्ता संगठन में अपनी कर्मठता से स्थायी प्रभाव पैदा करते हैं। वे सामने हों, या न हों, उनका 'सिस्टम' काम करता है।

काम करने की रुचि कम होने का एक बड़ा कारण यह है कि रोज-रोज एक जैसा काम करते हुए ऊब होने लगती है। एक बार मुझे बंबई (उस समय मुंबई नहीं था) के कफ परेड पर स्थित वर्ल्ड ट्रेड सेंटर की 18वी मंजिल में प्रशिक्षण हेतु जाना था। साथ में मेरी पत्नी माधुरी भी थी। अंदर प्रवेश करते ही हमें सामने दो 'लिफ्ट' दिखी। एक लिफ्ट का दरवाजा खुला था जिसमें लोग घुस रहे थे, हम दोनों उधर लपके लेकिन 'ओवर लोड' की समस्या के कारण अंदर नहीं घुस पाए इसलिए दूसरी लिफ्ट की ओर पहुंचे। लिफ्टमेन लिफ्ट के बाहर एक स्टूल पर बैठा हुआ था, उसकी लिफ्ट का दरवाजा बंद था। मैंने उससे पूछा- 'लिफ्ट बंद है क्या?'
'चालू है।' उसने ठंडा जवाब दिया।
'ले चलो।'
'उस लिफ्ट में चले जाइए।'
'आप क्यों नहीं ले जा रहे हैं, आपकी तबीयत ठीक नहीं है या लिफ्ट की?'
'दोनों ठीक हैं, वो देखिए, लिफ्ट आ गई।' उसने हमें सुझाव दिया लेकिन मैंने उसकी बात अनसुनी कर दी और कहा- 'कोई बात नहीं, हम लोग थोड़ी देर बाद चले जाएंगे, आप ये बताओ कि आज आप सुस्त क्यों दिख रहे हैं?'
'सुबह से लेकर रात तक एक ही काम है साहब, ऊपर जाओ, नीचे आओ।'
'वही तो तुम्हारी ड्यूटी है।'
'ड्यूटी है लेकिन ऊब हो जाती है।'
'यह काम पसंद नहीं तो कोई दूसरा काम ढूँढना चाहिए।'
'दूसरी नौकरी कहाँ मिलेगी?'
'तो इस काम को मज़े से करना चाहिए।'
'आप केवल बात कर रहे हो साहब, आपके ऊपर पड़ेगा तो समझ में आएगा।'
'मैं जो काम करता हूँ, मुझे भी रोज-रोज वही करना पड़ता है।' मैंने उसे बताया। मेरी बातों से वह खिन्न हो रहा था लेकिन लिफ्ट खोलने के लिए तैयार नहीं हुआ। इतने में दूसरी लिफ्ट फिर वापस आ गई। माधुरी जी ने मुझसे कहा- 'चलो न, उस लिफ्ट से चलते है, देर हो रही है। तुम क्यों अपना सिर खफा रहे हो?' वह लिफ्टमेन अपनी स्टूल पर बैठा ही रहा, नहीं हिला तो नहीं हिला।

खैर, हम लोग सक्रिय लिफ्ट में प्रविष्ट हो गए लेकिन मेरे दिमाग में एक और घटना तैर गई। मेरे बिलासपुरिया मित्र भूपेन्द्र जोबनपुत्रा के विवाह में मैं बाराती बनकर कलकत्ता (उस समय कोलकाता नहीं था) गया था। कार्यक्रम का आयोजन भवानीपुर में लक्ष्मीनारायण मंदिर के विवाह भवन में था। उस समय सुबह का नौ बजा रहा होगा, मैं अन्य बरातियों के साथ समारोह स्थल में पहुंचा। वैवाहिक कार्यक्रम तीसरी मंजिल में था। ऊपर जाने के लिए एक लिफ्ट थी जिसमें एक पाँच-फुटिया लिफ्टमेन जिसने सफ़ेद रंग का 'यूनिफ़ार्म' पहना हुआ था, सफ़ेद टोपी पहनी थी, माथे में लाल तिलक लगा हुआ था, ने दोनों हाथ जोड़कर मुस्कुराते हुए हमें 'जय राम जी' कहा और ऊपर ले जाकर छोड़ा। सुबह का नास्ता हुआ, उसके बाद अनुष्ठान हुआ, फिर दिन का भोज हुआ, धीरे-धीरे शाम होने को आई। इस बीच मैं तीन बार उस लिफ्ट से ऊपर-नीचे हुआ, वही लिफ्टमेन, वही मुस्कुराहट, वही 'जय राम जी'। उनके माथे पर शिकन नहीं, थकान का कोई चिन्ह नहीं।

उनके काम की लगन ने मुझे समझाया कि काम कोई भी हो, छोटा नहीं होता और न ही उबाऊ। जो भी काम हाथ में आए उसे दिल लगा कर करो, खुश होकर करो। जो व्यक्ति स्वप्रेरित होता है वह काम को रुचिकर बनाने के नए-नए उपाय खोजता है और अपना कार्य करने में आनंद का अनुभव करता है। दूसरों को प्रेरित करने से पूर्व स्वयं को प्रेरित करना अति आवश्यक है अन्यथा आपके द्वारा प्रभावित करने के प्रयास निष्फल हो सकते हैं। परिश्रमी व्यक्ति ही दूसरों के लिए प्रेरणाश्रोत बन सकता है। काम करने का माहौल सबको काम से लगाता है, यही अभिप्रेरणा का मूलमंत्र है।

