मेरे पत्रकार मित्र सोमदत्त शास्त्री के पिताश्री का दस दिन पूर्व निधन हो गया। शोक व्यक्त करने के लिए मुझे उनके घर जाना था जो मेरी होटल से दूर है, लगभग सात किलोमीटर। कल दिन में साढ़े दस बजे मैंने अपनी स्कूटर में उनके घर के लिए निकला। उनका घर मेरा देखा हुआ नहीं था लेकिन 'लोकेशन' मोटे तौर पर मालूम थी। वहाँ पहुँचते तक ग्यारह बज गए और सूर्य देवता अपना रौद्र प्रभाव दिखाने लगे। मैं उनका घर खोजता यहाँ से वहाँ भटक रहा था लेकिन घर नहीं मिल रहा था। मैंने श्री सोमदत्त शास्त्री को फोन लगाया लेकिन वह 'नो रेप्लाई' कर रहा था। मैं कुछ और आगे बढ़ गया। रेल्वेफाटक के उस पार लालखदान मोहल्ले में कुर्सी पर बैठे एक सज्जन से मैंने पूछताछ की तो उन्होंने कहा- 'आप आगे आ गए है, वापस जाइए, वहाँ मिलेगा। मैंने उनसे बताया कि मैं आधे घंटे से वहीं पर उनका घर खोज रहा था लेकिन नहीं मिला तो उनके पास बैठे एक युवक ने कहा- 'चलो अंकल, मैं आपके साथ चल कर बता देता हूँ, मुझे भी उधर जाना है।' मैंने सोचा कि काम बन गया, मैं खुश हो गया। पीछे बैठे युवक ने मुझे बताया कि वह कल ही जेल से छूटा है। मैं घबराया कि किसको बैठा लिया अपने पीछे ? फिर भी, मैंने उससे बात शुरू की- 'जेल क्यों गए थे ?'
'दोस्ती-यारी में अंकल, मारपीट में बिना मतलब फंस गया था।'
'कितने दिन जेल में रहा ?'
'दो महीना।'
'सजा हुई थी क्या ?'
'नहीं, मैं अदालत से छूट गया, मेरी कोई गलती नहीं थी।'
'तो बिना गलती के सजा भुगत लिया ?'
'क्या करोगे अंकल, बुरा फंसा ?' उसने कहा। इतने में सोमदत्त शास्त्री जी का घर आ गया, उसने घर बताया और वह उतर कर चला गया। मैं शास्त्री जी से लगभग आधे घंटे तक बातचीत करते बैठा रहा। उनसे विदा लेकर जब मैं अपनी स्कूटर पर वापस आया तो अचानक मेरे मन में एक संदेह आया कि मेरे साथ जेल से छूटा मुलजिम पीछे बैठ कर आया था, कहीं उसने मेरी पिछली पाकेट से पर्स तो नहीं निकाल ली ? मैंने टटोला, पर्स गायब थी। उसमें कुछ रुपए, एटीएम कार्ड, आधार कार्ड, ड्रायविंग लाइसेन्स, फोटोग्राफ़्स और कुछ ज़रूरी कागजात थे। मैं तुरंत समझ गया कि घर का पता पूछना मुझे मंहगा पड़ गया और मैं उसकी पाकेटमारी का शिकार बन गया।
मेरा दिमाग तेजी से सक्रिय हुआ, मैं पुनः उसी जगह पर पहुंचा जहां से वह युवक मुझे मिला था। वह वहीं बैठा था। मैंने उससे कहा- 'तुमने मेरी पर्स निकाल ली ? चुपचाप दे दो नहीं तो कल जेल से छूटे हो, आज फिर चले जाओगे।'
'माँ कसम, मैं आपकी पर्स के बारे में कुछ नहीं जानता, मैंने नहीं निकाला।'
