Monday, 19 August 2019

अब ग्राहक आपकी मुट्ठी में

दस वर्ष की उम्र से मैंने दूकानदारी की और आज भी कर रहा हूँ, लाखों किस्म के ग्राहक मिले, सबको संतुष्ट करना तो संभव न हो सका लेकिन मैंने अनुभव किया कि ग्राहकों को साधना कोई कठिन काम नहीं है। दूकान में आनेवाला प्रत्येक व्यक्ति व्यापार की प्राणवायु होता है। वह सामान खरीदे-न-खरीदे, लेकिन यदि वह आपसे या आपके सामान से प्रभावित है तो आपका ग्राहक है। आज नहीं तो कल आएगा, वह नहीं तो उसकी संतान आएगी। दूकानदार की मेहनत कभी निष्फल नहीं जाती। विक्रेता ग्राहक की समस्या का समाधान करने वाला सहायक होता है। जिस प्रकार माल बेचना दूकानदार की समस्या होती है उसी प्रकार सामान खरीदना भी ग्राहक की समस्या होती है। सफल वही होता है जो ग्राहक की समस्या को समझता है, उसकी समस्या के समाधान में मदद करता है। 

वह दूकानदार जो जो ग्राहक को अपने द्वार पर आया अन्नदाता समझता है, वह शिष्टाचार और सेवा देने में कभी नहीं चूकता। असल संकट तब आता है जब दूकानदार उसे ग्राहक नहीं, 'अलगरजू' समझता है। यह दोनों हाथ से ताली बजाने जैसा है, दोनों की गरज होती है, लेकिन ऐंठबाज़ लोग ऐंठ दिखाकर अपना धंधा तो खराब करते ही हैं- माहौल को भी खराब कर देते हैं।
          
उदाहरण के लिए, मैं उन बैंकों का ज़िक्र कर रहा हूँ जिनसे मैंने विगत 40-50 वर्षों से लेन-देन किया है। भारतीय स्टेट बैंक, सेंट्रल बैंक, पंजाब नेशनल बैंक, सिंडीकेट बैंक और बैंक ऑफ बड़ौदा- ये सब राष्ट्रीयकृत बैंक हैं, इनमें मेरे खाते हैं या थे। इस बैंकों के मेरे अनुभव इतने सारे हैं कि उनकी सहायता से एक ग्रंथ तैयार हो जाएगा ! ग्रंथ में थोड़ा सा प्रशंसा योग्य होगा लेकिन ज़्यादातर दुखदायक घटनाएँ होगी। ऐसा क्यों ?
         
'सेल्समेनशिप' का मूल सिद्धान्त यह है कि ग्राहक की ज़रूरत का पता करो और उसकी आपूर्ति की व्यवस्था करो। जैसे ठंड में चाय और गर्मी में लस्सी। मंदिर के पास नारियल-फूल तो मरघट के पास कफन-लकड़ी। ये बातें तो सब समझ जाते हैं लेकिन जो दूरदर्शी होते हैं वे भविष्य में उत्पन्न होने वाली जरूरतों का भी अनुमान लगा लेते हैं या नई ज़रूरत विकसित कर देते हैं। उदाहरण के लिए, सन 1960 तक प्लास्टिक और टेरेलिन के बारे में किसी को कुछ पता न था लेकिन धीरू भाई अंबानी ने इसके संभावित बाज़ार का अनुमान लगाया और लाइसेन्स का 'जुगाड़' करके विदेश से आयात किया और देश में इसके उपयोग को प्रचारित किया। शुरू-शुरू में इन्हें स्वीकार करने में लोगों को बहुत हिचक थी, बहुत दुष्प्रचार हुआ लेकिन आज प्लास्टिक और टेरीन के उपयोग से आप कैसे बच सकते हैं ! इसे कहते हैं, व्यापार की दूरदृष्टि
          
'सेल्समेनशिप' पर उद्यमियों और व्यापारियों के लिए आयोजित प्रशिक्षण कार्यक्रम में मैं अपने 'प्रेजेंटेशन' की शुरुआत इस प्रश्न से किया करता हूँ :
'आपका व्यापार करने का उद्देश्य क्या है ?'
'धन कमाना।' हमेशा यही उत्तर आया।
यदि मैं आपसे यह प्रश्न करूँ तो आपका भी यही जवाब होगा, चाहे आप व्यापार करते हों या 'सर्विस'!'
          
