फेसबुक को गरियाने वालों की कोई कमी नहीं है। उनको कई दोस्त अच्छे नहीं लगते, उनकी बातें अच्छी नहीं लगती, उनका चेहरा पसंद नहीं आता। कुछ इसलिए भड़के रहते हैं कि लोग मेरी पोस्ट को क्यों 'लाइक' नहीं करते या 'कमेन्ट' नहीं करते? कई मित्र कापी-पेस्ट में लगे रहते हैं तो कुछ अपनी दिमागी भड़ास निकालते रहते हैं। कुछ अपनी पोस्ट में हर समय तलवार घुमाते नज़र आते हैं तो कुछ निरंतर उपदेश पेलते रहते हैं। समझ यह आया कि 'फेसबुक' चटपटी चाट की तरह है जिसे स्वादानुसार अपने 'च्वाइस' के अनुरूप दही-खटाई-मिर्ची-नमक बढ़ा-घटा कर मज़ा लिया जा सकता है। आजकल तो पति-पत्नी भी आपस में बोर होने लगे है, भला दोस्ती में कौन से सुर्खाब के पर लगे हैं? किसी से भी 'परमानेंट' संबंध बना कर रखना बिलकुल ज़रूरी नहीं है, जब तक निभे, निभाइए और 'बोर' हो जाइए तो चुपचाप विदा कर दीजिए। क्या नाम है उनका जुकरबर्ग, होशियार आदमी है। वे जानते हैं कि बात-बेबात बिना लड़े-झगड़े कोई रह नहीं सकता इसलिए मिटाओ(Delete)-हटाओ(Unfriend)-सताओ(Block) जैसे विकल्प उन्होंने पहले से ही दे रखे हैं।
दोस्ती में सबकी अपनी-अपनी अपेक्षाएँ और विशेषताएँ होती हैं। अधिकतर लोग दोस्त बनाने और दोस्ती निभाने की कोमल भावनाओ से ओतप्रोत होते हैं, वहीं पर कुछ ऐसे भी होते हैं जो दोस्तों का सिर खाने या उनका शोषण करने के लिए लालायित रहते हैं। सच तो यह है कि दोस्ती का अर्थ व्यापक है, खास तौर से 'फेसबुक' की अवधारणा में, लेकिन यह इतनी आम नहीं होती जितनी सामान्य बातचीत में समझी जाती है। जिसे दोस्ती कहा जाता है, वह दरअसल हमारी जान-पहचान का दायरा है। असल दोस्त तो उंगलियों में गिनने जितने होते हैं।
तीन साल पहले मैं 'फेसबुक' से जुड़ा जिसके सौजन्य से मुझे जान-पहचान के एक ऐसे समूह से जुड़ने का अवसर मिला जिनसे मेरा कोई संपर्क नहीं था। मैंने सहज़ भाव से 'फेसबुक' में भरपूर मित्र बनाए और यह पाया कि दुनिया में कितने सारे प्यारे-प्यारे लोग हैं जिनसे इस माध्यम के कारण मेरी जान-पहचान विकसित हो सकी। इस आभासी दुनिया तरह-तरह के लोग हैं, बहुरंगी हैं, इंद्रधनुष की तरह मनमोहक। इन मित्रों के कारण मैंने लिखना सीखा, आलोचना को सहज़ भाव से लेना सीखा और विविध सामाजिक-मनोवज्ञानिक पहलुओं से वाकिफ भी हुआ। 'फेसबुक' को दिल से धन्यवाद।
चीन के शंघाई शहर में मेरे मित्र आशीष गोरे से मेरी इसी माध्यम से जान-पहचान बनी। 27 सितंबर 2016 को वे एक कार्यक्रम के सिलसिले में बिलासपुर आए और शाम के समय मेरी उनसे मुलाक़ात हुई। इस डेढ़ घंटे की लंबी मुलाक़ात में दो दोस्त मिलकर खूब बतियाये, मेरे मन में आया कि आपको भी इस बात में शामिल कर लूँ।
इतनी दूर से कोई मित्र आया हो तो गले से मिलना अच्छा लगता है. किसी से गले मिलना जैसे कुछ क्षण के लिए एक दूसरे के साथ एकाकार हो जाना है. मैंने आशीष जी से बात शुरू की- 'बिलासपुर कैसे आना हुआ?'