किसी का शरीर आलसी नहीं होता, शरीर में कार्य करने की अपार क्षमता होती है। दरअसल शरीर मन के निर्देश पर सक्रिय होता है। जिस व्यक्ति का अपने मन पर नियंत्रण है वही अपने तन को नियंत्रित कर सकता है। इसके लिए मन को स्थिर करना पड़ता है, मन को स्थिर करने के लिए मन को साधना पड़ता है, यह एक अभ्यास है जिसे सीखा जा सकता है और अपनाया जा सकता है। संसार में सुनियोजित परिश्रम और सम्पूर्ण ईमानदारी का कोई विकल्प नहीं है। जिसने यह सूत्र समझ लिया, समझ लीजिए, वह सार्थक जीवन जीने की राह पर है।

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Sunday, 13 January 2019

स्वयं प्रबंधन : खुद की खोज

स्वयं प्रबंधन : खुद की खोज 
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आम के पेड़ में यदि आम का फल उगे तो कैसा आश्चर्य?

हमारा दिमाग लगातार सक्रिय रहता है। जीवन में हो रही घटनाएँ अपने अनुभव के रूप में हमारे स्मृतिकोष में दर्ज़ होते रहती हैं। इन्हीं स्मृतियों के आधार पर मनुष्य के 'स्व' की रचना होती है। 'स्व' याने किसी व्यक्ति का सम्पूर्ण व्यक्तित्व। यह व्यक्तित्व उसकी सोच और समझ के आधार पर विकसित होते रहता है। हर नया अनुभव उसे कुछ-न-कुछ सिखाता है जो उसके मस्तिष्क में अंकित होते रहता है। जो धारणा आज उसे सही समझ में आती हैं लेकिन कालांतर में उसके विपरीत परिणाम आने पर गलत लगने लगती है। पुरानी धारणा थी कि जलने पर घाव में पानी नहीं डालना चाहिए लेकिन अब जलने पर घाव को शीतल जल में डुबाकर रखने की सलाह मिलती है। पुरानी धारणा के एकदम विपरीत! हमने इसे अपनाकर देखा, परिणाम देखे और मस्तिष्क में अंकित पुरानी सूचना को विलोपित कर दिया और नई सूचना अंकित कर ली। इस तरह हमारे दिमाग में काट-छांट और जोड़ना-घटाना चलते रहता है। यद्यपि सभी मनुष्यों के मस्तिष्क की बनावट एक जैसी है किन्तु सबका ज्ञानबोध अलग-अलग होता है। इसीलिए किसी एक घटना विशेष के कई अर्थ निकल जाते हैं। यह अंतर भिन्न दृष्टिकोणों की वज़ह से होता है।

मनुष्य का व्यक्तित्व तीन तलों में विभाजित रहता है :
1: जैसा वह स्वयं को समझता है॰
2: जैसा दूसरे उसे जानते हैं॰
3: जैसा वास्तव में वह है॰

जैसा वह स्वयं को समझता है:
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हम लगातार अपने बारे में अपनी धारणा बनाते रहते हैं। हमारे द्वारा लिए गए निर्णय, उनका क्रियान्वयन और उनसे प्राप्त परिणाम हमारे अनुभव भंडार को बढ़ाते हैं। उन परिणामों को कसौटी मानकर हम अपनी व्यवहार नीति में आवश्यक परिवर्तन करते रहते हैं, वही हमारी कार्यशैली बन जाती है। विभिन्न परिस्थितियों में अपनाई गई शैलियाँ हमारे व्यक्तित्व का अंग बन जाती हैं जैसे, यदि हमारा काम मुस्कुराने से बन जाता है तो खुशमिजाज़ी हमारा स्वभाव बन जाता है और लेकिन यदि ज़िद करने या रोने से हमारा काम बनता है तो हम स्वभाव से जिद्दी या चिड़चिड़े बन जाते हैं। अपने स्वभाव को मनुष्य अच्छी तरह से समझता और जानता है लेकिन कभी तो स्वीकार कर लेता है तो कभी इंकार कर देता है। आलसी व्यक्ति अपने आलस्य को स्वीकार नहीं करता लेकिन काम न करने का बहाना बताकर मन-ही-मन खुश होता है।
हम सब ऐसा समझते हैं कि हम सही हैं लेकिन लोग हमें नहीं समझते। हर इंसान खुद को सीधा या भला मानता है और उसको अपनी दुष्टता और कमियाँ समझ में नहीं आती। वह अपने बारे में अक्सर भ्रामक धारणाएँ बना कर जीता है परिणामस्वरूप वह स्वयं को ठीक से नहीं जान पाता। 'मैं कैसा हूँ'- इस प्रश्न का उत्तर सदा उलझा हुआ रहता है। साधारणतया हम वही करते हैं जिसे हम उचित समझते हैं। समाज की उचित-अनुचित की सूची अलग होती है और मनुष्य की अलग। मनुष्य का उचित-अनुचित उसका विवेक होता है। जिन गतिविधियों को समाज गलत मानता है उसे गलत सिद्ध करने के अनेक मजबूत तर्क अवमानना करने वाले के पास होते हैं। अवैध लेन-देन करने वाले सहजता से तर्क देते हैं- 'क्या करें? सिस्टम से बंधे हैं।'
हमारे विवेक के द्वारा निर्धारित 'उचित' कार्य हमें वे संकेत देते हैं जिनसे हम अपने बारे में राय कायम करते हैं।