यही बहुत बड़ी चूक है क्योंकि यह उत्तर आधा सही है और आधा सही नहीं है। निश्चित रूप से हमें अपने श्रम, हुनर और समय का प्रतिफल चाहिए लेकिन आप इसमें थोड़ा सा 'ट्विस्ट' पैदा करें और यह जवाब दें- 'मैं व्यापार या नौकरी अपने मज़े के लिए करता हूँ, आनंद के लिए करता हूँ।' > मित्र, बात बदल गई, आपका काम करने का तरीका बदल गया, आपका व्यवहार बदल गया, आप बदल गए !
          
आप व्यापार करते हैं या नौकरी, आपका ध्यान अपने काम को सर्वश्रेष्ठ ढंग से करने की ओर होना चाहिए। अपना 100% दें। व्यापार करें तो इस ढंग से, कि ग्राहक आपकी चर्चा दस लोगों से करे और आपके गुण गाए। नौकरी करें तो ऐसी कि आपके वरिष्ठ, आपके सहयोगी और आपके अधीनस्थ आपके स्थानांतरण पर अफसोस करें और आपको काम को ज़िंदगी भर याद करें। धन तो दरवाजा तोड़ कर आता है। धन आपके परिश्रम, प्रयास और बुद्धि का 'स्वाभाविक प्रतिफल' है।
          
जैसे चील की नज़र मांस पर होती है वैसे ही सफल दूकानदार की नज़र ग्राहक की जेब पर होती है। जब धन आता दिखाई पड़े तो ग्राहक की बदतमीजी से 'इरिटेट' नहीं होना चाहिए, बल्कि उसे प्यार से अपनी बोतल में उतारकर ढक्कन बंद कर देना- कुशल दूकानदार के लक्षण हैं। दुधारू गाय की लात सहना पड़ती है ! घर में पति-पत्नी एक दूसरे को सहते हैं कि नहीं ?

          
व्यापार से धन कमाना और धन कमाने के लिए व्यापार करना- इन दोनों बातों में फर्क है। व्यापार सीखने के लिए किसी सिन्धी या पंजाबी या मारवाड़ी को अपना गुरु बनाएँ, उनको आधुनिक बच्चों को नहीं, उन्हें बनाएँ जो पैतृक जमीन-घर छोड़कर अपना जीवनयापन करने के लिए भारत में दूर-सुदूर पहुँचे और ABC से अपने व्यापार की शुरुआत की। वे कैसे शुरु हुए, कैसे बढ़े, कैसे टिके और कैसे अपना साम्राज्य स्थापित किया- वे अनुभव उन बुजुर्गों से सुनें तो आपको ज्ञात होगा कि कैसे उन्होंने बूंद-बूंद से समुद्र भरा और अपनी व्यापार की नीव को किस तरह मजबूत बनाई !