'मैंने बिलासपुर से इंजीनियरिंग की पढ़ाई की थी। अपने कालेज की स्वर्णजयंती समारोह में भाग लेने के लिए मैं एक साल पहले यहाँ आया था तब दूर-दूर से कालेज के पुराने साथी आए थे, हम आपस मे मिले-जुले। खूब भाषण हुए, कहा गया 'सब मिलकर एक-एक हजार देकर एक फंड बनाएँगे और निर्धन छात्रों के लिए स्कालरशिप देंगे', आदि योजनाएँ बनी। व्हाट्स-अप पर ग्रुप बने, किस्से-कहानी और चुटकुलों का आदान-प्रदान हुआ और कुछ नहीं। किसी ने आर्थिक योगदान नहीं दिया, कई बार ज़िक्र किया लेकिन चुप्पी बनी रही। तब मैंने अपने स्तर पर इसे शुरू करने का निर्णय लिया और अपनी आदरणीय माँ रेखा गोरे जी की स्मृति में एक ट्रस्ट बनाकर पाँच छात्रों की शिक्षा की पूरी ज़िम्मेदारी ली। स्कालरशिप के लिए गाँव की पृष्ठभूमि से पाँच योग्य युवकों का चयन किया गया, उनका दूसरा वर्ष चल रहा है। उनसे मिलने बिलासपुर आया हूँ।'
'यह सराहनीय सोच है आपकी। क्या बिलासपुर के हैं?'
'नहीं, मैं रायपुर का हूँ।'
'आपके माता-पिता?'
'पिताजी 1995 में और माँ 2014 में हमें छोड़कर चले गए।'
'उनके बारे मेँ बताइए।'
'मेरे जीवन में पापा मेरे सबसे अच्छे दोस्त थे। मम्मी को नाटकों से बहुत लगाव था, वे अपने जीवन काल में बहुत सक्रिय थी, उन्होंने 27 नाटक खेले।'
'आप चीन में कब से हैं?'
'तीन साल से, उसके पहले जापान में था।'
'हम चीन से क्यों पिछड़ गए? कौन हमारी प्रगति में बाधक है?'
'चीन का 'इन्फ्रा स्ट्रक्चर' हमसे बेहतर है, वहाँ तेज आवागमन की भरपूर सुविधाएं हैं जिसका लाभ वहाँ के व्यापार को मिला। मैं जब अपने देश में नौकरी करता था तो मुझे अक्सर रायपुर से इंदौर जाना होता था, 900 किलोमीटर याने 22 घंटे की यात्रा लेकिन चीन में 900 किलोमीटर की यात्रा में मुझे जब केवल 3 घंटे 59 मिनट लगे तो मैं आश्चर्यचकित रह गया।
वहाँ केवल शहर नहीं, गाँव-गाँव में विभिन्न वस्तुओं का उत्पादन होता है, उत्पादित वस्तुएँ फटाफट आगे बढ़ती हैं और दुनिया के बाज़ार में पहुँच जाती हैं। उन्होंने रेल और हवाई सेवाओं का चौतरफा जाल फैला दिया पूरे देश में, जो वहाँ के व्यापार की रीढ़ की हड्डी बना।'
'हम ऐसा क्यों नहीं कर सकते?'
'हमारा देश 'स्लो-मोशन' में चलता है। भारत की पहली मेट्रो सन 1987 कलकत्ता में शुरू हुई, उसके बाद अगली मेट्रो दिल्ली में प्रारम्भिक रूप में सन 2002 में आई, 15 साल लग गए तब हमारी दूसरी मेट्रो आ सकी! 1987 में ही सिंगापूर और बैंकाक में मेट्रो शुरू हुई, वे कितना आगे बढ़ गए और अपना कलकत्ता वैसे का वैसा रह गया।'
'क्या हमारी आबादी इसका कारण है?'
'चीन की आबादी हमसे 20% अधिक है, वहाँ भी हमारे जैसे गाँव हैं। आबादी वाली बात का कोई मतलब नहीं।
'ऐसा यहाँ क्यों है?'
'यहाँ का रवैय्या ऐसा ही है। मैंने इसीलिए इंजीनियरिंग करने के बाद सरकारी नौकरी नहीं करने का निर्णय लिया जबकि मैं 'गोल्ड मेडलिस्ट' था, आई॰ए॰एस॰ या आई॰ई॰एस॰ भी कर सकता था। कहीं भी आवेदन देता तो मुझे नौकरी आसानी से मिल जाती लेकिन मैं सरकारी कामकाज के तरीके से वाकिफ था। आप तो जानते हैं, नौकरी करना याने किसी की बात सुनना, मैंने सोचा, बात सुनूँ तो किसी काबिल इन्सान की सुनूँ इसीलिए मैंने प्राइवेट नौकरी चुनी।'
'यदि हम आने वाले समय में अपना इन्फ्रा स्ट्रक्चर बढ़ा लेते हैं तो क्या चीन की बराबरी कर लेंगे?'
