दस वर्ष की उम्र से मैंने दूकानदारी की और आज भी कर रहा हूँ, लाखों किस्म के ग्राहक मिले, सबको संतुष्ट करना तो संभव न हो सका लेकिन मैंने अनुभव किया कि ग्राहकों को साधना कोई कठिन काम नहीं है। दूकान में आनेवाला प्रत्येक व्यक्ति व्यापार की प्राणवायु होता है। वह सामान खरीदे-न-खरीदे, लेकिन यदि वह आपसे या आपके सामान से प्रभावित है तो आपका ग्राहक है। आज नहीं तो कल आएगा, वह नहीं तो उसकी संतान आएगी। दूकानदार की मेहनत कभी निष्फल नहीं जाती। विक्रेता ग्राहक की समस्या का समाधान करने वाला सहायक होता है। जिस प्रकार माल बेचना दूकानदार की समस्या होती है उसी प्रकार सामान खरीदना भी ग्राहक की समस्या होती है। सफल वही होता है जो ग्राहक की समस्या को समझता है, उसकी समस्या के समाधान में मदद करता है।
वह दूकानदार जो जो ग्राहक को अपने द्वार पर आया अन्नदाता समझता है, वह शिष्टाचार और सेवा देने में कभी नहीं चूकता। असल संकट तब आता है जब दूकानदार उसे ग्राहक नहीं, 'अलगरजू' समझता है। यह दोनों हाथ से ताली बजाने जैसा है, दोनों की गरज होती है, लेकिन ऐंठबाज़ लोग ऐंठ दिखाकर अपना धंधा तो खराब करते ही हैं- माहौल को भी खराब कर देते हैं।
उदाहरण के लिए, मैं उन बैंकों का ज़िक्र कर रहा हूँ जिनसे मैंने विगत 40-50 वर्षों से लेन-देन किया है। भारतीय स्टेट बैंक, सेंट्रल बैंक, पंजाब नेशनल बैंक, सिंडीकेट बैंक और बैंक ऑफ बड़ौदा- ये सब राष्ट्रीयकृत बैंक हैं, इनमें मेरे खाते हैं या थे। इस बैंकों के मेरे अनुभव इतने सारे हैं कि उनकी सहायता से एक ग्रंथ तैयार हो जाएगा ! ग्रंथ में थोड़ा सा प्रशंसा योग्य होगा लेकिन ज़्यादातर दुखदायक घटनाएँ होगी। ऐसा क्यों ?
'सेल्समेनशिप' का मूल सिद्धान्त यह है कि ग्राहक की ज़रूरत का पता करो और उसकी आपूर्ति की व्यवस्था करो। जैसे ठंड में चाय और गर्मी में लस्सी। मंदिर के पास नारियल-फूल तो मरघट के पास कफन-लकड़ी। ये बातें तो सब समझ जाते हैं लेकिन जो दूरदर्शी होते हैं वे भविष्य में उत्पन्न होने वाली जरूरतों का भी अनुमान लगा लेते हैं या नई ज़रूरत विकसित कर देते हैं। उदाहरण के लिए, सन 1960 तक प्लास्टिक और टेरेलिन के बारे में किसी को कुछ पता न था लेकिन धीरू भाई अंबानी ने इसके संभावित बाज़ार का अनुमान लगाया और लाइसेन्स का 'जुगाड़' करके विदेश से आयात किया और देश में इसके उपयोग को प्रचारित किया। शुरू-शुरू में इन्हें स्वीकार करने में लोगों को बहुत हिचक थी, बहुत दुष्प्रचार हुआ लेकिन आज प्लास्टिक और टेरीन के उपयोग से आप कैसे बच सकते हैं ! इसे कहते हैं, व्यापार की दूरदृष्टि।
'सेल्समेनशिप' पर उद्यमियों और व्यापारियों के लिए आयोजित प्रशिक्षण कार्यक्रम में मैं अपने 'प्रेजेंटेशन' की शुरुआत इस प्रश्न से किया करता हूँ :
'आपका व्यापार करने का उद्देश्य क्या है ?'