एक नामी-गिरामी फायनेंस कंपनी ने मुझे अपने 'स्टाफ' को प्रशिक्षण देने के लिए रायपुर बुलाया। लगभग अस्सी 'मार्केटिंग एक्सीक्यूटिव' ( 'सेल्समेन' का आधुनिक नामकरण ) उपस्थित थे, साथ में कुछ अधिकारीगण भी। पहले सत्र में तीन घंटे तक 'मोटिवेशन' विषय पर चर्चा हुई और भोजन के उपरांत 'काउंसिलिंग' का सत्र हुआ। 'काउंसिलिंग' के दौरान प्रतिभागी अपनी व्यक्तिगत समस्याओं के समाधान पूछ रहे थे। उनमें से एक चर्चा आपको बताना चाहता हूँ :
'सर, मैं बहुत परेशान हूँ, सर।' प्रतिभागी ने कहा।
'कहिए?' मैंने पूछा।
'हमारी कंपनी हर महीने हमें 'बिजनेस टार्गेट' देती है जिसे 'अचीव' करना बहुत कठिन रहता है।'
'काम तो करना पड़ेगा, तब तो तनख्वाह मिलेगी।'
'वह बात नहीं है सर, हमें तनख्वाह और 'कमीशन' दोनों मिलता है।'
'अरे वाह, फिर क्या समस्या है ?'
'हमारी कंपनी की ब्याज दर अन्य कंपनियों और बैंकों के मुक़ाबले अधिक है, ग्राहक को समझाने में बहुत मुश्किल होती है।'
'फिर?'
'हमारा टार्गेट इतना अधिक रहता है कि छोटे-मोटे 'केसेज़' तो हम लोग छूते नहीं, 'जेबीसी', ट्रक या ट्रेक्टर वालों को पकड़ते हैं।'
'ठीक है, फिर ग्राहक को कैसे समझाते हो ?'
'सर, ग्राहक को बताने के लिए हमने कुछ अन्य कंपनियों और बैंको के 'बोगस फोल्डर' तैयार करवा लिए हैं जिनमें उनकी ब्याज दर से हमारी ब्याज दर 
से अधिक प्रिंट करवा ली है और उसे दिखाकर ग्राहक को समझाते हैं कि हमारे 'रेट' दूसरों से कम है।'

'ये तो बेईमानी है।'
'क्या करें, बिजनेस के लिए करना पड़ता है।'
'कल के दिन ग्राहक को मालूम पड़ा तो ?'
'पड़ता रहे, हमें बिजनेस मिल गया, फायनेंस हो गया, उसके बाद ग्राहक हमारा क्या बिगाड़ेगा ?'
'धोखाधड़ी की शिकायत कर सकता है।'
'ऐसे कैसे करेगा ? बैंक वाला फोल्डर उसको दिखाते भर हैं, देते कभी नहीं।'
'ओह, तो आपको परेशानी क्या है ?'
'बहुत दिल दुखता है सर, आत्मा धिक्कारती है, रात को नींद नहीं आती।'
'फिर'?
'आप बताइए सर, क्या करूँ ?'
'आत्मा धिक्कार रही है तो यह काम छोड़ दीजिए, कुछ और कीजिए।'
'अच्छी सलाह दे रहे हैं आप, ऐसे में मैं भूखे मर जाऊंगा !'
'ईमानदारी से काम करने वाला भूखा नहीं मरता, मेरे भाई।'
'कैसा करूँ ?'
'अपनी आत्मा और अपनी बुद्धि में वार्तालाप चलने दीजिए, कुछ-न-कुछ निष्कर्ष निकलेगा।' मैंने कहा।

पैसा कमाने की होड़ ने हमें पागल कर दिया है, अमानवीय बना दिया है। धन कमाना और उसे बढ़ाना- प्रशंसनीय है लेकिन इसके लिए छल-बल, प्रपंच, बेईमानी, घूसख़ोरी कतई ज़रूरी नहीं, ये सब कमाई के 'शार्टकट' हैं जिसे केवल आलसी लोग अपनाते हैं। मेहनत करने वाला अपनी बुद्धि-चातुर्य और परिश्रम से, अपना सीना तान कर ईमानदारी से अपना व्यापार बढ़ाता है, आय बढ़ाता है, धनोपार्जन करता है और साथ-ही-साथ अपने व्यक्तित्व का विकास भी करता है।
          
किसी भी तरह पैसा कमाने की अंधी दौड़ में कितने-कितने धराशायी हो गए जिनको कोई नहीं जानता। सफलता तो इक्के-दुक्के को मिलती है। सचिन तेंदुलकर का उदाहरण करोड़ों को क्रिकेट के मैदान में उतार सकता है लेकिन उन्हें 'सचिन' नहीं बना सकता क्योंकि 'सचिन' बनना 'शार्टकट' प्रयास नहीं था, उसने अपना बचपन, अपनी जवानी, अपनी ज़िंदगी झोंक दी- तब सचिन तेंदुलकर बना। लोग हवा में बल्ला घुमाकर सचिन बनना चाहते है।
          
