Thursday, 14 February 2019

मुलाकात : मीर मुख्तियार अली

राजस्थान के बीकानेर जिले के छोटे से पूगल गाँव में मिरासियों का मोहल्ला है जो बीकानेर से 100 किलोमीटर दूर भारत-पाक सीमा के नजदीक बसा हुआ है, वहां 27 पीढ़ियों से गायन की परंपरा चल रही है। इस गायन का वर्तमान हैं, 44 वर्षीय मीर मुख्तियार अली जिनका सुर लाजवाब है, आरोह-अवरोह संतुलित है, गायन शैली अप्रतिम है और ऊर्जा अपार है। मुख्तियार अली दुनिया के 30 देशों में अपने सुर बिखेर चुके हैं, 15 फिल्मों में गा चुके हैं और जब मैं केरल एक्स्प्रेस के डिब्बे में यात्रा के दौरान उनसे मिला तो मुझे समझ आया कि फलों से लदा हुआ वृक्ष कितना झुका हुआ होता है।

'हमारा राजस्थान भारत में सबसे अमीर है भाई साहब, एक बात बताता हूँ, ध्यान से सुनना, हम अपनी अमीरी सन्दूक में नहीं रखते, सबको बाँट देते हैं। संगीत हमारे रोम-रोम में बसा हुआ है इसीलिए हम अमीर हैं, इसे हम पूरे संसार में बांटते हैं।' मुख्तियार अली ने बताया। 'रोज सुबह 4 घंटे मेरी रियाज़ होती है जिसकी शुरुआत 'ॐ ' से होती है। शिव का उपासक हूँ मैं। जब मैं 'दमादम मस्त कलंदर गाता हूँ तो मुझे शिव जी के दर्शन होते हैं। आपको पता है ? हमारे इधर साँप को कलंदर कहते हैं, मस्त कलंदर, शिव के गले में लहराता मस्त कलंदर...।'

'हमने शास्त्रीय संगीत नहीं सीखा, मुझे मेरे पिता ने जो सिखाया, मैं वही जानता हूँ, वैसा ही गाता हूँ। वैसे, गाना सबके वश की बात नहीं है अग्रवाल जी, ऊपर से आता है। अभी मेरे साथ मेरा लड़का वकार युनूस आया है, साथ में गाता है लेकिन उसमें वह बात नहीं है। हाँ, मेरी लड़की का बेटा है, महज़ एक साल का, वह बड़ा गायक बनेगा। वह अपनी माँ के साथ नहीं रहता, उसको मेरे पास अच्छा लगता है। मैं जब गाता हूँ तो वह तबला लेकर बैठ जाता है, हारमोनियम को पकड़ लेता है, मेरे जैसे गाने की कोशिश करता है, हाथ मटकाता है। मुझे लगता है कि वह गाने के लिए पैदा हुआ है, मैं उसको तैयार करूंगा।'

'कबीर के किस्से बहुत हैं, क्या पता सच्चे हैं या नहीं लेकिन वो हमारे दिल में बसा हुआ है, हमें रास्ता दिखाता है। मुझे उनके गीत गाना बेहद पसंद है, उनको गाकर मुझे सुकून मिलता है। मैं कबीर, बुलेशाह और गुरुनानक का आशिक हूँ, ये सब तो दुनिया से चले गए लेकिन मुझे एक ज़िंदा इंसान मिल गया है, सद्गुरु जग्गी जी, मैं इनका भी आशिक हो गया हूँ। पहली बार किसी जगह जाकर ऐसा लगा कि यहाँ वापस आना है, मैं मई में कोयंबत्तुर आऊँगा, वहाँ एक महीना रहूँगा और गुरुजी से हठयोग सीखूँगा।'

