कई बार आपको अखरता होगा कि क्यों मना नहीं किया? 'हाँ' करके फंस गए। आपने 'हाँ' किया या 'न', फिर उस ज़िम्मेदारी से बच नहीं सकते। यह आपका अपना निर्णय होता है, ये बात दूसरी है कि निर्णय लेते समय आप पर कौन सा दबाव काम कर रहा था। वैसे तो निर्णय सोच-समझकर लिए जाते हैं लेकिन कई बार भावुकता से प्रभावित हो जाते हैं, हम मना करने में संकोच कर जाते हैं और बाद में पछताते हैं। अधिकतर अनुभव बताते हैं कि मना नहीं कर पाना उनके लिए अंततः कितना दुखदायी सिद्ध हुआ! इसीलिए हमारे मन में धीरे-धीरे एक तैयारी होने लगती है कि यदि ऐसे अवसर आएँ तो क्या करना? कितना अच्छा हो कि मना किया जा सके और सामने वाले को बुरा भी न लगे?
कड़ाके की ठंड में कोई आपसे आइसक्रीम खाने का अनुरोध करे तो हमारे सामने दो विकल्प होते है, उसकी बात मान जाएँ या मना कर दें। यदि बात टालना संभव न हो, उसके नाराज़ हो जाने का डर हो तो मुस्कुराते हुए आइसक्रीम खा लीजिए और उसका दुष्परिणाम, जुकाम या गले का दर्द मोल ले लीजिए या फिर मना करके स्वयं को सुरक्षित कर लीजिए, भले वह नाराज़ हो जाए। अक्सर ऐसा होता है कि संकोच में 'हाँ' हो जाता है और बाद में पछतावा होता है कि क्यों 'हाँ' किया? जबकि होशियारी इसमें है कि यदि आपको मना करना है तो मना कर दें और वह नाराज़ भी न हो।
आप सोच रहे होंगे कि मना करना इतना आसान है क्या? यदि कह पाते तो क्यों न कह देते? आप सही सोच रहे है। मना करने से सामने वाले को दिली चोट पहुँचती है। उसे लगता है कि उसकी बात काट दी गई। यह सच है कि जिसने आपसे कोई उम्मीद की है वह आपसे 'हाँ' सुनना चाहता है, यदि उसे पहले से मालूम होता कि मना होने वाली है तो कभी न कहता। उसकी जगह खुद को रखकर देखिए तो पूरी मनस्थिति आपको समझ में आ जाएगी। ज़रा सोचिए, उसकी जगह आप होते और मना हो जाता तो आपको कैसा लगता?
मैं जब आर्थिक दुर्दशा के दौर से गुज़र रहा था तो मेरा ऐसी स्थितियों से मेरा कई बार सामना हुआ। अपने एक पुराने सामर्थ्यवान मित्र से मैंने पाँच हजार मांगे तो वह अपने आर्थिक संकट को इस कदर रूआँसा होकर बताने लगा कि मैंने उससे पूछा- 'अपने लिए तो मांगने निकला ही हूँ, तुम्हारे लिए भी मांग लूँ क्या?'
कोई भी व्यक्ति आपसे कुछ मांगता है तो आशा लेकर आपके पास आता है लेकिन आपकी नकारात्मक प्रतिक्रिया उसे आहत करती है जिसे सामने वाला बहुत गंभीरता से लेता है और अपमानित महसूस करता है। समस्याओं से कौन अछूता रहता है? संकट किस पर नहीं आते? ऐसी कठिन परिस्थितियों पर अपने करीबी, परिचित या रिश्तेदार याद आते हैं। यदि मना हो गया तो वह व्यक्ति अपने सम्बन्धों पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर हो जाता है और सोचने लगता है- 'ये कैसा संबंध?'
मना करना हर व्यक्ति का विशेषाधिकार है। अपने हितों और धन-संपत्ति को सुरक्षित रखना बुद्धिमानी है और इसके लिए बहुत सफाई देने की ज़रूरत नहीं होती। ज़रूरी यह होता है कि आपके मना करने के तरीके में माधुर्य हो। समझदारी से किया गया इंकार इस बात को दर्शाता है कि आप दूसरों की ज़रूरत और स्वयं के प्रति संवेदना का भाव रखते हैं। कई ऐसे लोग होते हैं जिन्हें मना करना मुश्किल होता है; जैसे पति या पत्नी, बच्चे, रिश्तेदार, मित्र-उनकी बीबियाँ, पड़ोसी, अफसर, सह-व्यवसायी, धार्मिक-सामाजिक कार्यकर्ता। उनकी ज़रूरत को समझने की ज़िम्मेदारी वाली चिड़िया आपके पाले में होती है, देखना यह होता है वापसी 'शॉट' आप कैसा भेजते हैं?