सफलता के लिए हड़बड़ी करने वाले अक्सर निराश होते हैं। 'शार्टकट' से आई सफलता की उम्र 'शार्ट' होती है। धीरे-धीरे आगे बढ़ें। हड़बड़ी में पैर फिसलने की संभावना रहती है। सफल तो सबको दिखाई पड़ते हैं लेकिन हड़बड़ी के चक्कर में कितने निपट गए, इसे कोई नहीं जानता। जिन्होंने दिल लगाकर व्यापार किया, अपनी सम्पूर्ण ऊर्जा झोंक दी, वे समय आने पर सफल हुए और भरपूर पैसे कमाए।
          
कुछ अपवादों को छोड़ दें तो व्यापार में बेईमानी और मुनाफ़ाखोरी इस कदर बढ़ गई है कि व्यापारी मनुष्य के बदले राक्षस दिखाई पड़ता है। पैसा कमाना, बहुत सा पैसा कमाना और किसी भी तरह कमाना- किसी संक्रामक रोग की तरह बढ़ चुका है। जो जितना अधिक कमा लेता है, उसकी भूख उतनी अधिक बढ़ती जाती है। नीति और अनीति से कमाए गए धन का अंतर विलुप्त हो गया है, समाज में 'कमाए गए धन' का प्रतिष्ठा स्थापित हो गई है।
          
यही हाल सरकारी और अर्द्ध-सरकारी संस्थानों का हो गया है। इन संस्थानों में काम को टालने की महारत इसलिए हासिल की जाती है कि वह अनधिकृत वसूली का माध्यम बने। वे लोग जो इन संस्थानों में नैतिक आदर्शों से जुड़कर आए हैं, ईमानदारी से काम करते हैं या काम करवाना चाहते हैं, वे अपने कार्यालय के माहौल से हतप्रभ हैं। बेचारे, अपनी ईमानदारी के कारण अपने घर में अलग डांट खा रहे हैं ! प्रश्न यह है कि व्यापार और नौकरी में ईमानदारी और परिश्रम से काम करने वाले कब तक टिक पाएँगे ? क्या प्रचलित व्यवस्था उन्हें भी अपने चपेट में ले लेगी ?
          
Customer का अर्थ - ग्राहक। ग्राहक का अर्थ - सामान या सेवा का खरीददार। लेकिन अब ग्राहक का अर्थ अधिक व्यापक हो गया है। वह व्यक्ति जिससे हम कुछ भी व्यवहार कर रहे हैं - वह हमारा ग्राहक है। Anybody with whom you are in transaction, is your customer. हम उसे सामान बेच रहे हों, सेवा दे रहे हों, विचार दे रहे हों, बातें कर रहे हों - वह व्यक्ति हमारा ग्राहक है। तो, अंतर क्या आया ? पहले, वह व्यक्ति ग्राहक था जो मूल्य देता था लेकिन अब वह व्यक्ति भी ग्राहक है जो आर्थिक लेन-देन से परे हो। सवाल यह है कि ग्राहक शब्द को इतना व्यापक रूप क्यों दे दिया गया ? इसलिए कि ग्राहक वह व्यक्ति होता है जो हमारे सम्मान का स्वाभाविक हकदार हो। ग्राहक और सम्मान एक दूसरे से अन्योन्याश्रित हैं। हम यदि किसी से बात कर रहे हों, सामने कोई भी हो, रिश्ता कोई भी हो, उसे वही सम्मान दिया जाना चाहिए जो ग्राहक को दिया जाता है।

          
एक घटना याद आ रही है, एक मित्र के विवाह में सम्मिलित होने के लिए मैं कलकत्ता गया था। दक्षिण कलकत्ता में किसी शादी-घर की चौथी मंज़िल में कार्यक्रम आयोजित था। वहाँ 'लिफ्ट' थी, लिफ्ट में एक 'आपरेटर' था, बौने कद का, सिर पर टोपी धारण किए हुए, माथे पर तिलक लगाए हुए, लिफ्ट में घुसने वाले हर व्यक्ति को देखकर मुस्कुराता और कहता- 'जय राम जी की।' सुबह से लेकर शाम तक मैं कई बार उसके लिफ्ट से नीचे-ऊपर हुआ लेकिन उसकी मुस्कुराहट और मधुर व्यवहार में कोई अंतर न दिखा। उसने किसी ने पैसे नहीं मांगे, किसी ने उसे पैसे दिए तो उसने नहीं लिए ! वह अपने काम से प्यार करने वाला इंसान था, वह अपने काम को खुशी से करने वाला इंसान था, वह मिलने वाले हर व्यक्ति को ग्राहक मानता था और उससे वैसा व्यवहार करता था- जैसा एक ग्राहक के साथ किया जाना चाहिए।