'धन कमाना।' हमेशा यही उत्तर आया।
यदि मैं आपसे यह प्रश्न करूँ तो आपका भी यही जवाब होगा, चाहे आप व्यापार करते हों या 'सर्विस'!'
'आपका व्यापार करने का उद्देश्य क्या है ?'
'धन कमाना।' हमेशा यही उत्तर आया।
यदि मैं आपसे यह प्रश्न करूँ तो आपका भी यही जवाब होगा, चाहे आप व्यापार करते हों या 'सर्विस'!'
यही बहुत बड़ी चूक है क्योंकि यह उत्तर आधा सही है और आधा सही नहीं है। निश्चित रूप से हमें अपने श्रम, हुनर और समय का प्रतिफल चाहिए लेकिन आप इसमें थोड़ा सा 'ट्विस्ट' पैदा करें और यह जवाब दें- 'मैं व्यापार या नौकरी अपने मज़े के लिए करता हूँ, आनंद के लिए करता हूँ।' > मित्र, बात बदल गई, आपका काम करने का तरीका बदल गया, आपका व्यवहार बदल गया, आप बदल गए !
आप व्यापार करते हैं या नौकरी, आपका ध्यान अपने काम को सर्वश्रेष्ठ ढंग से करने की ओर होना चाहिए। अपना 100% दें। व्यापार करें तो इस ढंग से, कि ग्राहक आपकी चर्चा दस लोगों से करे और आपके गुण गाए। नौकरी करें तो ऐसी कि आपके वरिष्ठ, आपके सहयोगी और आपके अधीनस्थ आपके स्थानांतरण पर अफसोस करें और आपको काम को ज़िंदगी भर याद करें। धन तो दरवाजा तोड़ कर आता है। धन आपके परिश्रम, प्रयास और बुद्धि का 'स्वाभाविक प्रतिफल' है।
जैसे चील की नज़र मांस पर होती है वैसे ही सफल दूकानदार की नज़र ग्राहक की जेब पर होती है। जब धन आता दिखाई पड़े तो ग्राहक की बदतमीजी से 'इरिटेट' नहीं होना चाहिए, बल्कि उसे प्यार से अपनी बोतल में उतारकर ढक्कन बंद कर देना- कुशल दूकानदार के लक्षण हैं। दुधारू गाय की लात सहना पड़ती है ! घर में पति-पत्नी एक दूसरे को सहते हैं कि नहीं ?
व्यापार से धन कमाना और धन कमाने के लिए व्यापार करना- इन दोनों बातों में फर्क है। व्यापार सीखने के लिए किसी सिन्धी या पंजाबी या मारवाड़ी को अपना गुरु बनाएँ, उनको आधुनिक बच्चों को नहीं, उन्हें बनाएँ जो पैतृक जमीन-घर छोड़कर अपना जीवनयापन करने के लिए भारत में दूर-सुदूर पहुँचे और ABC से अपने व्यापार की शुरुआत की। वे कैसे शुरु हुए, कैसे बढ़े, कैसे टिके और कैसे अपना साम्राज्य स्थापित किया- वे अनुभव उन बुजुर्गों से सुनें तो आपको ज्ञात होगा कि कैसे उन्होंने बूंद-बूंद से समुद्र भरा और अपनी व्यापार की नीव को किस तरह मजबूत बनाई !