ऐसे निर्णय लेने से बचिए जो आपको बाद में दुख देने वाले हैं। किसी नाज़ुक मौके पर इंकार करने का निर्णय आपको किसी भावी हानि से बचा सकता है और आपके व्यक्तित्व तथा कृतित्व में निखार ला सकता है। इससे आत्मशक्ति बढ़ती है, आत्मविश्वास मज़बूत होता है जो आपकी 'सेल्फ इमेज़' को बढ़ाने में सहायक होता है।
मना करने में हड़बड़ी न करें, थोड़ा समय लेना अच्छी तरकीब है। कुछ अच्छे वाक्य हैं, इनका उपयोग कीजिए जैसे, 'यह तो शानदार पेशकश है लेकिन इस समय मैं इसका लाभ उठा पाने की स्थिति में नहीं हूँ' या, 'यह अच्छा विचार है लेकिन मुझे लगता है कि इस समय इसे टालना होगा।' आप इस प्रकार अपने इंकार को एक सकारात्मक मोड़ दे सकते हैं और दूसरे की भावना को ठेस पहुँचाने से बच सकते हैं। असावधानी से किए गए इंकार से अप्रिय स्थितियों बन जाती हैं। ऐसे मौके कम आते हैं जब तुरंत 'हाँ' या 'न' में जवाब देना होता है। यूं जवाब दीजिए, 'मुझे इस बारे में सोचने का समय दीजिए' या, 'मुझे हाँ कहना अच्छा लगेगा लेकिन मैं तुरंत ऐसा नहीं कह पाऊंगा' या, 'मुझे थोड़ा समझने का समय दीजिए ताकि मैं यह तय कर सकूँ कि मैं कुछ कर सकता हूँ या नहीं।' इस तरीके से यह संदेश जाता है कि आप उसकी बात को गंभीरता से ले रहे हैं और उस पर विचार भी कर रहे हैं।
बातचीत के दौरान हमारे समक्ष यह चुनौती रहती है की कैसे सामने वाले को अपनी बोतल में उतारा जाए? मान लीजिए, आपकी योजना सुविचारित है और आप स्वयं में स्पष्ट हैं फिर भी कोई निश्चित 'माइंड सेट' बनाकर न चलें क्योंकि आपसे मिलने वाला हर व्यक्ति अपने किस्म का अनोखा है, सबको एक ही लाठी से नहीं हाँका जा सकता। यदि आप दूसरे को अपनी पटरी पर लाना चाहते हैं तो आक्रामक न बनें, Handle with care को सदैव ध्यान में रखें। किसी भी बातचीत को सकारात्मक मोड़ देने के लिए शब्दों का चुनाव महत्वपूर्ण होता है। सामने वाले को अपनी बात जबरन मनवाने का प्रयास घातक सिद्ध हो सकता है इसलिए उसके विचारों को बदलने की कोशिश न करें बल्कि अपनी विचारधारा को उसके दिमाग में धीरे-धीरे जगह बनाने दें। बेंजामिन फ्रेंकलिन को उनके मित्र ने सुझाया था- 'मेरे दोस्त, कभी भी खुद को होशियार सिद्ध करने की कोशिश मत करना, ये मनुष्य की महानतम मूर्खता होती है। बेहतर है तुम अपने विचार और व्यवहार से सामने वाले को प्रभावित करो, ऐसे अवसर आने दो जब वह तुमको बुद्धिमान मान ले।'
ध्यान रखें, किसी को दुखी न करें। प्रशंसा और मधुर संभाषण से तनाव कम होता है, कठिन स्थितियाँ सामान्य हो जाती हैं और आपसी समझदारी में वृद्धि होती है। यदि आपकी बात में दम है तो सहमति के बिन्दु अपने-आप उभरने लगेंगे। यह ज़रूरी नहीं है कि अपनी बात किसी भी तरह मनवाई जाए लेकिन यह ज़रूरी है कि अपने व्यवहार और बातों से किसी को चोट न पहुंचे। जब आप किसी पर अपनी बात मानने का दबाव डालते हैं तो वह आपके विरोध में चला जाता है, तब आपके प्रयासों का क्या हश्र होगा?