'हम छोटे से गाँव में रहते हैं, छोटे आदमी हैं। सूफी गायन करते हैं तो मन और सोच-विचार भी सूफियों जैसा हो गया है। देश-विदेश में बड़ी जगहों में हमारे कार्यक्रम होते हैं, वहाँ बड़े लोग रहते हैं, हो सकता है कि वे हमारी भाषा न समझते हों लेकिन संगीत ऐसी चीज है जो उन्हें झूमने के लिए मजबूर कर देती है। एक बार की बात है, 'यूनिवर्सिटी ऑफ कोलम्बिया' में मेरा कार्यक्रम था, वे हमारी भाषा क्या जानें ? पर हमारा संगीत सुनकर सब नाच रहे थे।'
'पश्चिमी और भारतीय संगीत में आप क्या फर्क पाते हैं ?' डा॰ संगीता ने प्रश्न किया।
'उनका संगीत बाहर से नचाता है, हमारा संगीत अंदर से नचाता है।' मुख्तियार अली ने उत्तर दिया।
'जब आप कहीं कार्यक्रम देने जाते हैं तो क्या पहले से तय कर लेते हैं कि क्या-क्या गाएँगे ?'
'नहीं, मैं पहले से तय नहीं करता। 'लिस्टिंग' वाला काम मुझे पसंद नहीं है, सुनने वालों को देखकर जो मेरे दिल में आता है, वह गाता हूँ। जो अच्छा लगे वह 'पब्लिक' का है और जो खराब लगे वह मेरा है।' मुख्तियार अली ने बताया।
'मुझे पुरानी फिल्मों के गाने बहुत पसंद हैं, रोज रात को दस से ग्यारह बजे तक विविध भारती सुनता हूँ तब रात को अच्छी नींद आती है।' मैंने बताया।
'बस जी, लता मंगेशकर को सुन लिया करो तो फिर किसी और को सुनने की जरूरत नहीं।' वे बोले।
'एक बात आपसे पूछनी है, फिल्मी संगीत में ढोलक और तबला दोनों का उपयोग किया जाता है, यह पहचानना मुश्किल है कि पार्श्व में ढोलक बज रहा है कि तबला ?'
'हाँ, मुश्किल है। वैसे दोनों साज साथ-साथ भी बजते हैं। मैं जब गाता हूँ तो मेरे साथ अब्दुल जब्बार तबला बजाते हैं और राकेश कुमार साथ में ढोलक बजाते हैं। भले दोनों साज की आवाज में फर्क है लेकिन ताल एक होती है, इस कारण फर्क करना आम आदमी के लिए कठिन होता है।'
'मैंने देखा कि शंकर जयकिशन, कल्याण जी आनंद जी, ओ॰ पी॰ नय्यर के गानों में ढोलक 'प्रामिनेंट' रहती है।'
'बिलकुल सही। वहीं पर नौशाद, मदनमोहन, सचिनदेव बर्मन के संगीत में तबला 'प्रामिनेंट' रहता है। मेरा मानना है कि फिल्म 'पाकीज़ा' में तबले की थाप जो है, वह कमाल की है। याद है आपको वह गाना ? 'चलते चलते, यूं ही कोई मिल गया था...' क्या गज़ब का तबला बजा था ! चार मात्रा का कहरवा जब बजते-बजते बीच में थम जाता तो दिल की धड़कन थम जाती है। फिल्म में गुलाम मोहम्मद का बहुत मीठा संगीत था लेकिन कोई नहीं जानता कि तबला किसने बजाया था ?'
'किसने बजाया था ?'
'रहमान खाँ ने, लोगों ने उनका नाम भी नहीं सुना होगा।'
'ऐसा होता है, फिल्म 'गूंज उठी शहनाई' में शहनाई बजाने की 'क्रेडिट' उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ को मिली लेकिन वास्तव में शहनाई रामलाल ने बजाई थी, फिल्म की टाइटिल में उनका नाम तक नहीं था। नाराजगी में रामलाल ने उस फिल्म को कभी नहीं देखा। दुनिया में नाम की धूम है मुख्तियार जी।' मैंने कहा।

साढ़े तीन घंटे तक चली उस महफिल में हम आठ-दस लोग उनसे और भी न जाने कितनी बातें करते रहे ! मैंने उनसे कहा- 'कुछ गाकर सुना दीजिए, आपसे कबीर को सुनना चाहता हूँ।' मैंने अनुरोध किया। वे मुस्कुराए, अपने मोबाइल को चालू किया, तानपूरा की धुन खोजी, उसे अपने कान में लगाया,  चुटकी बजाई और यह गाया....

'गुरु ने मंगाई चेला वही भिक्षा लाना रे...

पहली भिक्षा आटा लाना, गाँव नगर के पास न जाना
चलती चक्की तज कर आना, खप्पर भर के लाना रे....

दूजी भिक्षा जल ले आना, नदी ताल के पास न जाना
गंदला संदला तज के आना, झारी भर के लाना रे.....

तीजी भिक्षा लकड़ी लाना, पेड़ झाड़ के पास न जाना
गीली सूखी तज के आना, गट्ठर भर के लाना रे...

गुरु ने मंगाई चेला वही भिक्षा लाना रे........'

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