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Thursday, 14 February 2019

साहित्यकार : महावीर प्रसाद द्विवेदी

हिन्दी आज जिस परिष्कृत रूप में बोली और लिखी जाती है उसका बहुत कुछ श्रेय आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी को है। वे युगदृष्टा थे, वे जानते थे कि कोई देश एक राष्ट्रभाषा के बिना तो भावनात्मक एकता प्राप्त कर सकता है और शिक्षा तथा संस्कृति की दृष्टि से सम्पन्न ही बन सकता है। उन दिनों भारत की अनेक भाषाओं की तरह हिन्दी भी एक सामान्य भाषा थी, उसमें राष्ट्रीयभाषा के उपयुक्त प्रखरता उत्पन्न हो पाई थी, इस कमी को पूरा करना आवश्यक था। भारत में अँग्रेजी शासन था पर यह बात दिन-दिन स्पष्ट होती जा रही थी कि भारत आज नहीं तो कल राजनैतिक स्वतन्त्रता प्राप्त करेगा, तब सबसे पहली आवश्यकता एक समृद्ध राष्ट्रभाषा की पड़ेगी. यह गुण केवल हिन्दी में था लेकिन उसके प्रखरता प्राप्त करने में अभी लम्बी यात्रा पूरी करनी थी। द्विवेदी जी राष्ट्र की इस महत्वपूर्ण आवश्यकता को पूर्ण करने के लिए एक चतुर शिल्पी की तरह आजीवन उसी व्रत को पूरा करने में एक कर्मठ व्यक्ति की तरह उत्साह के साथ संलग्न रहे।
उत्तर प्रदेश में रायबरेली जिले के दौलतपुर ग्राम में उनका जन्म हुआ। पढ़ाई का कोई प्रबन्ध उनके गाँव में था। आटा और दाल अपनी पीठ पर लाद कर दूर के गाँवों में जहाँ स्कूल थे वहाँ पढ़ने जाते। उन्हें रोटी बनाना नहीं आता था इसलिए दाल में आटे की टिकिया पकाकर अपनी भूख शांत करते और शिक्षा की साधना में लगे रहते। इस प्रकार पुरवा, फतेहपुर, उन्नाव की स्कूलों में उन्होंने चार वर्ष काटे। घर की आर्थिक दुरावस्था ने आगे पढ़ने की सम्भावना नष्ट कर दी और असमय स्कूली शिक्षा समाप्त हो गई. गुजारे के लिए उन्हें रेलवे में नौकरी करनी पड़ी।