एक नामी-गिरामी फायनेंस कंपनी ने मुझे अपने 'स्टाफ' को प्रशिक्षण देने के लिए रायपुर बुलाया। लगभग अस्सी 'मार्केटिंग एक्सीक्यूटिव' ( 'सेल्समेन' का आधुनिक नामकरण ) उपस्थित थे, साथ में कुछ अधिकारीगण भी। पहले सत्र में तीन घंटे तक 'मोटिवेशन' विषय पर चर्चा हुई और भोजन के उपरांत 'काउंसिलिंग' का सत्र हुआ। 'काउंसिलिंग' के दौरान प्रतिभागी अपनी व्यक्तिगत समस्याओं के समाधान पूछ रहे थे। उनमें से एक चर्चा आपको बताना चाहता हूँ :
एक नामी-गिरामी फायनेंस कंपनी ने मुझे अपने 'स्टाफ' को प्रशिक्षण देने के लिए रायपुर बुलाया। लगभग अस्सी 'मार्केटिंग एक्सीक्यूटिव' ( 'सेल्समेन' का आधुनिक नामकरण ) उपस्थित थे, साथ में कुछ अधिकारीगण भी। पहले सत्र में तीन घंटे तक 'मोटिवेशन' विषय पर चर्चा हुई और भोजन के उपरांत 'काउंसिलिंग' का सत्र हुआ। 'काउंसिलिंग' के दौरान प्रतिभागी अपनी व्यक्तिगत समस्याओं के समाधान पूछ रहे थे। उनमें से एक चर्चा आपको बताना चाहता हूँ :
'सर, मैं बहुत परेशान हूँ, सर।' प्रतिभागी ने कहा।
'कहिए?' मैंने पूछा।
'हमारी कंपनी हर महीने हमें 'बिजनेस टार्गेट' देती है जिसे 'अचीव' करना बहुत कठिन रहता है।'
'काम तो करना पड़ेगा, तब तो तनख्वाह मिलेगी।'
'वह बात नहीं है सर, हमें तनख्वाह और 'कमीशन' दोनों मिलता है।'
'अरे वाह, फिर क्या समस्या है ?'
'हमारी कंपनी की ब्याज दर अन्य कंपनियों और बैंकों के मुक़ाबले अधिक है, ग्राहक को समझाने में बहुत मुश्किल होती है।'
'फिर?'
'हमारा टार्गेट इतना अधिक रहता है कि छोटे-मोटे 'केसेज़' तो हम लोग छूते नहीं, 'जेबीसी', ट्रक या ट्रेक्टर वालों को पकड़ते हैं।'
'ठीक है, फिर ग्राहक को कैसे समझाते हो ?'
'सर, ग्राहक को बताने के लिए हमने कुछ अन्य कंपनियों और बैंको के 'बोगस फोल्डर' तैयार करवा लिए हैं जिनमें उनकी ब्याज दर से हमारी ब्याज दर से अधिक प्रिंट करवा ली है और उसे दिखाकर ग्राहक को समझाते हैं कि हमारे 'रेट' दूसरों से कम है।'
'ये तो बेईमानी है।'
'क्या करें, बिजनेस के लिए करना पड़ता है।'
'कल के दिन ग्राहक को मालूम पड़ा तो ?'
'पड़ता रहे, हमें बिजनेस मिल गया, फायनेंस हो गया, उसके बाद ग्राहक हमारा क्या बिगाड़ेगा ?'
'धोखाधड़ी की शिकायत कर सकता है।'
'ऐसे कैसे करेगा ? बैंक वाला फोल्डर उसको दिखाते भर हैं, देते कभी नहीं।'
'ओह, तो आपको परेशानी क्या है ?'
'बहुत दिल दुखता है सर, आत्मा धिक्कारती है, रात को नींद नहीं आती।'
'फिर'?
'आप बताइए सर, क्या करूँ ?'
'आत्मा धिक्कार रही है तो यह काम छोड़ दीजिए, कुछ और कीजिए।'
'अच्छी सलाह दे रहे हैं आप, ऐसे में मैं भूखे मर जाऊंगा !'
'ईमानदारी से काम करने वाला भूखा नहीं मरता, मेरे भाई।'
'कैसा करूँ ?'
'अपनी आत्मा और अपनी बुद्धि में वार्तालाप चलने दीजिए, कुछ-न-कुछ निष्कर्ष निकलेगा।' मैंने कहा।
'कहिए?' मैंने पूछा।
'हमारी कंपनी हर महीने हमें 'बिजनेस टार्गेट' देती है जिसे 'अचीव' करना बहुत कठिन रहता है।'
'काम तो करना पड़ेगा, तब तो तनख्वाह मिलेगी।'
'वह बात नहीं है सर, हमें तनख्वाह और 'कमीशन' दोनों मिलता है।'
'अरे वाह, फिर क्या समस्या है ?'
'हमारी कंपनी की ब्याज दर अन्य कंपनियों और बैंकों के मुक़ाबले अधिक है, ग्राहक को समझाने में बहुत मुश्किल होती है।'
'फिर?'