'ये सब बहानेबाजी है, मैं तुझे शाम तक का समय देता हूँ, मेरा पर्स मुझे वापस चाहिए।' मैंने उसे धमकाया। इतने में आस-पड़ोस के लोग आ गए और उसको समझाने लगे लेकिन वह अड़ा रहा और बार-बार कसम खाता रहा। तब ही उसके पिता आ गए, मैंने उनसे अपनी बात बताई तो वे बोले- 'लेकिन वो कह तो रहा है कि उसने आपकी पर्स नहीं निकाला।'
'देखो, ये मेरे सामने नहीं कबूलेगा, अकेले में उससे पूछताछ करो। मैं अपना मोबाइल नंबर देकर जा रहा हूँ, जैसा होगा, मुझे खबर करना।' मैंने कहा। उसके पिता मेरी बात मान गए, मैं दुखी मन से अपनी होटल वापस आ गया।
लौटते वक्त रास्ते भर मुझे पछतावा होता रहा, अपनी असावधानी पर गुस्सा आता रहा लेकिन जो होना था, वह हो गया। अचानक मुझे लगा कि हो सकता है कि मेरी पर्स कहीं रास्ते में गिर गई हो, या घर में ही छूट गई हो ? रास्ते में गिरी तो मिलने से रही, सोचा, घर में पता कर लिया जाए। मैंने माधुरी जी को फोन लगाया और उनसे कहा कि सुबह बाथरूम में उतारे हुए फुलपेंट में मेरी पर्स खोज लें और आलमारी में भी। कुछ देर में माधुरी जी का फोन आया- 'तुम अपनी पर्स आलमारी में छोड़ गए हो, रखी है।' मेरी जान-पे-जान आई।
अब मेरा ध्यान उस भले आदमी की तरफ गया जिसने मेरी मदद की थी और मैंने उस पर बिना सोचे-समझे चोरी का आरोप मढ़ दिया था। मैं तुरंत उठा, हेलमेट पहना और स्कूटर पर उससे मिलने के लिए तपती दोपहर में उसके घर के लिए निकल पड़ा। वह अपने घर पर नहीं था, अपने पिता के साथ कहीं गया हुआ था। जिस पड़ोसी ने उसे मेरे साथ भेजा था, वह भी नहीं था लेकिन उसकी पत्नी को मैंने कहा कि उस युवक के परिवार का जो भी घर में हो, उसे बुला दें। घर में उसकी बहन थी, वह घबराई हुई आई और उसने मुझसे पूछा-'का होगे ?' (क्या हुआ ?)
'मेरी पर्स मिल गई, मैं तुम्हारे भाई से माफी मांगने आया हूँ, मैंने उस पर नाहक दोष लगाया, मुझसे गलती हो गई।' मैंने हाथ जोड़कर कहा।
'तोर सामान मिल गे ना ? बने होइस। माफी के बात नईं ए।' (तुम्हारा सामान मिल गया न ? माफी मांगने की ज़रूरत नहीं है।) वह बोली। मैंने उसके हाथ में कुछ रुपए रखे और कहा- 'उसको दे देना, कुछ ले लेगा।'
'नई लगे।' (नहीं लगता )
'रख ले ओ।' मैंने कहा, पड़ोसिनों ने भी ले लेने की सिफ़ारिश की तो उसने सकुचाते हुए रख लिया और अपने घर वापस लौट गई।
मैं अपनी असावधानी और 'फटाफट निष्कर्ष निकालने' के अपराध पर बेहद शर्मिंदा हूँ।
मुझे माफ करना मेरे मददगार।
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'दोस्ती-यारी में अंकल, मारपीट में बिना मतलब फंस गया था।'
'कितने दिन जेल में रहा ?'
'दो महीना।'
'सजा हुई थी क्या ?'
'नहीं, मैं अदालत से छूट गया, मेरी कोई गलती नहीं थी।'
'तो बिना गलती के सजा भुगत लिया ?'