जैसा दूसरे उसे जानते हैं :
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हमारी सभी गतिविधियों पर लोगों की नज़र रहती है। दूसरे लोग अपनी सोच के आधार पर हमारे विषय में राय बनाते हैं जिसे 'पब्लिक इमेज़' कहा जाता है। लोग हमारी दिखने वाली गतिविधियों के आधार पर हमारे बारे में राय बनाते हैं जो वास्तविकता से अलग होती है क्योंकि मनुष्य उन बातों को छुपा कर रखता है जो समाज में निंदनीय होती है। कई बार जिस व्यक्ति को लोग 'अच्छा इन्सान' मानते हैं यदि उसकी असलियत उनके सामने उजागर हो जाए तो वे चकित रह जाएंगे। इसी प्रकार अच्छे व्यक्ति को संदेह की दृष्टि से देखा जाता है या उसे गलत समझ लिया जाता है परिणामस्वरूप अपनी तमाम अच्छाइयों के बावजूद एक भला व्यक्ति खलनायक घोषित हो जाता है। हमारे सामाजिक ताने-बाने में बातचीत की मृदुता और सादगी का बहुत सम्मान है, कई लोग इन्हें अपना बाहरी आवरण बनाकर अपनी मनमोहक छबि बना लेते हैं लेकिन ऐसी छबि टिकाऊ नहीं होती।
एक सच्ची घटना बताता हूँ, पुरानी बात है। मेरे एक मित्र क्रांतिकुमार ओझा जिन्हें कुंडली का ज्ञान है, मैंने अपनी जन्म कुंडली दिखाई और उनसे अतीत और भविष्य के बारे में कुछ बताने का निवेदन किया। कुंडली का अध्ययन करने के बाद उन्होंने मुझसे कहा- 'मैं तुम्हें कई सालों से जानता हूँ, तुम्हें एक सीधे-सादे इन्सान के रूप में जानता हूँ। आम लोगों में भी तुम्हारी 'इमेज' ऐसी ही है लेकिन मैं तुमसे एक बात कहना चाहता हूँ, नाराज मत होना।'
'जी, निःसंकोच बताइए।'
'तुम्हारी कुंडली में स्पष्ट संकेत हैं कि तुम बदमाश टाइप के आदमी हो।'
'ओझा जी, यह बात अभी तक केवल मुझे मालूम थी, अब आपको भी मालूम हो गई है, किसी और को मत बताना।' मैंने उनसे हाथ जोड़कर निवेदन किया।
शायर निदा फ़ाजली ने लिखा है:
'हर आदमी में होते हैं दस बीस आदमी
जिसको भी देखना हो कई बार देखना॰'

जैसा वास्तव में वह है :
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दूसरे को जानना जितना कठिन है, उतना ही खुद को जानना भी है। बात-व्यवहार की ऊपरी सतह को देखकर किसी की गहराई का अनुमान नहीं लगाया जा सकता। समुद्र में तैरती बर्फ की चट्टान को देखने से जो दिखाई पड़ता है, वह विशाल चट्टान का छोटा सा हिस्सा है। यदि ऊपरी हिस्से को ही उसका वास्तविक आकार समझ लिया जाए तो बड़ी भूल हो जाएगी। ऐसी ही भूल मनुष्य के व्यक्तित्व के साथ होती है। कोई भी इन्सान किसी दूसरे को शत-प्रतिशत नहीं जान सकता लेकिन आश्चर्य यह है कि हम भी स्वयं को पूरी तरह नहीं जानते! हमें भ्रम रहता है कि हम अपने बारे में सब जानते हैं लेकिन हम अपनी सभी शक्तियों और कमजोरियों से अपरिचित रहते हैं क्योंकि हमें अपने भीतर झांक कर देखने का अभ्यास नहीं है। स्वयं की अंतर्यात्रा बिरले ही करते हैं।

प्रत्येक मनुष्य शक्तियों और कमजोरियों का मिश्रण होता है। संसार में सभी एक जैसे नहीं होते क्योंकि प्रकृति ने सबको अलग-अलग बनाया है। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान इसे आनुवांशिक प्रभाव मानता है। कुछ लोग नैसर्गिक रूप से उत्कृष्ट होते हैं लेकिन ऐसा नहीं है कि जो उत्कृष्ट नहीं हैं वे निकृष्ट हैं। यह सही है कि लता मंगेशकर नैसर्गिक गायिका हैं, उन जैसी मधुर और सधी हुई आवाज़ में गा सकना सबके वश की बात नहीं है, लेकिन हम कुमार गंधर्व को भी जानते हैं जो फेफड़े के रोग से अनेक वर्षों तक जूझने के बावजूद केवल 'एक फेफड़े वाले' उत्कृष्ट शास्त्रीय गायक बने। बिस्मिल्ला खाँ एक सामान्य शहनाईवादक थे लेकिन अपनी संगीत साधना से उन्होंने शहनाईवादन को शास्त्रीय स्वरूप दिया और स्वयं शिखर पर पहुंचे। यह सही है कि सब में एक जैसी योग्यता नहीं होती लेकिन अगर कोई ज़िद ठान लें तो खुद में अभूतपूर्व सुधार लाकर नए प्रतिमान स्थापित कर सकता है। निरंतर प्रयास का कोई दूसरा विकल्प नहीं होता।

किसी कार्य विशेष को सम्पन्न करने की क्षमता को योग्यता कहा जाता है। योग्यता के मूल्यांकन से यह पता चलता है कि कोई व्यक्ति क्या कर सकता है और क्या नहीं। मानसिक गतिविधियों को संचालित करने के लिए बौद्धिक योग्यता चाहिए जबकि शरीर के माध्यम से किए जाने वाले कार्यों के लिए शारीरिक योग्यता आवश्यक होती है। इस बात को इस तरह समझने की कोशिश करते हैं:

बौद्धिक योग्यता :
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* जो कुछ सुना या पढ़ा जाए उसके शब्दों के गूढ़ार्थ को समझने की क्षमता
* समस्या और उसके समाधान को तार्किक क्रमबद्धता से जानने की क्षमता
* तर्क का उपयोग तथा तर्क-वितर्क के परिणामों का मूल्यांकन करने की क्षमता
* स्मरण रखने की क्षमता
* गणितीय कार्य को तेजी और सटीकता से कर सकने की क्षमता
* उचित-अनुचित का भेद कर सकने की क्षमता
* समानताओं और असमानताओं को सटीक पहचानने की क्षमता
* किसी परिवर्तन की दशा में परिवर्तन के बाद कैसा होगा, यह कल्पना कर सकने की क्षमता

शारीरिक योग्यता :
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* अपनी पेशियों की शक्ति से लगातार और बार-बार परिश्रम कर सकने की क्षमता
* किसी वस्तु को धकेलने या खींचने की क्षमता
* शरीर की पेशियों में लोच बनाकर रखने की क्षमता
* शरीर के उपयोग के समय सभी अंगों में तालमेल रख सकने की क्षमता
* शरीर को संतुलित रखने की क्षमता
* लंबे समय तक अधिकाधिक कार्य कर सकने की क्षमता

बौद्धिक और शारीरिक योग्यता के संतुलित उपयोग से मनुष्य के व्यक्तित्व का निर्माण होता है। असंतुलन से व्यक्तित्व में दोष आने लगते हैं जैसे वुद्धि विकास पर अधिक ध्यान देने वाले लोग शारीरिक रूप से निष्क्रिय हो जाते हैं जिसका परिणाम होता है: कमजोरी, बीमारी, चिचिड़ाहट और उदासीनता। वहीं पर शारीरिक क्षमता बढ़ाने वालों का पढ़ाई में मन नहीं लगता और वे हर समय अपनी शक्ति के प्रदर्शन और उसके विसर्जन के मौके तलाशते रहते हैं। ये दोनों स्थितियाँ घातक हैं। दोनों क्षमताओं में संतुलित विकास करना, दोनों के लिए पर्याप्त समय निकालना और किसी भी अति से बचना श्रेयस्कर होगा।

यदि तन स्वस्थ नहीं है तो मन उदास रहेगा और यदि मन प्रसन्न नहीं है तो तन कैसे साथ देगा?

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स्वयं प्रबंधन : कैसे मना करूं ?

स्वयं प्रबंधन  : कैसे मना करूं?
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कई बार आपको अखरता होगा कि क्यों मना नहीं किया? 'हाँ' करके फंस गए। आपने 'हाँ' किया या '', फिर उस ज़िम्मेदारी से बच नहीं सकते। यह आपका अपना निर्णय होता है, ये बात दूसरी है कि निर्णय लेते समय आप पर कौन सा दबाव काम कर रहा था। वैसे तो निर्णय सोच-समझकर लिए जाते हैं लेकिन कई बार भावुकता से प्रभावित हो जाते हैंहम मना करने में संकोच कर जाते हैं और बाद में पछताते हैं। अधिकतर अनुभव बताते हैं कि मना नहीं कर पाना उनके लिए अंततः कितना दुखदायी सिद्ध हुआ! इसीलिए हमारे मन में धीरे-धीरे एक तैयारी होने लगती है कि यदि ऐसे अवसर आएँ तो क्या करना? कितना अच्छा हो कि मना किया जा सके और सामने वाले को बुरा भी लगे?

कड़ाके की ठंड में कोई आपसे आइसक्रीम खाने का अनुरोध करे तो हमारे सामने दो विकल्प होते है, उसकी बात मान जाएँ या मना कर दें। यदि बात टालना संभव हो, उसके नाराज़ हो जाने का डर हो तो मुस्कुराते हुए आइसक्रीम खा लीजिए और उसका दुष्परिणाम, जुकाम या गले का दर्द मोल ले लीजिए या फिर मना करके स्वयं को सुरक्षित कर लीजिए, भले वह नाराज़ हो जाए। अक्सर ऐसा होता है कि संकोच में 'हाँ' हो जाता है और बाद में पछतावा होता है कि क्यों 'हाँ' किया? जबकि होशियारी इसमें है कि यदि आपको मना करना है तो मना कर दें और वह नाराज़ भी हो।

आप सोच रहे होंगे कि मना करना इतना आसान है क्या? यदि कह पाते तो क्यों कह देते? आप सही सोच रहे है। मना करने से सामने वाले को दिली चोट पहुँचती है। उसे लगता है कि उसकी बात काट दी गई। यह सच है कि जिसने आपसे कोई उम्मीद की है वह आपसे 'हाँ' सुनना चाहता है, यदि उसे पहले से मालूम होता कि मना होने वाली है तो कभी कहता। उसकी जगह खुद को रखकर देखिए तो पूरी मनस्थिति आपको समझ में जाएगी। ज़रा सोचिए, उसकी जगह आप होते और मना हो जाता तो आपको कैसा लगता?

मैं जब आर्थिक दुर्दशा के दौर से गुज़र रहा था तो मेरा ऐसी स्थितियों से मेरा कई बार सामना हुआ। अपने एक पुराने सामर्थ्यवान मित्र से मैंने पाँच हजार मांगे तो वह अपने आर्थिक संकट को इस कदर रूआँसा होकर बताने लगा कि मैंने उससे पूछा- 'अपने लिए तो मांगने निकला ही हूँ, तुम्हारे लिए भी मांग लूँ क्या?'