परिश्रम और अध्यवसाय से वे अपनी योग्यता बढ़ाते रहे। प्रतिभा के साथ-साथ उनका वेतन और पद भी बढ़ता गया।सिगनेलर, टिकटबाबू, मालबाबू, स्टेशनमास्टर, प्लेटियर, टेलीग्राम इन्सपेक्टर, चीफ क्लर्क ये छोटे बड़े पदों पर उन्होंने सन1903 तक काम किया लेकिन उनका अन्तःकरण यही कहता रहा कि पेट भरने मात्र से सन्तुष्ट नहीं रहना चाहिए, समाज के लिए कुछ रचनात्मक काम किए बिना कोई प्रगतिशील आत्मा सन्तुष्ट नहीं हो सकती। उनकी आत्मा ने विद्रोह कर दिया और उन्हें नौकरी छोड़कर रचनात्मक काम करने के लिये अग्रसर कर दिया। वे निरंतर साहित्य साधना करते रहे क्योंकि वे मातृ-भाषा की सेवा करना चाहते थे। शीघ्र ही उनका अभीष्ट माध्यम मिल गया और वे इलाहाबाद की सुप्रसिद्ध मासिक पत्रिकासरस्वतीके सम्पादन का कार्य मिल गया।
द्विवेदी जी बड़ा काम करना चाहते थे, इसलिए व्यक्तिगत जीवन में संयम और सादगी अपनाते हुए बची हुई शक्तियों को लोकहित में समर्पित करते रहे। प्राचीन काल के ऋषियों की तरह उन्होंने गरीबी का जीवन बिताते हुए लोक मंगल के लिए सच्ची तपश्चर्या करने में लगे रहे। सरस्वती के सम्पादन कार्य में उन्हें हर महीने 20/- वेतन और 3/- डाक खर्च = कुल 23/- मिलते थे जबकि रेलवे की नौकरी में उन्हें अधिक वेतन मिलता था. वे कहा करते- 'मुझ जैसे मितव्ययी देहाती के लिए यह भी क्या कम है ?'
सरस्वती में छपी प्रत्येक रचना, साहित्यिक दृष्टि से सब प्रकार खरी और परिष्कृत मानी जाती थी। दूसरों के लिखे को मनोचित और परिष्कृत किया करते थे साथ ही सबसे बड़ा काम यह किया है कि अगणित नवोदित लेखकों को मार्ग दर्शन एवं प्रोत्साहन देकर उन्हें आगे बढाया। जिस तरह पारस को छूकर लोहा सोना बनता है उसी प्रकार द्विवेदी जी के संपर्क में जो आया वह भी सोना बन गया। उन्होंने अठारह वर्षों तक 'सरस्वती' का सम्पादन किया। अवकाश ग्रहण करने के बाद भी वे नियमित रूप से लेखन-कार्य करते रहे। अपनी स्वयं  की रचनायें लिखने की अपेक्षा उनका प्रधान कार्य दूसरों की कृतियों को परिष्कृत कर उन्हें उत्कृष्ट बनाना रहता था। वे लेखकों को यह बताया करते थे कि उनसे कहाँ भूल हुई, क्या कमी रही, ओर किन बातों का समावेश आवश्यक था।
मध्य-युग की परम्परा का अनुसार उन दिनों भी श्रंगारिक कविताओं और कवियों का बाहुल्य था। ऐसे लोगों का वे सदा निरुत्साहित करते रहे और उस प्रवृत्ति को राष्ट्र-निर्माण के लिये अनुपयुक्त बताकर उससे दूर रहने की शिक्षा देते रहे। उन्होंने ऐसे कवियों से कहा- 'चींटी से लेकर हाथी तक पशु, भिक्षुक से लेकर राजा तक मनुष्य, बिन्दु से लेकर समुद्र, अनन्त आकाश, पृथ्वी, पर्वत सभी पर कवितायें हो सकती हैं फिर क्या कारण है कि इन विषयों को छोड़कर कवि स्त्रियों की काम-चेष्टाओं के वर्णन को कविता समझे ?”
आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के बारे में यह विवरण आपको मैंने इसलिए बताया क्योंकि विगत दिनों आचार्यजी की हस्तलिखित दो चिट्ठियाँ मेरे हाथ लगी। 89 वर्ष पूर्व लिखे गए ये अमूल्य दस्तावेज़ अम्बिकापुर में कुटुंब न्यायालय में पदस्थ न्यायाधीश श्री शैलेश तिवारी के पास सुरक्षित हैं। उन्होंने ये धरोहर-पत्र जब मुझे दिखाए तो मैंने कांपते हाथों से उन पत्रों को उठाया, अपने माथे से लगाया और प्रणाम किया। इन अभूतपूर्व ऐतिहासिक पत्रों में जो लिखा है, वह तो और भी आश्चर्यजनक है।
श्री शैलेश तिवारी के दादा गणेशप्रसाद विवाह-योग्य थे। उनके दादा के पिता ठाकुर प्रसाद तिवारी की आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी से पुरानी रिश्तेदारी थी। द्विवेदी जी से किसी अच्छी जगह रिश्ता बताने का अनुरोध किया गया था जिसके उत्तर में यह पत्र लिखकर द्विवेदी जी ने जो जानकारी दी और आवश्यक निर्देश दिए, इसे पढ़िये :

