हिन्दी आज जिस परिष्कृत रूप में बोली और लिखी जाती है उसका बहुत कुछ श्रेय आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी को है। वे युगदृष्टा थे, वे जानते थे कि कोई देश एक राष्ट्रभाषा के बिना न तो भावनात्मक एकता प्राप्त कर सकता है और न शिक्षा तथा संस्कृति की दृष्टि से सम्पन्न ही बन सकता है। उन दिनों भारत की अनेक भाषाओं की तरह हिन्दी भी एक सामान्य भाषा थी, उसमें राष्ट्रीयभाषा के उपयुक्त प्रखरता उत्पन्न न हो पाई थी, इस कमी को पूरा करना आवश्यक था। भारत में अँग्रेजी शासन था पर यह बात दिन-दिन स्पष्ट होती जा रही थी कि भारत आज नहीं तो कल राजनैतिक स्वतन्त्रता प्राप्त करेगा, तब सबसे पहली आवश्यकता एक समृद्ध राष्ट्रभाषा की पड़ेगी. यह गुण केवल हिन्दी में था लेकिन उसके प्रखरता प्राप्त करने में अभी लम्बी यात्रा पूरी करनी थी। द्विवेदी जी राष्ट्र की इस महत्वपूर्ण आवश्यकता को पूर्ण करने के लिए एक चतुर शिल्पी की तरह आजीवन उसी व्रत को पूरा करने में एक कर्मठ व्यक्ति की तरह उत्साह के साथ संलग्न रहे।
उत्तर प्रदेश में रायबरेली जिले के दौलतपुर ग्राम में उनका जन्म हुआ। पढ़ाई का कोई प्रबन्ध उनके गाँव में न था। आटा और दाल अपनी पीठ पर लाद कर दूर के गाँवों में जहाँ स्कूल थे वहाँ पढ़ने जाते। उन्हें रोटी बनाना नहीं आता था इसलिए दाल में आटे की टिकिया पकाकर अपनी भूख शांत करते और शिक्षा की साधना में लगे रहते। इस प्रकार पुरवा, फतेहपुर, उन्नाव की स्कूलों में उन्होंने चार वर्ष काटे। घर की आर्थिक दुरावस्था ने आगे पढ़ने की सम्भावना नष्ट कर दी और असमय स्कूली शिक्षा समाप्त हो गई. गुजारे के लिए उन्हें रेलवे में नौकरी करनी पड़ी।
परिश्रम और अध्यवसाय से वे अपनी योग्यता बढ़ाते रहे। प्रतिभा के साथ-साथ उनका वेतन और पद भी बढ़ता गया।सिगनेलर, टिकटबाबू, मालबाबू, स्टेशनमास्टर, प्लेटियर, टेलीग्राम इन्सपेक्टर, चीफ क्लर्क ये छोटे बड़े पदों पर उन्होंने सन1903 तक काम किया लेकिन उनका अन्तःकरण यही कहता रहा कि पेट भरने मात्र से सन्तुष्ट नहीं रहना चाहिए, समाज के लिए कुछ रचनात्मक काम किए बिना कोई प्रगतिशील आत्मा सन्तुष्ट नहीं हो सकती। उनकी आत्मा ने विद्रोह कर दिया और उन्हें नौकरी छोड़कर रचनात्मक काम करने के लिये अग्रसर कर दिया। वे निरंतर साहित्य साधना करते रहे क्योंकि वे मातृ-भाषा की सेवा करना चाहते थे। शीघ्र ही उनका अभीष्ट माध्यम मिल गया और वे इलाहाबाद की सुप्रसिद्ध मासिक पत्रिका ‘सरस्वती’ के सम्पादन का कार्य मिल गया।
द्विवेदी जी बड़ा काम करना चाहते थे, इसलिए व्यक्तिगत जीवन में संयम और सादगी अपनाते हुए बची हुई शक्तियों को लोकहित में समर्पित करते रहे। प्राचीन काल के ऋषियों की तरह उन्होंने गरीबी का जीवन बिताते हुए लोक मंगल के लिए सच्ची तपश्चर्या करने में लगे रहे। सरस्वती के सम्पादन कार्य में उन्हें हर महीने 20/- वेतन और 3/- डाक खर्च = कुल 23/- मिलते थे जबकि रेलवे की नौकरी में उन्हें अधिक वेतन मिलता था. वे कहा करते- 'मुझ जैसे मितव्ययी देहाती के लिए यह भी क्या कम है ?'