कोई भी व्यक्ति आपसे कुछ मांगता है तो आशा लेकर आपके पास आता है लेकिन आपकी नकारात्मक प्रतिक्रिया उसे आहत करती है जिसे सामने वाला बहुत गंभीरता से लेता है और अपमानित महसूस करता है। समस्याओं से कौन अछूता रहता है? संकट किस पर नहीं आते? ऐसी कठिन परिस्थितियों पर अपने करीबी, परिचित या रिश्तेदार याद आते हैं। यदि मना हो गया तो वह व्यक्ति अपने सम्बन्धों पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर हो जाता है और सोचने लगता है- 'ये कैसा संबंध?'

मना करना हर व्यक्ति का विशेषाधिकार है। अपने हितों और धन-संपत्ति को सुरक्षित रखना बुद्धिमानी है और इसके लिए बहुत सफाई देने की ज़रूरत नहीं होती। ज़रूरी यह होता है कि आपके मना करने के तरीके में माधुर्य हो। समझदारी से किया गया इंकार इस बात को दर्शाता है कि आप दूसरों की ज़रूरत और स्वयं के प्रति संवेदना का भाव रखते हैं। कई ऐसे लोग होते हैं जिन्हें मना करना मुश्किल होता है; जैसे पति या पत्नी, बच्चे, रिश्तेदार, मित्र-उनकी बीबियाँ, पड़ोसी, अफसर, सह-व्यवसायी, धार्मिक-सामाजिक कार्यकर्ता। उनकी ज़रूरत को समझने की ज़िम्मेदारी वाली चिड़िया आपके पाले में होती है, देखना यह होता है वापसी 'शॉट' आप कैसा भेजते हैं?
ऐसे निर्णय लेने से बचिए जो आपको बाद में दुख देने वाले हैं। किसी नाज़ुक मौके पर इंकार करने का निर्णय आपको किसी भावी हानि से बचा सकता है और आपके व्यक्तित्व तथा कृतित्व में निखार ला सकता है। इससे आत्मशक्ति बढ़ती है, आत्मविश्वास मज़बूत होता है जो आपकी 'सेल्फ इमेज़' को बढ़ाने में सहायक होता है।
मना करने में हड़बड़ी करें, थोड़ा समय लेना अच्छी तरकीब है। कुछ अच्छे वाक्य हैं, इनका उपयोग कीजिए जैसे, 'यह तो शानदार पेशकश है लेकिन इस समय मैं इसका लाभ उठा पाने की स्थिति में नहीं हूँ' या, 'यह अच्छा विचार है लेकिन मुझे लगता है कि इस समय इसे टालना होगा।' आप इस प्रकार अपने इंकार को एक सकारात्मक मोड़ दे सकते हैं और दूसरे की भावना को ठेस पहुँचाने से बच सकते हैं। असावधानी से किए गए इंकार से अप्रिय स्थितियों बन जाती हैं। ऐसे मौके कम आते हैं जब तुरंत 'हाँ' या '' में जवाब देना होता है। यूं जवाब दीजिए, 'मुझे इस बारे में सोचने का समय दीजिए' या, 'मुझे हाँ कहना अच्छा लगेगा लेकिन मैं तुरंत ऐसा नहीं कह पाऊंगा' या, 'मुझे थोड़ा समझने का समय दीजिए ताकि मैं यह तय कर सकूँ कि मैं कुछ कर सकता हूँ या नहीं।' इस तरीके से यह संदेश जाता है कि आप उसकी बात को गंभीरता से ले रहे हैं और उस पर विचार भी कर रहे हैं।
बातचीत के दौरान हमारे समक्ष यह चुनौती रहती है की कैसे सामने वाले को अपनी बोतल में उतारा जाए? मान लीजिए, आपकी योजना सुविचारित है और आप स्वयं में स्पष्ट हैं फिर भी कोई निश्चित 'माइंड सेट' बनाकर चलें क्योंकि आपसे मिलने वाला हर व्यक्ति अपने किस्म का अनोखा है, सबको एक ही लाठी से नहीं हाँका जा सकता। यदि आप दूसरे को अपनी पटरी पर लाना चाहते हैं तो आक्रामक बनें, Handle with care को सदैव ध्यान में रखें। किसी भी बातचीत को सकारात्मक मोड़ देने के लिए शब्दों का चुनाव महत्वपूर्ण होता है। सामने वाले को अपनी बात जबरन मनवाने का प्रयास घातक सिद्ध हो सकता है इसलिए उसके विचारों को बदलने की कोशिश करें बल्कि अपनी विचारधारा को उसके दिमाग में धीरे-धीरे जगह बनाने दें। बेंजामिन फ्रेंकलिन को उनके मित्र ने सुझाया था- 'मेरे दोस्त, कभी भी खुद को होशियार सिद्ध करने की कोशिश मत करना, ये मनुष्य की महानतम मूर्खता होती है। बेहतर है तुम अपने विचार और व्यवहार से सामने वाले को प्रभावित करो, ऐसे अवसर आने दो जब वह तुमको बुद्धिमान मान ले।'