'संभव नहीं क्योंकि तब तक वे हमसे बहुत आगे बढ़ जाएंगे, हम धीमे चलते हैं, दुनिया बहुत तेजी से आगे बढ़ रही है।'
'आपके हिसाब से गड़बड़ी कहाँ है?'
'हमारे देश के अयोग्य नेता और नौकरशाही।'
'क्या आपने चीन की भाषा सीख ली?'
'नहीं, जब जापान में था तो वहाँ की भाषा सीखिए थी, चीन गया तो वहाँ दोनों भाषाओं की खिचड़ी बन गई। मेरे लिए उन शब्दों को याद रखना कठिन है इसलिए मैं कोशिश नहीं करता। मेरी पत्नी पल्लवी ने वहाँ की भाषा सीख ली है।'
'फिर वहाँ आपका काम कैसे चलता है?'
'मैं एक जर्मन कंपनी Bosch में काम करता हूँ, हम अंग्रेजी भाषा में बात करते हैं, एक अनुवादक, जो अंग्रेजी जानती है वह मेरे साथ रहती है, इस प्रकार काम चलता है। एक बात बताना चाहता हूँ, बिजनेस में भाषा का महत्व नहीं है, Trust का, भरोसे का महत्व है। मैं मारवाड़ी बोल लूँगा, आप बोल लेंगे लेकिन यदि भरोसा नहीं बना तो मारवाड़ी भाषा की जानकारी काम नहीं आएगी।'
'इस बात की अपने यहाँ कमी तो है।'
'हाँ, वहाँ जितना ध्यान सामान की 'क्वालिटी' पर दिया जाता है उतना ही 'पेकिंग' पर भी। पेकिंग अच्छी है लेकिन यदि सामान अच्छा नहीं निकला तो ग्राहक का भरोसा खत्म हो जाएगा। हमारा सामान Trust से जुड़ा हुआ है और भाषा हमारे सामान की पेकिंग जैसी है।'
'वहाँ आप क्या करते हैं?'
'मैं साफ बातें करने वाला आदमी हूँ, इसलिए मुझे नौकरी में बहुत खतरे थे लेकिन जिस कंपनी में मैं काम करता हूँ वह जर्मनी की है, Bosch, जिसमें कोई व्यक्ति Bosch के परिवार का नहीं है जैसा कि अपने यहाँ होता है, टाटा में टाटाज़, रिलायंस में अंबानीज़। यह कंपनी शेयर मार्केट में भी नहीं है। इसी वजह से कई वर्षों से इसी में काम कर रहा हूँ। हम लोग कार के ब्रेक से संबन्धित पार्ट्स बनाते और मार्केटिंग करते हैं। मैं साउथ-ईस्ट एशिया के लिए अपनी कंपनी के प्रमुख के रूप में काम देखता हूँ।'
'अपने देश में और वहाँ की कार्य संस्कृति में क्या अंतर है?'
'हम लोग बहुत 'इमोशनल' हैं, वहाँ ये नहीं चलता। अपने यहाँ सजायाफ्ता से भी लोगों को हमदर्दी होने लगती है जैसे, 'बेचारा जेल में कैसे रहता होगा, कैसे सोता होगा, क्या खाता होगा?' जिसने अपराध किया है और जिसे अदालत से सज़ा मिली, उसे भुगतने दो, उससे कैसी हमदर्दी? हमारे यहाँ अपराधी के जेल से छूटने पर जश्न मनाया जाता है, संजय दत्त को देखिए।
आम तौर पर जापान में भारतीयों को नीची नज़र से देखते हैं। यदि उनके साथ काम करना हो तो उनके जैसा बनना पड़ता है, अपने तौर-तरीके बदलने पड़ते हैं। अपना 'ईगो' छोड़ना पड़ता है, हम भारत-पाकिस्तान के लोगों का ईगो बहुत ज़्यादा है। हम लोग इसीलिए मार खा जाते हैं।'
'ईगो को कैसे दूर किया जाए?'