सरस्वती में छपी प्रत्येक रचना, साहित्यिक दृष्टि से सब प्रकार खरी और परिष्कृत मानी जाती थी। दूसरों के लिखे को मनोचित और परिष्कृत किया करते थे साथ ही सबसे बड़ा काम यह किया है कि अगणित नवोदित लेखकों को मार्ग दर्शन एवं प्रोत्साहन देकर उन्हें आगे बढाया। जिस तरह पारस को छूकर लोहा सोना बनता है उसी प्रकार द्विवेदी जी के संपर्क में जो आया वह भी सोना बन गया। उन्होंने अठारह वर्षों तक 'सरस्वती' का सम्पादन किया। अवकाश ग्रहण करने के बाद भी वे नियमित रूप से लेखन-कार्य करते रहे। अपनी स्वयं की रचनायें लिखने की अपेक्षा उनका प्रधान कार्य दूसरों की कृतियों को परिष्कृत कर उन्हें उत्कृष्ट बनाना रहता था। वे लेखकों को यह बताया करते थे कि उनसे कहाँ भूल हुई, क्या कमी रही, ओर किन बातों का समावेश आवश्यक था।
मध्य-युग की परम्परा का अनुसार उन दिनों भी श्रंगारिक कविताओं और कवियों का बाहुल्य था। ऐसे लोगों का वे सदा निरुत्साहित करते रहे और उस प्रवृत्ति को राष्ट्र-निर्माण के लिये अनुपयुक्त बताकर उससे दूर रहने की शिक्षा देते रहे। उन्होंने ऐसे कवियों से कहा- 'चींटी से लेकर हाथी तक पशु, भिक्षुक से लेकर राजा तक मनुष्य, बिन्दु से लेकर समुद्र, अनन्त आकाश, पृथ्वी, पर्वत सभी पर कवितायें हो सकती हैं फिर क्या कारण है कि इन विषयों को छोड़कर कवि स्त्रियों की काम-चेष्टाओं के वर्णन को कविता समझे ?”
आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के बारे में यह विवरण आपको मैंने इसलिए बताया क्योंकि विगत दिनों आचार्यजी की हस्तलिखित दो चिट्ठियाँ मेरे हाथ लगी। 89 वर्ष पूर्व लिखे गए ये अमूल्य दस्तावेज़ अम्बिकापुर में कुटुंब न्यायालय में पदस्थ न्यायाधीश श्री शैलेश तिवारी के पास सुरक्षित हैं। उन्होंने ये धरोहर-पत्र जब मुझे दिखाए तो मैंने कांपते हाथों से उन पत्रों को उठाया, अपने माथे से लगाया और प्रणाम किया। इन अभूतपूर्व ऐतिहासिक पत्रों में जो लिखा है, वह तो और भी आश्चर्यजनक है।
श्री शैलेश तिवारी के दादा गणेशप्रसाद विवाह-योग्य थे। उनके दादा के पिता ठाकुर प्रसाद तिवारी की आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी से पुरानी रिश्तेदारी थी। द्विवेदी जी से किसी अच्छी जगह रिश्ता बताने का अनुरोध किया गया था जिसके उत्तर में यह पत्र लिखकर द्विवेदी जी ने जो जानकारी दी और आवश्यक निर्देश दिए, इसे पढ़िये :
दौलतपुर रायबरेली
४ फरवरी २८
श्री पंडित ठाकुर प्रसाद तिवारी को नमस्कार