ध्यान रखें, किसी को दुखी करें। प्रशंसा और मधुर संभाषण से तनाव कम होता है, कठिन स्थितियाँ सामान्य हो जाती हैं और आपसी समझदारी में वृद्धि होती है। यदि आपकी बात में दम है तो सहमति के बिन्दु अपने-आप उभरने लगेंगे। यह ज़रूरी नहीं है कि अपनी बात किसी भी तरह मनवाई जाए लेकिन यह ज़रूरी है कि अपने व्यवहार और बातों से किसी को चोट पहुंचे। जब आप किसी पर अपनी बात मानने का दबाव डालते हैं तो वह आपके विरोध में चला जाता है, तब आपके प्रयासों का क्या हश्र होगा?
एक व्यक्ति को किसी ने बताया कि पालतू कुत्ते को 'कॉड लीवर आयल' देना लाभदायक होता है इसलिए उसने अपने डाबरमेन कुत्ते को पिलाने का निर्णय लिया। उसने अपने कुत्ते का चेहरा अपने दोनों घुटनों के बीच फंसाया, ताकत लगाकर उसका जबड़ा खोला और जबरन शीशी में भरा हुआ तेल उसके मुंह घुसेड़ दिया। कुत्ते ने विरोध किया, भागने की कोशिश की और अचानक उसकी पकड़ से छूट कर दूर खड़ा हो गया। मालिक के हाथ से तेल की शीशी फिसल गई और तेल पूरे फर्श पर बिखर गया। कुत्ते के मालिक के आश्चर्य का ठिकाना रहा जब उसने देखा कि कुत्ते ने फर्श पर बिखरा तेल खुशी-खुशी चाट लिया और शीशी को भी चाटने लगा, तब उसे समझ में आया कि उसका कुत्ता तेल पीने का विरोध नहीं कर रहा था बल्कि वह तेल पिलाए जाने के तरीके से नाराज़ था।
बात सिर्फ पैसे के लेन-देन की नहीं है, अनेक संगठनों और प्रकल्पों से जुड़ने के प्रस्ताव भी आते रहते है। इसके लिए आपकी कार्यशक्ति, समय और धन की आवश्यकता होती है।
एक निहायत खूबसूरत और मजबूत इरादों वाली महिला किसी संस्था के लिए चन्दा उगाहने के लिए मेरे पास आई और मुझ पर सीधा हमला किया- 'आपके नाम से 1000/- की रसीद काट रही हूँ।' उनका लहजा आदेशात्मक लेकिन अपनेपन से सराबोर था। उनसे मेरे पारिवारिक संबंध थे, बात टालना मुश्किल था लेकिन मैं अपने एक हज़ार रुपयों की बलि देने को तैयार था। इस बीच उन्होंने रसीद बनाने का काम जारी रखा और मेरा दिमाग संकट से उबरने के उपाय खोजने लगा। मैंने उनसे कहा- 'मैं आपको सहयोग करना चाहता हूँ क्योंकि आपने मुझे इस योग्य समझा लेकिन दूँगा अपनी खुशी से।'
'ठीक है, खुशी से दे दीजिए।' वे बोली। मैंने पर्स से सौ का एक नोट निकाला और उनको दे दिया। वे चौंकी- 'ये क्या?'
'यही मेरी खुशी की सीमा है, इसके आगे दुख शुरू हो जाता है।'
'क्या मतलब?'
'मेरी पत्नी ने मेरी एक सौ रुपए डोनेशन देने की लिमिट बनाई है, आप तो उन्हें जानती हो। मैं इतना ही दे सकता हूँ, इससे अधिक के लिए आपको उनसे जाकर मिलना होगा।'
'सच में?'
'जी।' मैंने लाचारी वाला भाव व्यक्त किया। उन्होंने मुझे दया की दृष्टि से देखा और वे केवल सौ रुपए में मान गई, इस प्रकार मेरे नौ सौ रुपए बच गए।
इस घटना से उपजा ज्ञान:
(1) किसी अनायास आक्रमण से भयभीत हों।
(2) किसी की सुंदरता और व्यक्तित्व को खुद पर हावी होने दें।
(3) मन को शांत रखें और संकट से बचने के उपाय खोजें।
(4) सामने वाले के साथ सज्जनता से पेश आएँ और उसकी बात को गौर से सुनें और समझने का अभिनय करें।
(5) अपनी प्रतिष्ठा के 'ग्राफ' को नीचे रखने से बचत में वृद्धि होती है।
(6) अपनी आर्थिक सुरक्षा के लिए झूठ का सहारा लेने में कोई हर्ज़ नहीं है।
यदि कोई संगठन आपकी आवश्यकताओं की पूर्ति करता है, आपकी रुचि के अनुरूप है तो उससे अवश्य जुड़ जाइए अन्यथा चतुराई के साथ इस तरह मना कीजिए- 'बहुत खुशी है कि आपने मुझे इस योग्य समझा कि मैं आपके साथ जुड़ सकूँ। आपके संगठन के बारे में मैंने बहुत कुछ सुन रखा है, आप लोग अच्छा काम कर रहे हैं, बधाई देने लायक लेकिन मेरी व्यस्तता आपके प्रस्ताव को स्वीकार करने की इजाज़त नहीं दे रही है अन्यथा मैं साथ अवश्य आता। भविष्य में यदि मुझे सुविधा हुई तो मैं आपको स्वयं खबर करके बुला लूँगा।'
कभी-कभी ऐसे व्यक्ति को इंकार करना मुश्किल होता है जो अपनी परेशानी का चतुराई से इशारा करता है। जैसे, एक मित्र ने आपको फोन किया- 'एक काम के सिलसिले में तुम्हारे शहर आना हो रहा है लेकिन यार, तुम्हारे यहाँ होटल बहुत मंहगे हैं!'