'क्या करोगे अंकल, बुरा फंसा ?' उसने कहा। इतने में सोमदत्त शास्त्री जी का घर आ गया, उसने घर बताया और वह उतर कर चला गया। मैं शास्त्री जी से लगभग आधे घंटे तक बातचीत करते बैठा रहा। उनसे विदा लेकर जब मैं अपनी स्कूटर पर वापस आया तो अचानक मेरे मन में एक संदेह आया कि मेरे साथ जेल से छूटा मुलजिम पीछे बैठ कर आया था, कहीं उसने मेरी पिछली पाकेट से पर्स तो नहीं निकाल ली ? मैंने टटोला, पर्स गायब थी। उसमें कुछ रुपए, एटीएम कार्ड, आधार कार्ड, ड्रायविंग लाइसेन्स, फोटोग्राफ़्स और कुछ ज़रूरी कागजात थे। मैं तुरंत समझ गया कि घर का पता पूछना मुझे मंहगा पड़ गया और मैं उसकी पाकेटमारी का शिकार बन गया।
मेरा दिमाग तेजी से सक्रिय हुआ, मैं पुनः उसी जगह पर पहुंचा जहां से वह युवक मुझे मिला था। वह वहीं बैठा था। मैंने उससे कहा- 'तुमने मेरी पर्स निकाल ली ? चुपचाप दे दो नहीं तो कल जेल से छूटे हो, आज फिर चले जाओगे।'
'माँ कसम, मैं आपकी पर्स के बारे में कुछ नहीं जानता, मैंने नहीं निकाला।'
'ये सब बहानेबाजी है, मैं तुझे शाम तक का समय देता हूँ, मेरा पर्स मुझे वापस चाहिए।' मैंने उसे धमकाया। इतने में आस-पड़ोस के लोग आ गए और उसको समझाने लगे लेकिन वह अड़ा रहा और बार-बार कसम खाता रहा। तब ही उसके पिता आ गए, मैंने उनसे अपनी बात बताई तो वे बोले- 'लेकिन वो कह तो रहा है कि उसने आपकी पर्स नहीं निकाला।'
'देखो, ये मेरे सामने नहीं कबूलेगा, अकेले में उससे पूछताछ करो। मैं अपना मोबाइल नंबर देकर जा रहा हूँ, जैसा होगा, मुझे खबर करना।' मैंने कहा। उसके पिता मेरी बात मान गए, मैं दुखी मन से अपनी होटल वापस आ गया।
लौटते वक्त रास्ते भर मुझे पछतावा होता रहा, अपनी असावधानी पर गुस्सा आता रहा लेकिन जो होना था, वह हो गया। अचानक मुझे लगा कि हो सकता है कि मेरी पर्स कहीं रास्ते में गिर गई हो, या घर में ही छूट गई हो ? रास्ते में गिरी तो मिलने से रही, सोचा, घर में पता कर लिया जाए। मैंने माधुरी जी को फोन लगाया और उनसे कहा कि सुबह बाथरूम में उतारे हुए फुलपेंट में मेरी पर्स खोज लें और आलमारी में भी। कुछ देर में माधुरी जी का फोन आया- 'तुम अपनी पर्स आलमारी में छोड़ गए हो, रखी है।' मेरी जान-पे-जान आई।
अब मेरा ध्यान उस भले आदमी की तरफ गया जिसने मेरी मदद की थी और मैंने उस पर बिना सोचे-समझे चोरी का आरोप मढ़ दिया था। मैं तुरंत उठा, हेलमेट पहना और स्कूटर पर उससे मिलने के लिए तपती दोपहर में उसके घर के लिए निकल पड़ा। वह अपने घर पर नहीं था, अपने पिता के साथ कहीं गया हुआ था। जिस पड़ोसी ने उसे मेरे साथ भेजा था, वह भी नहीं था लेकिन उसकी पत्नी को मैंने कहा कि उस युवक के परिवार का जो भी घर में हो, उसे बुला दें। घर में उसकी बहन थी, वह घबराई हुई आई और उसने मुझसे पूछा-'का होगे ?' (क्या हुआ ?)
'मेरी पर्स मिल गई, मैं तुम्हारे भाई से माफी मांगने आया हूँ, मैंने उस पर नाहक दोष लगाया, मुझसे गलती हो गई।' मैंने हाथ जोड़कर कहा।
'तोर सामान मिल गे ना ? बने होइस। माफी के बात नईं ए।' (तुम्हारा सामान मिल गया न ? माफी मांगने की ज़रूरत नहीं है।) वह बोली। मैंने उसके हाथ में कुछ रुपए रखे और कहा- 'उसको दे देना, कुछ ले लेगा।'
'नई लगे।' (नहीं लगता )
'रख ले ओ।' मैंने कहा, पड़ोसिनों ने भी ले लेने की सिफ़ारिश की तो उसने सकुचाते हुए रख लिया और अपने घर वापस लौट गई।
मैं अपनी असावधानी और 'फटाफट निष्कर्ष निकालने' के अपराध पर बेहद शर्मिंदा हूँ।
मुझे माफ करना मेरे मददगार।
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