आपकी लड़की गिरजा ने यहाँ राधादेवी से बहुत कहा था कि वह कहीं गणेशप्रसाद की शादी लगा दे। तब से वह इस फिक्र में बराबर रही। उसने अपने पिता पंडित कालिकाप्रसाद दुबे को भी इस विषय में पत्र लिखा था। उन्होंने बड़ी कृपा करके अपने सगे भाई पं॰ रघुबरदयाल दुबे की पोती के साथ गणेश की शादी करा देने का विचार किया है। ये लोग जैराजमऊ के दुबे (मेरी ही तरह) उपमन्यु गोत्री हैं। रहने वाले जिले हरदोई में बिलग्राम नाम के मशहूर कस्बे के हैं। पं॰ रघुबर दयाल यहीं अपने मकान में रहते हैं और वकालत करते हैं।
रघुबरदयाल की पोती की उम्र कोई १६ साल की है। हाथ पैर नाक कान से दुरुस्त है। तंदरुस्त है हिन्दी पढ़ी हुई है। नाम काश्मीरो है। ये लोग बड़े सज्जन हैं। चूंकि आप इस तरफ शादी ब्याह करते आये हैं इस कारण इससे अच्छा सम्बन्ध मिलना कठिन है। आपका जी चाहे तो फौरन मंजूर कर लीजिये। अपनी वह फटी हुई ज्योतिष की पोथी खोलकर न बैठ जाना। ऐसे विचार में कुछ सार नहीं है। न मैंने कभी ऐसे विचार किये न पंडित कालिकाप्रसाद ने किये। अच्छा सम्बन्ध बड़े भाग्य से मिलता है। अगर बिलग्राम से कोई चिट्ठी आपके पास आई हो तो उसके जवाब में फौरन अपनी मंजूरी लिख भेजना और यह लिख देना कि जो कुछ पंडित कालिकाप्रसाद देंगे या दिला देंगे वह आप धन्यवादपूर्वक स्वीकार कर लेंगे। किसी तरह की अप्रसन्नता न प्रकट करेंगे। चिट्ठी का जवाब गणेशप्रसाद से लिखाओ। चिट्ठी आपकी तरफ से हो, लिखे वो क्योंकि वे अच्छी हिन्दी लिख सकते हैं आपकी लिखावट शायद अच्छी तरह न पढ़ी जाय। अगर बिलग्राम से चिट्ठी न आवे तो आप मेरी इस चिट्ठी का हवाला देकर अपनी मंजूरी पंडित कालिकाप्रसाद दुबे को लिख भेजना। उनका पता है- राधास्वामी सत्संग चौक गंगादास इलाहाबाद....
अगर आप शादी मंजूर कर लेंगे तो मैं पंडित कालिकाप्रसाद को लिख दूँगा कि शुरू की रस्मों में आपको यह दिया जाय
बरिक्षा (वरदीक्षा) १)
वरदीक्षा पर व्यवहार १५)
नकद ११)
थाल के काम ५)
थाल मलमल के काम ८)
हल्दी सुपारी चन्दन के काम ५)
ब्राह्मणों की दक्षिणा के काम ५)
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५०) यह सब मनीआर्डर से भेजा जाएगा।
आप चाहें बिलासपुर से बारात लावें चाहे किसुनपुर से ले जाय रेल के किराये के मद्दे आपको ५०) दिये जायंगे। यह ५०) हो सकेगा तो ऊपर के ५०) के साथ ही भेज दिये जायंगे। नहीं बिलग्राम में दे दिये जायंगे। बारात में १५ आदमी से अधिक न जाय। ८-१० भले आदमी, बाकी नौकर चाकर परजा। विवाह में जो कुछ आपके भाग्य में होगा मिलेगा। शादी जल्दी ही करनी होगी। निवेदक म॰ प्र॰ द्विवेदी।
राष्ट्र-भाषा के इस शिल्पी ने 21 दिसम्बर 1939 को महाप्रयाण किया। उनकी तपस्या ने हिन्दी साहित्य का जो गौरव बढ़ाया उसे देखते हुए वे अजर-अमर हो गए।
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