आपको यह समझने में देर नहीं लगनी चाहिए कि उसकी मंशा आपके घर में रुकने की है लेकिन उसने साफ-साफ कह कर आपका मन टटोलने की कोशिश की है। वास्तव में, वह चाहता है कि घर में रुकने का प्रस्ताव आप स्वयं रख दें। यदि आप सहमत है तो कोई समस्या नहीं लेकिन यदि असहमत हैं तो आप इस तरह जवाब दे सकते हैं- 'हाँ यार, क्या करोगे? होटल बहुत मंहगे होते जा रहे हैं इसलिए तुम्हें इस परेशानी से जूझना पड़ रहा है।' इतना कहने के बाद चुप हो जाइए और बात को समाप्त कर दीजिए।
आप यह भी कह सकते हैं- 'तुम्हारे लिए ये कौन सी बड़ी मुश्किल है? तुम तो समस्याओं के हल निकालने में उस्ताद हो, यार।'
एक और तरीका है, 'मेरे घर में रुक सकते थे तुम लेकिन उन दिनों हम लोग शहर से बाहर जा रहे हैं।'
किशोर और युवावस्था में जो पुरुष सिगरेट, तंबाखू, शराब और नशीली दवाओं के दोस्ताना प्रस्ताव को नहीं टाल पाते, वे इनकी आदतों के शिकार हो जाते हैं और अपने मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य के साथ अन्याय कर बैठते हैं। इस स्थितियों में महत्वपूर्ण यह होता है कि आपका खुद पर कितना नियंत्रण है! सोचिए, यदि आपका स्वयं पर नियंत्रण नहीं है तो दूसरों को कैसे नियंत्रित करेंगे? मजबूती के साथ मना कीजिए, आपकी मजबूती का असर पड़ेगा। हो सकता कुछ दोस्त हाथ से निकल जाएँ, चिंता मत करिए, बहुत मिलेंगे। 'सामने वाला क्या सोचेगा' इस प्रश्न को अपने ऊपर हावी मत होने दें। अपने से जुड़े फैसले दूसरों पर क्यों छोड़ना? रिश्तेदारी और यारी सलाह-मशविरे के लिए ठीक हैं लेकिन गंभीर निर्णय अपनी बुद्धि की मदद से लें। सबकी सुनें, उस पर मनन करें और अपने मन की करें। याद रखिए, आपका अन्तर्मन आपका सबसे अच्छा मित्र और मार्गदर्शक है, उसकी आवाज़ को अनसुना करना बुद्धिमानी नहीं है। सोचने-समझने को भरपूर समय दीजिए लेकिन उसकी रज़ाई ओढ़कर सोने का प्रयत्न करें। समय पर लिया गया निर्णय सुफल देता है।
साफ-साफ बात करने वाले लोग किसी को भी तड़ से इंकार करने का साहस रखते हैं। उनका तर्क है कि तुरंत इंकार कर देने से गलतफहमियाँ नहीं बढ़ती और किसी का समय नष्ट नहीं होता। बात सही है लेकिन समस्या यह है कि मना करने का तरीका क्या हो? आप इंकार कर दें फिर भी आपके संबंध यथावत बने रहें- यही जानने-समझने की बात है। साफ इंकार करने की जगह आप उसे यह बताएं कि उसकी बात मानने में क्या अड़चन है? अपनी असुविधा को सहृदयतापूर्वक समझाएँ, उसे बुरा नहीं लगेगा। विश्वप्रसिद्ध अभिनेता पाल न्यूमेन एक रेस्तरां में अपने मित्र के साथ खाना खा रहे थे, उसी समय उनके एक प्रशंसक ने उनका 'ऑटोग्राफ' मांगा। उन्होंने दृढ़ता से मुस्कुराते हुए कहा- 'Sorry gentleman, during dinner I don't enjoy it.' मना करने के ये तरीके आपको मजबूती देते हैं और सुखद होते हैं। जवाब देने के आपके लहज़े में रूखापन नहीं, सदाशयता झलकनी चाहिए। आपकी 'बाडी लेंगवेज़' सरोकारी हो लेकिन विचार एकदम दृढ़।
केवल हमारी-आपकी व्यक्तिगत समस्या नहीं है यह, व्यापार और सेवाओं की दुनिया में भी यह कठिनाई महसूस होती है। अब जब बैंकिंग का व्यवसाय नया रूप ले रहा है तब बैंक अधिकारियों की भूमिका अधिक चुनौतीपूर्ण हो गई है। कर्ज़ देना ज़रूरी है और उसे डूबने से बचाना भी। इसलिए वे शुरू से ही अपनी सीमाओं को ध्यान में रखते हुए अपने कदम आगे बढ़ाते हैं और उसी परिप्रेक्ष्य में निर्णय लेते हैं। उनका संकोच करना, खुद को मौत के कुएं में ढकेलना जैसा सिद्ध हो सकता है। मार्केटिंग सेक्टर में बिक्री बढ़ाने का दबाव और बिके माल की नियमित वसूली का संकट बढ़ते जा रहा है। बिक्री और वसूली में तालमेल बिठाना बहुत कठिन होता है। ऐसे समय में स्पष्ट दृष्टिकोण और सतर्कतापूर्ण रुख अपनाना सही होगा। 'किसे इंकार करना', 'कब इंकार करना', 'कितना इंकार करना' और 'कैसे इंकार करना', ये सब आपकी सुविचारित रणनीति के अनुसार होना चाहिए। हेनरी फोर्ड ने कहा था- 'सफलता का रहस्य दूसरों के दृष्टिकोण को समझने और साथ ही साथ अपने दृष्टिकोण को भी समाहित करने में है।'
यदि मना करना अनिवार्य हो तो शालीनता से मना करने के कुछ अनुभूत उपाय हैं, जैसे :