एक व्यक्ति को किसी ने बताया कि पालतू कुत्ते को 'कॉड लीवर आयल' देना लाभदायक होता है इसलिए उसने अपने डाबरमेन कुत्ते को पिलाने का निर्णय लिया। उसने अपने कुत्ते का चेहरा अपने दोनों घुटनों के बीच फंसाया, ताकत लगाकर उसका जबड़ा खोला और जबरन शीशी में भरा हुआ तेल उसके मुंह घुसेड़ दिया। कुत्ते ने विरोध किया, भागने की कोशिश की और अचानक उसकी पकड़ से छूट कर दूर खड़ा हो गया। मालिक के हाथ से तेल की शीशी फिसल गई और तेल पूरे फर्श पर बिखर गया। कुत्ते के मालिक के आश्चर्य का ठिकाना न रहा जब उसने देखा कि कुत्ते ने फर्श पर बिखरा तेल खुशी-खुशी चाट लिया और शीशी को भी चाटने लगा, तब उसे समझ में आया कि उसका कुत्ता तेल पीने का विरोध नहीं कर रहा था बल्कि वह तेल पिलाए जाने के तरीके से नाराज़ था।
बात सिर्फ पैसे के लेन-देन की नहीं है, अनेक संगठनों और प्रकल्पों से जुड़ने के प्रस्ताव भी आते रहते है। इसके लिए आपकी कार्यशक्ति, समय और धन की आवश्यकता होती है।
एक निहायत खूबसूरत और मजबूत इरादों वाली महिला किसी संस्था के लिए चन्दा उगाहने के लिए मेरे पास आई और मुझ पर सीधा हमला किया- 'आपके नाम से
1000/- की रसीद काट रही हूँ।' उनका लहजा आदेशात्मक लेकिन अपनेपन से सराबोर था। उनसे मेरे पारिवारिक संबंध थे, बात टालना मुश्किल था लेकिन मैं अपने एक हज़ार रुपयों की बलि देने को तैयार न था। इस बीच उन्होंने रसीद बनाने का काम जारी रखा और मेरा दिमाग संकट से उबरने के उपाय खोजने लगा। मैंने उनसे कहा- 'मैं आपको सहयोग करना चाहता हूँ क्योंकि आपने मुझे इस योग्य समझा लेकिन दूँगा अपनी खुशी से।'
'ठीक है, खुशी से दे दीजिए।' वे बोली। मैंने पर्स से सौ का एक नोट निकाला और उनको दे दिया। वे चौंकी- 'ये क्या?'
'यही मेरी खुशी की सीमा है, इसके आगे दुख शुरू हो जाता है।'
'क्या मतलब?'
'मेरी पत्नी ने मेरी एक सौ रुपए डोनेशन देने की लिमिट बनाई है, आप तो उन्हें जानती हो। मैं इतना ही दे सकता हूँ, इससे अधिक के लिए आपको उनसे जाकर मिलना होगा।'
'सच में?'