दौलतपुर रायबरेली 
फरवरी २८ 

श्री पंडित ठाकुर प्रसाद तिवारी को नमस्कार
आपकी लड़की गिरजा ने यहाँ राधादेवी से बहुत कहा था कि वह कहीं गणेशप्रसाद की शादी लगा दे। तब से वह इस फिक्र में बराबर रही। उसने अपने पिता पंडित कालिकाप्रसाद दुबे को भी इस विषय में पत्र लिखा था। उन्होंने बड़ी कृपा करके अपने सगे भाई पं॰ रघुबरदयाल दुबे की पोती के साथ गणेश की शादी करा देने का विचार किया है। ये लोग जैराजमऊ के दुबे (मेरी ही तरह) उपमन्यु गोत्री हैं। रहने वाले जिले हरदोई में बिलग्राम नाम के मशहूर कस्बे के हैं। पं॰ रघुबर दयाल यहीं अपने मकान में रहते हैं और वकालत करते हैं।  
रघुबरदयाल की पोती की उम्र कोई १६ साल की है। हाथ पैर नाक कान से दुरुस्त है। तंदरुस्त है हिन्दी पढ़ी हुई है। नाम काश्मीरो है। ये लोग बड़े सज्जन हैं। चूंकि आप इस तरफ शादी ब्याह करते आये हैं इस कारण इससे अच्छा सम्बन्ध मिलना कठिन है। आपका जी चाहे तो फौरन मंजूर कर लीजिये। अपनी वह फटी हुई ज्योतिष की पोथी खोलकर बैठ जाना। ऐसे विचार में कुछ सार नहीं है। मैंने कभी ऐसे विचार किये पंडित कालिकाप्रसाद ने किये। अच्छा सम्बन्ध बड़े भाग्य से मिलता है। अगर बिलग्राम से कोई चिट्ठी आपके पास आई हो तो उसके जवाब में फौरन अपनी मंजूरी लिख भेजना और यह लिख देना कि जो कुछ पंडित कालिकाप्रसाद देंगे या दिला देंगे वह आप धन्यवादपूर्वक स्वीकार कर लेंगे। किसी तरह की अप्रसन्नता प्रकट करेंगे। चिट्ठी का जवाब गणेशप्रसाद से लिखाओ। चिट्ठी आपकी तरफ से हो, लिखे वो क्योंकि वे अच्छी हिन्दी लिख सकते हैं आपकी लिखावट शायद अच्छी तरह पढ़ी जाय। अगर बिलग्राम से चिट्ठी आवे तो आप मेरी इस चिट्ठी का हवाला देकर अपनी मंजूरी पंडित कालिकाप्रसाद दुबे को लिख भेजना। उनका पता है- राधास्वामी सत्संग चौक गंगादास इलाहाबाद....
अगर आप शादी मंजूर कर लेंगे तो मैं पंडित कालिकाप्रसाद को लिख दूँगा कि शुरू की रस्मों में आपको यह दिया जाय 
बरिक्षा (वरदीक्षा) )
वरदीक्षा पर व्यवहार १५)
नकद ११)
थाल के काम )
थाल मलमल के काम )
हल्दी सुपारी चन्दन के काम  )
ब्राह्मणों की दक्षिणा के काम   ५)
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५०) यह सब मनीआर्डर से भेजा जाएगा। 
आप चाहें बिलासपुर से बारात लावें चाहे किसुनपुर से ले जाय रेल के किराये के मद्दे आपको ५०) दिये जायंगे। यह ५०) हो सकेगा तो ऊपर के ५०) के साथ ही भेज दिये जायंगे। नहीं बिलग्राम में दे दिये जायंगे। बारात में १५ आदमी से अधिक जाय। -१० भले आदमी, बाकी नौकर चाकर परजा। विवाह में जो कुछ आपके भाग्य में होगा मिलेगा। शादी जल्दी ही करनी होगी।  निवेदक म॰ प्र॰ द्विवेदी। 

राष्ट्र-भाषा के इस शिल्पी ने 21 दिसम्बर 1939 को महाप्रयाण किया। उनकी तपस्या ने हिन्दी साहित्य का जो गौरव बढ़ाया उसे देखते हुए वे अजर-अमर हो गए।

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