'रात को सोने से पहले आँखें बंद करके दिन भर का किया हुआ 'रिव्यू' कीजिए, अपना ईगो समझ में आ जाता है, मुश्किल यह है कि हम लोग अपने ईगो को स्वीकार नहीं करते।'
'विदेश यात्राएं बहुत की होंगी आपने?'
'मेरा काम ही ऐसा है, 25-30 बार जर्मनी, 10-12 बार अमेरिका हो आया, दुनिया के लगभग 40 देश घूम चुका हूँ।'
'आप जीवन को किस तरह देखते हैं?'
'हम एक पुल की तरह हैं जिसे पुरानी पीढ़ी को नई पीढ़ी से जोड़ना है। आप यह काम लेखन के माध्यम से कर रहे हैं, हम अपने काम के माध्यम से।' आशीष गोरे ने कहा।
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दोस्ती में सबकी अपनी-अपनी अपेक्षाएँ और विशेषताएँ होती हैं। अधिकतर लोग दोस्त बनाने और दोस्ती निभाने की कोमल भावनाओ से ओतप्रोत होते हैं, वहीं पर कुछ ऐसे भी होते हैं जो दोस्तों का सिर खाने या उनका शोषण करने के लिए लालायित रहते हैं। सच तो यह है कि दोस्ती का अर्थ व्यापक है, खास तौर से 'फेसबुक' की अवधारणा में, लेकिन यह इतनी आम नहीं होती जितनी सामान्य बातचीत में समझी जाती है। जिसे दोस्ती कहा जाता है, वह दरअसल हमारी जान-पहचान का दायरा है। असल दोस्त तो उंगलियों में गिनने जितने होते हैं।
तीन साल पहले मैं 'फेसबुक' से जुड़ा जिसके सौजन्य से मुझे जान-पहचान के एक ऐसे समूह से जुड़ने का अवसर मिला जिनसे मेरा कोई संपर्क नहीं था। मैंने सहज़ भाव से 'फेसबुक' में भरपूर मित्र बनाए और यह पाया कि दुनिया में कितने सारे प्यारे-प्यारे लोग हैं जिनसे इस माध्यम के कारण मेरी जान-पहचान विकसित हो सकी। इस आभासी दुनिया तरह-तरह के लोग हैं, बहुरंगी हैं, इंद्रधनुष की तरह मनमोहक। इन मित्रों के कारण मैंने लिखना सीखा, आलोचना को सहज़ भाव से लेना सीखा और विविध सामाजिक-मनोवज्ञानिक पहलुओं से वाकिफ भी हुआ। 'फेसबुक' को दिल से धन्यवाद।
चीन के शंघाई शहर में मेरे मित्र आशीष गोरे से मेरी इसी माध्यम से जान-पहचान बनी। 27 सितंबर 2016 को वे एक कार्यक्रम के सिलसिले में बिलासपुर आए और शाम के समय मेरी उनसे मुलाक़ात हुई। इस डेढ़ घंटे की लंबी मुलाक़ात में दो दोस्त मिलकर खूब बतियाये, मेरे मन में आया कि आपको भी इस बात में शामिल कर लूँ।
इतनी दूर से कोई मित्र आया हो तो गले से मिलना अच्छा लगता है. किसी से गले मिलना जैसे कुछ क्षण के लिए एक दूसरे के साथ एकाकार हो जाना है. मैंने आशीष जी से बात शुरू की- 'बिलासपुर कैसे आना हुआ?'
'मैंने बिलासपुर से इंजीनियरिंग की पढ़ाई की थी। अपने कालेज की स्वर्णजयंती समारोह में भाग लेने के लिए मैं एक साल पहले यहाँ आया था तब दूर-दूर से कालेज के पुराने साथी आए थे, हम आपस मे मिले-जुले। खूब भाषण हुए, कहा गया 'सब मिलकर एक-एक हजार देकर एक फंड बनाएँगे और निर्धन छात्रों के लिए स्कालरशिप देंगे', आदि योजनाएँ बनी। व्हाट्स-अप पर ग्रुप बने, किस्से-कहानी और चुटकुलों का आदान-प्रदान हुआ और कुछ नहीं। किसी ने आर्थिक योगदान नहीं दिया, कई बार ज़िक्र किया लेकिन चुप्पी बनी रही। तब मैंने अपने स्तर पर इसे शुरू करने का निर्णय लिया और अपनी आदरणीय माँ रेखा गोरे जी की स्मृति में एक ट्रस्ट बनाकर पाँच छात्रों की शिक्षा की पूरी ज़िम्मेदारी ली। स्कालरशिप के लिए गाँव की पृष्ठभूमि से पाँच योग्य युवकों का चयन किया गया, उनका दूसरा वर्ष चल रहा है। उनसे मिलने बिलासपुर आया हूँ।'
'यह सराहनीय सोच है आपकी। क्या बिलासपुर के हैं?'