'जी।' मैंने लाचारी वाला भाव व्यक्त किया। उन्होंने मुझे दया की दृष्टि से देखा और वे केवल सौ रुपए में मान गई, इस प्रकार मेरे नौ सौ रुपए बच गए।
इस घटना से उपजा ज्ञान:
(1)
किसी अनायास आक्रमण से भयभीत न हों।
(2)
किसी की सुंदरता और व्यक्तित्व को खुद पर हावी न होने दें।
(3)
मन को शांत रखें और संकट से बचने के उपाय खोजें।
(4)
सामने वाले के साथ सज्जनता से पेश आएँ और उसकी बात को गौर से सुनें और समझने का अभिनय करें।
(5)
अपनी प्रतिष्ठा के 'ग्राफ' को नीचे रखने से बचत में वृद्धि होती है।
(6)
अपनी आर्थिक सुरक्षा के लिए झूठ का सहारा लेने में कोई हर्ज़ नहीं है।
यदि कोई संगठन आपकी आवश्यकताओं की पूर्ति करता है, आपकी रुचि के अनुरूप है तो उससे अवश्य जुड़ जाइए अन्यथा चतुराई के साथ इस तरह मना कीजिए- 'बहुत खुशी है कि आपने मुझे इस योग्य समझा कि मैं आपके साथ जुड़ सकूँ। आपके संगठन के बारे में मैंने बहुत कुछ सुन रखा है, आप लोग अच्छा काम कर रहे हैं, बधाई देने लायक लेकिन मेरी व्यस्तता आपके प्रस्ताव को स्वीकार करने की इजाज़त नहीं दे रही है अन्यथा मैं साथ अवश्य आता। भविष्य में यदि मुझे सुविधा हुई तो मैं आपको स्वयं खबर करके बुला लूँगा।'
कभी-कभी ऐसे व्यक्ति को इंकार करना मुश्किल होता है जो अपनी परेशानी का चतुराई से इशारा करता है। जैसे, एक मित्र ने आपको फोन किया- 'एक काम के सिलसिले में तुम्हारे शहर आना हो रहा है लेकिन यार, तुम्हारे यहाँ होटल बहुत मंहगे हैं!'
आपको यह समझने में देर नहीं लगनी चाहिए कि उसकी मंशा आपके घर में रुकने की है लेकिन उसने साफ-साफ न कह कर आपका मन टटोलने की कोशिश की है। वास्तव में, वह चाहता है कि घर में रुकने का प्रस्ताव आप स्वयं रख दें। यदि आप सहमत है तो कोई समस्या नहीं लेकिन यदि असहमत हैं तो आप इस तरह जवाब दे सकते हैं- 'हाँ यार, क्या करोगे? होटल बहुत मंहगे होते जा रहे हैं इसलिए तुम्हें इस परेशानी से जूझना पड़ रहा है।' इतना कहने के बाद चुप हो जाइए और बात को समाप्त कर दीजिए।
आप यह भी कह सकते हैं- 'तुम्हारे लिए ये कौन सी बड़ी मुश्किल है? तुम तो समस्याओं के हल निकालने में उस्ताद हो, यार।'
एक और तरीका है, 'मेरे घर में रुक सकते थे तुम लेकिन उन दिनों हम लोग शहर से बाहर जा रहे हैं।'
किशोर और युवावस्था में जो पुरुष सिगरेट, तंबाखू, शराब और नशीली दवाओं के दोस्ताना प्रस्ताव को नहीं टाल पाते, वे इनकी आदतों के शिकार हो जाते हैं और अपने मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य के साथ अन्याय कर बैठते हैं। इस स्थितियों में महत्वपूर्ण यह होता है कि आपका खुद पर कितना नियंत्रण है! सोचिए, यदि आपका स्वयं पर नियंत्रण नहीं है तो दूसरों को कैसे नियंत्रित करेंगे? मजबूती के साथ मना कीजिए, आपकी मजबूती का असर पड़ेगा। हो सकता कुछ दोस्त हाथ से निकल जाएँ, चिंता मत करिए, बहुत मिलेंगे। 'सामने वाला क्या सोचेगा' इस प्रश्न को अपने ऊपर हावी मत होने दें। अपने से जुड़े फैसले दूसरों पर क्यों छोड़ना? रिश्तेदारी और यारी सलाह-मशविरे के लिए ठीक हैं लेकिन गंभीर निर्णय अपनी बुद्धि की मदद से लें। सबकी सुनें, उस पर मनन करें और अपने मन की करें। याद रखिए, आपका अन्तर्मन आपका सबसे अच्छा मित्र और मार्गदर्शक है, उसकी आवाज़ को अनसुना करना बुद्धिमानी नहीं है। सोचने-समझने को भरपूर समय दीजिए लेकिन उसकी रज़ाई ओढ़कर सोने का प्रयत्न न करें। समय पर लिया गया निर्णय सुफल देता है।