'हमारा टार्गेट इतना अधिक रहता है कि छोटे-मोटे 'केसेज़' तो हम लोग छूते नहीं, 'जेबीसी', ट्रक या ट्रेक्टर वालों को पकड़ते हैं।'
'ठीक है, फिर ग्राहक को कैसे समझाते हो ?'
'सर, ग्राहक को बताने के लिए हमने कुछ अन्य कंपनियों और बैंको के 'बोगस फोल्डर' तैयार करवा लिए हैं जिनमें उनकी ब्याज दर से हमारी ब्याज दर से अधिक प्रिंट करवा ली है और उसे दिखाकर ग्राहक को समझाते हैं कि हमारे 'रेट' दूसरों से कम है।'
'ये तो बेईमानी है।'
'क्या करें, बिजनेस के लिए करना पड़ता है।'
'कल के दिन ग्राहक को मालूम पड़ा तो ?'
'पड़ता रहे, हमें बिजनेस मिल गया, फायनेंस हो गया, उसके बाद ग्राहक हमारा क्या बिगाड़ेगा ?'
'धोखाधड़ी की शिकायत कर सकता है।'
'ऐसे कैसे करेगा ? बैंक वाला फोल्डर उसको दिखाते भर हैं, देते कभी नहीं।'
'ओह, तो आपको परेशानी क्या है ?'
'बहुत दिल दुखता है सर, आत्मा धिक्कारती है, रात को नींद नहीं आती।'
'फिर'?
'आप बताइए सर, क्या करूँ ?'
'आत्मा धिक्कार रही है तो यह काम छोड़ दीजिए, कुछ और कीजिए।'
'अच्छी सलाह दे रहे हैं आप, ऐसे में मैं भूखे मर जाऊंगा !'
'ईमानदारी से काम करने वाला भूखा नहीं मरता, मेरे भाई।'
'कैसा करूँ ?'
'अपनी आत्मा और अपनी बुद्धि में वार्तालाप चलने दीजिए, कुछ-न-कुछ निष्कर्ष निकलेगा।' मैंने कहा।
पैसा कमाने की होड़ ने हमें पागल कर दिया है, अमानवीय बना दिया है। धन कमाना और उसे बढ़ाना- प्रशंसनीय है लेकिन इसके लिए छल-बल, प्रपंच, बेईमानी, घूसख़ोरी कतई ज़रूरी नहीं, ये सब कमाई के 'शार्टकट' हैं जिसे केवल आलसी लोग अपनाते हैं। मेहनत करने वाला अपनी बुद्धि-चातुर्य और परिश्रम से, अपना सीना तान कर ईमानदारी से अपना व्यापार बढ़ाता है, आय बढ़ाता है, धनोपार्जन करता है और साथ-ही-साथ अपने व्यक्तित्व का विकास भी करता है।
किसी भी तरह पैसा कमाने की अंधी दौड़ में कितने-कितने धराशायी हो गए जिनको कोई नहीं जानता। सफलता तो इक्के-दुक्के को मिलती है। सचिन तेंदुलकर का उदाहरण करोड़ों को क्रिकेट के मैदान में उतार सकता है लेकिन उन्हें 'सचिन' नहीं बना सकता क्योंकि 'सचिन' बनना 'शार्टकट' प्रयास नहीं था, उसने अपना बचपन, अपनी जवानी, अपनी ज़िंदगी झोंक दी- तब सचिन तेंदुलकर बना। लोग हवा में बल्ला घुमाकर सचिन बनना चाहते है।
सफलता के लिए हड़बड़ी करने वाले अक्सर निराश होते हैं। 'शार्टकट' से आई सफलता की उम्र 'शार्ट' होती है। धीरे-धीरे आगे बढ़ें। हड़बड़ी में पैर फिसलने की संभावना रहती है। सफल तो सबको दिखाई पड़ते हैं लेकिन हड़बड़ी के चक्कर में कितने निपट गए, इसे कोई नहीं जानता। जिन्होंने दिल लगाकर व्यापार किया, अपनी सम्पूर्ण ऊर्जा झोंक दी, वे समय आने पर सफल हुए और भरपूर पैसे कमाए।