'नहीं, मैं रायपुर का हूँ।'
'आपके माता-पिता?'
'पिताजी 1995 में और माँ 2014 में हमें छोड़कर चले गए।'
'उनके बारे मेँ बताइए।'
'मेरे जीवन में पापा मेरे सबसे अच्छे दोस्त थे। मम्मी को नाटकों से बहुत लगाव था, वे अपने जीवन काल में बहुत सक्रिय थी, उन्होंने 27 नाटक खेले।'
'आप चीन में कब से हैं?'
'तीन साल से, उसके पहले जापान में था।'
'हम चीन से क्यों पिछड़ गए? कौन हमारी प्रगति में बाधक है?'
'चीन का 'इन्फ्रा स्ट्रक्चर' हमसे बेहतर है, वहाँ तेज आवागमन की भरपूर सुविधाएं हैं जिसका लाभ वहाँ के व्यापार को मिला। मैं जब अपने देश में नौकरी करता था तो मुझे अक्सर रायपुर से इंदौर जाना होता था, 900 किलोमीटर याने 22 घंटे की यात्रा लेकिन चीन में 900 किलोमीटर की यात्रा में मुझे जब केवल 3 घंटे 59 मिनट लगे तो मैं आश्चर्यचकित रह गया।
वहाँ केवल शहर नहीं, गाँव-गाँव में विभिन्न वस्तुओं का उत्पादन होता है, उत्पादित वस्तुएँ फटाफट आगे बढ़ती हैं और दुनिया के बाज़ार में पहुँच जाती हैं। उन्होंने रेल और हवाई सेवाओं का चौतरफा जाल फैला दिया पूरे देश में, जो वहाँ के व्यापार की रीढ़ की हड्डी बना।'
'हम ऐसा क्यों नहीं कर सकते?'
'हमारा देश 'स्लो-मोशन' में चलता है। भारत की पहली मेट्रो सन 1987 कलकत्ता में शुरू हुई, उसके बाद अगली मेट्रो दिल्ली में प्रारम्भिक रूप में सन 2002 में आई, 15 साल लग गए तब हमारी दूसरी मेट्रो आ सकी! 1987 में ही सिंगापूर और बैंकाक में मेट्रो शुरू हुई, वे कितना आगे बढ़ गए और अपना कलकत्ता वैसे का वैसा रह गया।'
'क्या हमारी आबादी इसका कारण है?'
'चीन की आबादी हमसे 20% अधिक है, वहाँ भी हमारे जैसे गाँव हैं। आबादी वाली बात का कोई मतलब नहीं।
'ऐसा यहाँ क्यों है?'
'यहाँ का रवैय्या ऐसा ही है। मैंने इसीलिए इंजीनियरिंग करने के बाद सरकारी नौकरी नहीं करने का निर्णय लिया जबकि मैं 'गोल्ड मेडलिस्ट' था, आई॰ए॰एस॰ या आई॰ई॰एस॰ भी कर सकता था। कहीं भी आवेदन देता तो मुझे नौकरी आसानी से मिल जाती लेकिन मैं सरकारी कामकाज के तरीके से वाकिफ था। आप तो जानते हैं, नौकरी करना याने किसी की बात सुनना, मैंने सोचा, बात सुनूँ तो किसी काबिल इन्सान की सुनूँ इसीलिए मैंने प्राइवेट नौकरी चुनी।'
'यदि हम आने वाले समय में अपना इन्फ्रा स्ट्रक्चर बढ़ा लेते हैं तो क्या चीन की बराबरी कर लेंगे?'
'संभव नहीं क्योंकि तब तक वे हमसे बहुत आगे बढ़ जाएंगे, हम धीमे चलते हैं, दुनिया बहुत तेजी से आगे बढ़ रही है।'
'आपके हिसाब से गड़बड़ी कहाँ है?'
'हमारे देश के अयोग्य नेता और नौकरशाही।'
'क्या आपने चीन की भाषा सीख ली?'