साफ-साफ बात करने वाले लोग किसी को भी तड़ से इंकार करने का साहस रखते हैं। उनका तर्क है कि तुरंत इंकार कर देने से गलतफहमियाँ नहीं बढ़ती और किसी का समय नष्ट नहीं होता। बात सही है लेकिन समस्या यह है कि मना करने का तरीका क्या हो? आप इंकार कर दें फिर भी आपके संबंध यथावत बने रहें- यही जानने-समझने की बात है। साफ इंकार करने की जगह आप उसे यह बताएं कि उसकी बात मानने में क्या अड़चन है? अपनी असुविधा को सहृदयतापूर्वक समझाएँ, उसे बुरा नहीं लगेगा। विश्वप्रसिद्ध अभिनेता पाल न्यूमेन एक रेस्तरां में अपने मित्र के साथ खाना खा रहे थे, उसी समय उनके एक प्रशंसक ने उनका 'ऑटोग्राफ' मांगा। उन्होंने दृढ़ता से मुस्कुराते हुए कहा-
'Sorry gentleman, during dinner I don't enjoy it.' मना करने के ये तरीके आपको मजबूती देते हैं और सुखद होते हैं। जवाब देने के आपके लहज़े में रूखापन नहीं, सदाशयता झलकनी चाहिए। आपकी 'बाडी लेंगवेज़' सरोकारी हो लेकिन विचार एकदम दृढ़।
केवल हमारी-आपकी व्यक्तिगत समस्या नहीं है यह, व्यापार और सेवाओं की दुनिया में भी यह कठिनाई महसूस होती है। अब जब बैंकिंग का व्यवसाय नया रूप ले रहा है तब बैंक अधिकारियों की भूमिका अधिक चुनौतीपूर्ण हो गई है। कर्ज़ देना ज़रूरी है और उसे डूबने से बचाना भी। इसलिए वे शुरू से ही अपनी सीमाओं को ध्यान में रखते हुए अपने कदम आगे बढ़ाते हैं और उसी परिप्रेक्ष्य में निर्णय लेते हैं। उनका संकोच करना, खुद को मौत के कुएं में ढकेलना जैसा सिद्ध हो सकता है। मार्केटिंग सेक्टर में बिक्री बढ़ाने का दबाव और बिके माल की नियमित वसूली का संकट बढ़ते जा रहा है। बिक्री और वसूली में तालमेल बिठाना बहुत कठिन होता है। ऐसे समय में स्पष्ट दृष्टिकोण और सतर्कतापूर्ण रुख अपनाना सही होगा। 'किसे इंकार करना',
'कब इंकार करना',
'कितना इंकार करना' और 'कैसे इंकार करना', ये सब आपकी सुविचारित रणनीति के अनुसार होना चाहिए। हेनरी फोर्ड ने कहा था- 'सफलता का रहस्य दूसरों के दृष्टिकोण को समझने और साथ ही साथ अपने दृष्टिकोण को भी समाहित करने में है।'
यदि मना करना अनिवार्य हो तो शालीनता से मना करने के कुछ अनुभूत उपाय हैं, जैसे :
(1)
वार्तालाप के समय आपके चेहरे पर उत्सुकता, सौम्यता के साथ शांत मुस्कान होनी चाहिए। शरीर की भाषा सहज हो।
(2)
समस्याग्रस्त व्यक्ति की मनोभावना का आदर करें, उसकी बात को सुनकर समझने की कोशिश करें। ऐसा न दर्शाएँ कि आपके पास समय की कमी है, ऐसे समय में घड़ी देखना खतरनाक सिद्ध होगा।
(3)
सामने वाले की बातें सुनते समय सकारात्मक ढंग से सिर हिलाएँ, आँखों से आँखें मिलाकर उसकी बातें सुनें और ईमानदारी से विचार करें कि मदद का कोई उपाय आपके पास है क्या?