(1) वार्तालाप के समय आपके चेहरे पर उत्सुकता, सौम्यता के साथ शांत मुस्कान होनी चाहिए। शरीर की भाषा सहज हो।
(2) समस्याग्रस्त व्यक्ति की मनोभावना का आदर करें, उसकी बात को सुनकर समझने की कोशिश करें। ऐसा दर्शाएँ कि आपके पास समय की कमी है, ऐसे समय में घड़ी देखना खतरनाक सिद्ध होगा।
(3) सामने वाले की बातें सुनते समय सकारात्मक ढंग से सिर हिलाएँ, आँखों से आँखें मिलाकर उसकी बातें सुनें और ईमानदारी से विचार करें कि मदद का कोई उपाय आपके पास है क्या?
(4) उसकी समस्या पर गौर करें, उसके दृष्टिकोण को समझने की कोशिश करें। बातचीत के दौरान उसके प्रयासों की प्रशंसा करें और उसकी योजनाओं के प्रति सहानुभूतिपूर्ण रवैया प्रदर्शित करें। यदि कोई गलती नज़र आती हो तो बहुत सावधानी से उस ओर इशारा करें ताकि अपनी गलती वह स्वयं समझ सके।
(5) उसे मना करने के लिए तर्क-वितर्क का सहारा लें। आप तर्क जीत सकते हैं लेकिन मनुष्य हार जाएंगे। ऐसे मौके पर आपकी शालीनता और व्यवहारकुशलता की परीक्षा होती है।
(6) अपनी बातों से उसे समझाने की कोशिश करें, वस्तुपरक बातें करें, कम बोलें क्योंकि उल्टे-सीधे बहाने सबको समझ आते हैं।
(7) इंकार करने में शर्मिंदगी महसूस करें, इंकार करना कोई अपराध नहीं है।
सामान्यतया जिसकी 'हाँ' करने की आदत होती है वह हाँ करता है और जिसकी '' करने की आदत होती है उससे कोई कुछ कहता ही नहीं है। इसका एक अर्थ यह भी है कि सबकी जरूरतों को समझने वाला सरल स्वभाव वाला व्यक्ति सबकी जरूरतों पर ध्यान देने वाला व्यक्ति बन जाता है और उसे परिवार में 'अच्छा व्यक्ति' घोषित कर दिया जाता है ताकि वह आजीवन अच्छा बना रहे और सबकी ज़रूरतें पूरी करता रहे। इस प्रकार जो व्यक्ति मना नहीं करता, उसका तब तक शोषण होते रहता है, जब तक वह मना करना नहीं सीखता। ऐसे सरल व्यक्तियों को धीरु भाई अंबानी की बात याद रखनी चाहिए- 'पहले स्वयं को समर्थ बनाओ, फिर दूसरे की मदद की सोचो।'
इंकार करने का यह मसला केवल बाहरी दुनिया के साथ नहीं है, घर-परिवार में भी रहता है। परिवार में एक-दूसरे का साथ देना सहज प्रक्रिया है। जहां तक मुझे समझ में आया, भारतीय परिवेश में प्रत्येक व्यक्ति इस ढंग से प्रशिक्षित किया जाता है ताकि परिवार की जरूरतों के लिए वह मना करने के पहले सौ बार सोचे लेकिन अंत में 'हाँ' कहे। 'सर्व सुखाय' की भावना को विकसित करने का यह ऐसा अभूतपूर्व प्रयोग है जिसे पूरा विश्व अपना रहा है। प्रश्न यह है कि अपने परिवार में कितना 'हाँ' करना और कब '' करना?
हम सब इस प्रकार की स्थितियों से दो-चार होते रहते हैं। तनिक सावधानी और होशियारी के साथ इन उपायों का उपयोग कीजिए, आप बिना नाराज़ किए लोगों को बड़ी सरलता से इंकार कर सकेंगे। वैसे, हर इंसान को मददगार बनना चाहिए लेकिन मदद करने की भी सीमा होती है, उसका ध्यान रखते हुए निर्णय लिया जाना चाहिए। किसी को मना करना भी स्वप्रबंधन का अंग है। प्रयत्न करके आप इस कला में माहिर बन सकते हैं।
निष्कर्ष यह है कि सबसे पहले किसी भी व्यक्ति को इंकार करने के पूर्व यह निश्चित करें कि आप सामने वाले व्यक्ति और उसकी समस्या को समझने की दिली कोशिश कर रहे हैं। दूध का जला छाछ भी फूंककर पीता है, देखिए, शायद इस बार पीने लायक हो। इसके लिए ज़रूरी है कि आप नकारात्मक भावनाओं पर नियंत्रण रखें। आपके आसपास के लोग आपसे समझदारी की उम्मीद करते हैं और आपकी समझदारी आपको परिपक्व व्यक्ति बनाती है। यह जीवन का बड़ा पुरस्कार होगा कि लोग आपको एक मददगार इंसान के रूप में जानें या याद करें इसलिए आपका सकारात्मक व्यवहार ही सही निर्णय लेने में सहायक होगा। ज़रूरत इस बात की है कि आप अपनी सोच में संगीत की तरह संतुलन स्थापित करने की कोशिश करें। आप तो जानते हैं कि संतुलन बिगड़ने से संगीत बेसुरा हो जाता है।
जितना इंकार करना ज़रूरी है, उतना ही किसी की सहायता करना भी। निश्चयतः किसी का बोझ ढोना समझदारी नहीं है पर क्या स्वयं समाज पर बोझ बन जाना उचित है? यदि 'हाँ' और '' में संतुलन साधकर व्यवहार करते हैं तो आप निश्चयतः सुखी और संतुष्ट व्यक्ति के रूप जीवन का आनंद ले सकेंगे।


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