कुछ अपवादों को छोड़ दें तो व्यापार में बेईमानी और मुनाफ़ाखोरी इस कदर बढ़ गई है कि व्यापारी मनुष्य के बदले राक्षस दिखाई पड़ता है। पैसा कमाना, बहुत सा पैसा कमाना और किसी भी तरह कमाना- किसी संक्रामक रोग की तरह बढ़ चुका है। जो जितना अधिक कमा लेता है, उसकी भूख उतनी अधिक बढ़ती जाती है। नीति और अनीति से कमाए गए धन का अंतर विलुप्त हो गया है, समाज में 'कमाए गए धन' का प्रतिष्ठा स्थापित हो गई है।
यही हाल सरकारी और अर्द्ध-सरकारी संस्थानों का हो गया है। इन संस्थानों में काम को टालने की महारत इसलिए हासिल की जाती है कि वह अनधिकृत वसूली का माध्यम बने। वे लोग जो इन संस्थानों में नैतिक आदर्शों से जुड़कर आए हैं, ईमानदारी से काम करते हैं या काम करवाना चाहते हैं, वे अपने कार्यालय के माहौल से हतप्रभ हैं। बेचारे, अपनी ईमानदारी के कारण अपने घर में अलग डांट खा रहे हैं ! प्रश्न यह है कि व्यापार और नौकरी में ईमानदारी और परिश्रम से काम करने वाले कब तक टिक पाएँगे ? क्या प्रचलित व्यवस्था उन्हें भी अपने चपेट में ले लेगी ?
Customer का अर्थ - ग्राहक। ग्राहक का अर्थ - सामान या सेवा का खरीददार। लेकिन अब ग्राहक का अर्थ अधिक व्यापक हो गया है। वह व्यक्ति जिससे हम कुछ भी व्यवहार कर रहे हैं - वह हमारा ग्राहक है। Anybody with whom you are in transaction, is your customer. हम उसे सामान बेच रहे हों, सेवा दे रहे हों, विचार दे रहे हों, बातें कर रहे हों - वह व्यक्ति हमारा ग्राहक है। तो, अंतर क्या आया ? पहले, वह व्यक्ति ग्राहक था जो मूल्य देता था लेकिन अब वह व्यक्ति भी ग्राहक है जो आर्थिक लेन-देन से परे हो। सवाल यह है कि ग्राहक शब्द को इतना व्यापक रूप क्यों दे दिया गया ? इसलिए कि ग्राहक वह व्यक्ति होता है जो हमारे सम्मान का स्वाभाविक हकदार हो। ग्राहक और सम्मान एक दूसरे से अन्योन्याश्रित हैं। हम यदि किसी से बात कर रहे हों, सामने कोई भी हो, रिश्ता कोई भी हो, उसे वही सम्मान दिया जाना चाहिए जो ग्राहक को दिया जाता है।
एक घटना याद आ रही है, एक मित्र के विवाह में सम्मिलित होने के लिए मैं कलकत्ता गया था। दक्षिण कलकत्ता में किसी शादी-घर की चौथी मंज़िल में कार्यक्रम आयोजित था। वहाँ 'लिफ्ट' थी, लिफ्ट में एक 'आपरेटर' था, बौने कद का, सिर पर टोपी धारण किए हुए, माथे पर तिलक लगाए हुए, लिफ्ट में घुसने वाले हर व्यक्ति को देखकर मुस्कुराता और कहता- 'जय राम जी की।' सुबह से लेकर शाम तक मैं कई बार उसके लिफ्ट से नीचे-ऊपर हुआ लेकिन उसकी मुस्कुराहट और मधुर व्यवहार में कोई अंतर न दिखा। उसने किसी ने पैसे नहीं मांगे, किसी ने उसे पैसे दिए तो उसने नहीं लिए ! वह अपने काम से प्यार करने वाला इंसान था, वह अपने काम को खुशी से करने वाला इंसान था, वह मिलने वाले हर व्यक्ति को ग्राहक मानता था और उससे वैसा व्यवहार करता था- जैसा एक ग्राहक के साथ किया जाना चाहिए।
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