'नहीं, जब जापान में था तो वहाँ की भाषा सीखिए थी, चीन गया तो वहाँ दोनों भाषाओं की खिचड़ी बन गई। मेरे लिए उन शब्दों को याद रखना कठिन है इसलिए मैं कोशिश नहीं करता। मेरी पत्नी पल्लवी ने वहाँ की भाषा सीख ली है।'
'फिर वहाँ आपका काम कैसे चलता है?'
'मैं एक जर्मन कंपनी Bosch में काम करता हूँ, हम अंग्रेजी भाषा में बात करते हैं, एक अनुवादक, जो अंग्रेजी जानती है वह मेरे साथ रहती है, इस प्रकार काम चलता है। एक बात बताना चाहता हूँ, बिजनेस में भाषा का महत्व नहीं है, Trust का, भरोसे का महत्व है। मैं मारवाड़ी बोल लूँगा, आप बोल लेंगे लेकिन यदि भरोसा नहीं बना तो मारवाड़ी भाषा की जानकारी काम नहीं आएगी।'
'इस बात की अपने यहाँ कमी तो है।'
'हाँ, वहाँ जितना ध्यान सामान की 'क्वालिटी' पर दिया जाता है उतना ही 'पेकिंग' पर भी। पेकिंग अच्छी है लेकिन यदि सामान अच्छा नहीं निकला तो ग्राहक का भरोसा खत्म हो जाएगा। हमारा सामान Trust से जुड़ा हुआ है और भाषा हमारे सामान की पेकिंग जैसी है।'
'वहाँ आप क्या करते हैं?'
'मैं साफ बातें करने वाला आदमी हूँ, इसलिए मुझे नौकरी में बहुत खतरे थे लेकिन जिस कंपनी में मैं काम करता हूँ वह जर्मनी की है, Bosch, जिसमें कोई व्यक्ति Bosch के परिवार का नहीं है जैसा कि अपने यहाँ होता है, टाटा में टाटाज़, रिलायंस में अंबानीज़। यह कंपनी शेयर मार्केट में भी नहीं है। इसी वजह से कई वर्षों से इसी में काम कर रहा हूँ। हम लोग कार के ब्रेक से संबन्धित पार्ट्स बनाते और मार्केटिंग करते हैं। मैं साउथ-ईस्ट एशिया के लिए अपनी कंपनी के प्रमुख के रूप में काम देखता हूँ।'
'अपने देश में और वहाँ की कार्य संस्कृति में क्या अंतर है?'
'हम लोग बहुत 'इमोशनल' हैं, वहाँ ये नहीं चलता। अपने यहाँ सजायाफ्ता से भी लोगों को हमदर्दी होने लगती है जैसे, 'बेचारा जेल में कैसे रहता होगा, कैसे सोता होगा, क्या खाता होगा?' जिसने अपराध किया है और जिसे अदालत से सज़ा मिली, उसे भुगतने दो, उससे कैसी हमदर्दी? हमारे यहाँ अपराधी के जेल से छूटने पर जश्न मनाया जाता है, संजय दत्त को देखिए।
आम तौर पर जापान में भारतीयों को नीची नज़र से देखते हैं। यदि उनके साथ काम करना हो तो उनके जैसा बनना पड़ता है, अपने तौर-तरीके बदलने पड़ते हैं। अपना 'ईगो' छोड़ना पड़ता है, हम भारत-पाकिस्तान के लोगों का ईगो बहुत ज़्यादा है। हम लोग इसीलिए मार खा जाते हैं।'
'ईगो को कैसे दूर किया जाए?'
'रात को सोने से पहले आँखें बंद करके दिन भर का किया हुआ 'रिव्यू' कीजिए, अपना ईगो समझ में आ जाता है, मुश्किल यह है कि हम लोग अपने ईगो को स्वीकार नहीं करते।'
'विदेश यात्राएं बहुत की होंगी आपने?'
'मेरा काम ही ऐसा है, 25-30 बार जर्मनी, 10-12 बार अमेरिका हो आया, दुनिया के लगभग 40 देश घूम चुका हूँ।'
'आप जीवन को किस तरह देखते हैं?'
'हम एक पुल की तरह हैं जिसे पुरानी पीढ़ी को नई पीढ़ी से जोड़ना है। आप यह काम लेखन के माध्यम से कर रहे हैं, हम अपने काम के माध्यम से।' आशीष गोरे ने कहा।
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