(4)
उसकी समस्या पर गौर करें, उसके दृष्टिकोण को समझने की कोशिश करें। बातचीत के दौरान उसके प्रयासों की प्रशंसा करें और उसकी योजनाओं के प्रति सहानुभूतिपूर्ण रवैया प्रदर्शित करें। यदि कोई गलती नज़र आती हो तो बहुत सावधानी से उस ओर इशारा करें ताकि अपनी गलती वह स्वयं समझ सके।
(5)
उसे मना करने के लिए तर्क-वितर्क का सहारा न लें। आप तर्क जीत सकते हैं लेकिन मनुष्य हार जाएंगे। ऐसे मौके पर आपकी शालीनता और व्यवहारकुशलता की परीक्षा होती है।
(6)
अपनी बातों से उसे समझाने की कोशिश करें, वस्तुपरक बातें करें, कम बोलें क्योंकि उल्टे-सीधे बहाने सबको समझ आते हैं।
(7)
इंकार करने में शर्मिंदगी महसूस न करें, इंकार करना कोई अपराध नहीं है।
सामान्यतया जिसकी 'हाँ' करने की आदत होती है वह हाँ करता है और जिसकी 'न' करने की आदत होती है उससे कोई कुछ कहता ही नहीं है। इसका एक अर्थ यह भी है कि सबकी जरूरतों को समझने वाला सरल स्वभाव वाला व्यक्ति सबकी जरूरतों पर ध्यान देने वाला व्यक्ति बन जाता है और उसे परिवार में 'अच्छा व्यक्ति' घोषित कर दिया जाता है ताकि वह आजीवन अच्छा बना रहे और सबकी ज़रूरतें पूरी करता रहे। इस प्रकार जो व्यक्ति मना नहीं करता, उसका तब तक शोषण होते रहता है, जब तक वह मना करना नहीं सीखता। ऐसे सरल व्यक्तियों को धीरु भाई अंबानी की बात याद रखनी चाहिए- 'पहले स्वयं को समर्थ बनाओ, फिर दूसरे की मदद की सोचो।'
इंकार करने का यह मसला केवल बाहरी दुनिया के साथ नहीं है, घर-परिवार में भी रहता है। परिवार में एक-दूसरे का साथ देना सहज प्रक्रिया है। जहां तक मुझे समझ में आया, भारतीय परिवेश में प्रत्येक व्यक्ति इस ढंग से प्रशिक्षित किया जाता है ताकि परिवार की जरूरतों के लिए वह मना करने के पहले सौ बार सोचे लेकिन अंत में 'हाँ' कहे। 'सर्व सुखाय' की भावना को विकसित करने का यह ऐसा अभूतपूर्व प्रयोग है जिसे पूरा विश्व अपना रहा है। प्रश्न यह है कि अपने परिवार में कितना 'हाँ' करना और कब 'न' करना?
हम सब इस प्रकार की स्थितियों से दो-चार होते रहते हैं। तनिक सावधानी और होशियारी के साथ इन उपायों का उपयोग कीजिए, आप बिना नाराज़ किए लोगों को बड़ी सरलता से इंकार कर सकेंगे। वैसे, हर इंसान को मददगार बनना चाहिए लेकिन मदद करने की भी सीमा होती है, उसका ध्यान रखते हुए निर्णय लिया जाना चाहिए। किसी को मना करना भी स्वप्रबंधन का अंग है। प्रयत्न करके आप इस कला में माहिर बन सकते हैं।
निष्कर्ष यह है कि सबसे पहले किसी भी व्यक्ति को इंकार करने के पूर्व यह निश्चित करें कि आप सामने वाले व्यक्ति और उसकी समस्या को समझने की दिली कोशिश कर रहे हैं। दूध का जला छाछ भी फूंककर पीता है, देखिए, शायद इस बार पीने लायक हो। इसके लिए ज़रूरी है कि आप नकारात्मक भावनाओं पर नियंत्रण रखें। आपके आसपास के लोग आपसे समझदारी की उम्मीद करते हैं और आपकी समझदारी आपको परिपक्व व्यक्ति बनाती है। यह जीवन का बड़ा पुरस्कार होगा कि लोग आपको एक मददगार इंसान के रूप में जानें या याद करें इसलिए आपका सकारात्मक व्यवहार ही सही निर्णय लेने में सहायक होगा। ज़रूरत इस बात की है कि आप अपनी सोच में संगीत की तरह संतुलन स्थापित करने की कोशिश करें। आप तो जानते हैं कि संतुलन बिगड़ने से संगीत बेसुरा हो जाता है।
जितना इंकार करना ज़रूरी है, उतना ही किसी की सहायता करना भी। निश्चयतः किसी का बोझ ढोना समझदारी नहीं है पर क्या स्वयं समाज पर बोझ बन जाना उचित है? यदि 'हाँ' और 'न' में संतुलन साधकर व्यवहार करते हैं तो आप निश्चयतः सुखी और संतुष्ट व्यक्ति के रूप जीवन का आनंद ले सकेंगे।
* *
* * *